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नई दिल्ली के भारत मंडपम में ब्रिक्स सम्मेलन 2026 (BRICS Summit 2026) का मंच सज चुका है. 12-13 सितंबर को होने वाले इस सम्मेलन की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. इस सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ-साथ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी शामिल होंगे. बता दें कि जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत दौरे पर आ रहे हैं, ऐसे में उनकी मौजूदगी भारत-चीन संबंधों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होगी. चीन के राजदूत विक्रम दोराईस्वामी के मुताबिक, जिनपिंग के इस दौरे से भारत-चीन के बीच व्यापार, कनेक्टिविटी, जलवायु कार्रवाई, सार्वजनिक स्वास्थ्य और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों को मजबूती मिलेगी. वैसे चीन और भारत के संबंध सदियों पुराने हैं. प्राचीन काल में दोनों देशों के बीच काफी व्यापार होता था. दोनों देश सांस्कृतिक, धार्मिक और शैक्षणिक स्तर पर जुड़े रहे हैं और इसमें बिहार की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है.
बिहार का गौरवशाली इतिहास
बिहार का इतिहास काफी गौरवशाली रहा है. प्राचीन काल में यह धरती ज्ञान, धर्म, और शक्तिशाली साम्राज्यों का केंद्रबिंदु रही है. उस वक्त बिहार में नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय और ओदंतपुरी विश्वविद्यालय समेत कई ऐसे शिक्षण केंद्र हुआ करते थे, जहां दुनिया के अलग-अलग देशों के छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते थे. दुनिया में पहले सबसे लोकतंत्र की शुरुआत बिहार के वैशाली से ही हुई थी. विश्व में शांति और अहिंसा का संदेश देने वाले गौतम बुद्ध की यह जन्मस्थली है. दुनिया को शून्य की खोज देने वाले महान गणितज्ञ आर्यभट भी बिहार से थे. इसके अलावा यौन संबंधों पर सबसे मशहूर किताब 'कामसूत्र' को लिखने वाले लेखक वात्स्यायन भी बिहार से थे.
बौद्ध भिक्षुओं को आकर्षित करता है बिहार
भगवान बुद्ध की जन्मस्थली होने के कारण चीनी यात्रियों के लिए बिहार हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहा है. 7वीं शताब्दी (लगभग 630 ईस्वी) में प्रसिद्ध चीनी बौद्ध भिक्षु और दार्शनिक ह्वेनसांग नालंदा आए थे. उन्होंने यहां करीब 5 साल तक रहकर बौद्ध धर्म और अन्य विषयों का अध्ययन किया था. वे अपने साथ सैकड़ों संस्कृत ग्रंथ और बौद्ध अवशेष चीन ले गए थे. 7वीं शताब्दी में ह्वेनसांग के अलावा इत्सिंग भी नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने के लिए बिहार आए थे. इन यात्रियों ने ही नालंदा के बौद्ध ग्रंथ और दार्शनिक विचारों को चीनी भाषा में ट्रांसलेट किया था. इसकी वजह से ही चीन में बौद्ध धर्म और भारतीय दर्शन की गहरी नींव पड़ी. आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय में भी चीन के सैकड़ों युवा पढ़ने के लिए आते हैं.
बिहार में व्यापार करने आते थे चीनी व्यापारी
प्राचीन भारत में मगध के अलावा पाटलिपुत्र, राजगीर और चंपा जैसे शहर बड़े व्यापारिक और आर्थिक केंद्र थे. मगध के पास प्रचुर मात्रा में लौह अयस्क था, जिससे मजबूत हथियार और कृषि उपकरण बनते थे. वहीं, राजगीर और चंपा जैसे शहरों में रेशम का व्यापार होता था. मसाले, कीमती रत्न और बेहतरीन सूती वस्त्रों के लिए पाटलिपुत्र में बड़ा बाजार लगता था. दुनियाभर के व्यापारी इन बाजारों में खिंचे चले आते थे. उस वक्त भारत और चीन के बीच एक रेशमी मार्ग हुआ करता था. जिसके जरिए चीनी व्यापारी भी यहां अपनी चीजों को बेचने-खरीदने के लिए आते थे. व्यापारिक मार्गों के साथ-साथ बौद्ध भिक्षुओं और यात्रियों का आना-जाना भी लगा रहता था.