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Crude Oil Price: वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है. कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं और ब्रेंट क्रूड करीब 107-109 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक जा चुका है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो भारत में आम आदमी की जेब पर इसका कितना असर पड़ेगा?
सूत्रों के अनुसार, फिलहाल भारत के लिए स्थिति को किसी बड़े आर्थिक संकट के तौर पर नहीं देखा जा रहा है. मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और नियंत्रण में बनी महंगाई देश को कुछ राहत दे रही है. लेकिन, अगर क्रूड लंबे समय तक महंगा रहा, तो महंगाई का दबाव बढ़ सकता है और इसका असर घर के मासिक बजट पर दिखाई देने लगेगा.
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों पर पड़ता है. रिजर्व बैंक की एक स्टडी के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से खुदरा महंगाई करीब 49 बेसिस प्वाइंट्स तक बढ़ सकती है यानी अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लगातार ऊपर बनी रहती हैं, तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है.
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 88.6 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के तेल आयात बिल पर पड़ता है. अगर महंगा क्रूड लंबे समय तक जारी रहता है, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है. इसका मतलब है कि कार और बाइक से रोज सफर करने वालों का मासिक खर्च बढ़ सकता है.
डीजल सिर्फ वाहनों में इस्तेमाल होने वाला ईंधन नहीं है, बल्कि देश की सप्लाई चेन का सबसे अहम हिस्सा है. ट्रक, मालवाहक वाहन और दूसरे कमर्शियल व्हीकल डीजल पर निर्भर हैं. डीजल महंगा होने पर माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है. कंपनियां अगर इस एडिशनल खर्च को ग्राहकों तक पहुंचाती हैं, तो किराना, सब्जी, फल, FMCG और दूसरी रोजमर्रा की चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं.

महंगे क्रूड का असर खाद्य वस्तुओं पर भी अप्रत्यक्ष रूप से पड़ता है. खेती से लेकर खाद्य पदार्थों की प्रोसेसिंग और फिर उन्हें बाजार तक पहुंचाने में ईंधन की भूमिका होती है. ऐसे में परिवहन और प्रोडक्शन लागत बढ़ने पर खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर भी दबाव बन सकता है. इसका सीधा असर परिवारों के मासिक घरेलू बजट पर देखने को मिल सकता है.
कच्चे तेल और गैस की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी का असर घरेलू ऊर्जा खर्च पर भी पड़ सकता है. ऐसे में LPG की कीमतों को लेकर भी लोगों की नजर बनी रहेगी. सरकार उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए टैक्स में बदलाव या अन्य उपाय कर सकती है. हालांकि, लंबे समय तक कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश से सरकारी खजाने पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.
महंगे क्रूड का असर सिर्फ ऑयल कंपनियों तक सीमित नहीं रहता. एयरलाइंस, पेंट, केमिकल, लॉजिस्टिक्स, सीमेंट और कंज्यूमर गुड्स जैसे सेक्टर्स की लागत भी बढ़ सकती है. अगर कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डालती हैं, तो कई उत्पाद और सेवाएं महंगी हो सकती हैं. दूसरी ओर, घरेलू स्तर पर तेल और गैस का उत्पादन करने वाली कंपनियों को ऊंची क्रूड कीमतों से फायदा मिल सकता है. ONGC और आयल इंडिया जैसी कंपनियों के लिए महंगा कच्चा तेल सकारात्मक साबित हो सकता है.
फिलहाल, इसे तत्काल किसी बड़े आर्थिक संकट की स्थिति नहीं माना जा रहा है. लेकिन, अगर क्रूड की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो इसका असर धीरे-धीरे आम आदमी की जेब तक पहुंच सकता है. पेट्रोल-डीजल, LPG, यात्रा, माल ढुलाई और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर नजर रखना जरूरी होगा. आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी कि महंगे तेल का असर भारतीय परिवारों के बजट पर कितना गहरा पड़ता है.