शून्य से शिखर तक का महानायक: आरके सिन्हा का व्यक्तित्व, कृतित्व और संघर्ष-गाथा
आरके सिन्हा अब हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन उनका व्यक्तित्व, कृतित्व हमेशा हमारे जेहन में मौजूद रहेगा. उनकी जीवनगाथा प्रेरणा देती है और संघर्षशील बनने का संदेश देती है.
जब कोई व्यक्ति परिस्थितियों का दास न बनकर अपनी तकदीर खुद गढ़ता है, तब एक साधारण सा नाम इतिहास का स्वर्णिम अध्याय बन जाता है. रवीन्द्र किशोर सिन्हा (आरके सिन्हा) केवल एक नाम नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, अदम्य जिजीविषा और शून्य से शिखर तक पहुंचने की एक जीती-जागती गाथा का नाम है. बक्सर के एक छोटे से किराए के कमरे में जन्मे और पटना से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले आरके सिन्हा की जीवन-यात्रा जब देश-विदेश के कॉरपोरेट फलक, संसद के उच्च सदन और सांस्कृतिक-साहित्यिक गलियारों तक पहुंची, तो यह सिद्ध हो गया कि अगर संकल्प अडिग हो, तो रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं.
बक्सर के किराए के मकान से बहियारा की मिट्टी तक
आरके सिन्हा जी की जीवन-यात्रा की नींव बेहद सादगी और अभावों में पड़ी. उनका जन्म बक्सर में एक किराए के मकान में हुआ था. उनका पैतृक गांव भोजपुर (आरा) जिले का ऐतिहासिक गांव बहियारा है. शाहाबाद की जिस उर्वर माटी ने देश को 1857 के वीर सेनानी बाबू वीर कुंवर सिंह जैसे महानायक दिए, उसी माटी के संस्कारों ने सिन्हा जी के भीतर अन्याय के खिलाफ लड़ने, अपनी शर्तों पर जीने और अपनी जड़ों से सदैव जुड़े रहने का जज्बा भरा.
वे जब भी अपने बचपन और युवावस्था की बात करते, तो उनके चेहरे पर अपने पैतृक गांव और बक्सर की उन तंग गलियों की स्मृतियां तैर जाती थीं. उन्होंने कभी अपने संघर्षों को छिपाया नहीं, बल्कि हमेशा गर्व से यह स्वीकार किया कि अभाव इंसान को तोड़ते नहीं, बल्कि तराशते हैं.
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पत्रकारिता, जेपी आंदोलन और एसआईएस (SIS) की स्थापना
आरके सिन्हा का सार्वजनिक जीवन एक निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकार के रूप में प्रारंभ हुआ था. 1970 के दशक में जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का बिगुल फूंका, तो सिन्हा उस जन-आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में शामिल थे. उन्होंने सामाजिक बदलाव के लिए पत्रकारिता को औजार बनाया. आपातकाल के काले दौर में उन्होंने सत्ता की तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाई.
पत्रकारिता और समाज सेवा के दौरान ही उन्होंने पूर्व सैनिकों और ग्रामीण युवाओं की बदहाली को बेहद करीब से देखा. देश के लिए जान जोखिम में डालने वाले पूर्व सैनिक सेवानिवृत्ति के बाद आजीविका के संकट से जूझ रहे थे, वहीं बिहार के हजारों-लाखों नौजवान बेरोजगारी के अंधकार में भटक रहे थे. इसी दर्द ने 1974 में एक क्रांतिकारी विचार को जन्म दिया- 'सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज' (एसआईएस) की स्थापना.
मात्र 250 रुपये की पूंजी और एक गैरेज जैसे छोटे से कमरे से शुरू हुआ यह उपक्रम कोई साधारण व्यापार नहीं था, बल्कि यह समाज के उस तबके को सम्मानजनक आजीविका देने का एक पवित्र मिशन था, जिसे समाज अक्सर भूल जाया करता है. एसआईएस की यात्रा भारतीय औद्योगिक इतिहास का एक अभूतपूर्व उदाहरण है. जिस दौर में बिहार से किसी निजी सुरक्षा एजेंसी के वैश्विक होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, उस दौर में आरके सिन्हा ने अनुशासन, विश्वसनीयता और पेशेवर दक्षता की एक नई परिभाषा गढ़ी.
उनके इस विजन को नई ऊर्जा तब मिली, जब उनके इकलौते बेटे ऋतुराज सिन्हा ने इस साम्राज्य की बागडोर संभाली. ऋतुराज ने अपने पिता के हर अधूरे ख्वाब को न सिर्फ अपना संकल्प बनाया, बल्कि उसे हकीकत में तब्दील कर दिया. ऋतुराज सिन्हा के नेतृत्व में कंपनी ने न केवल भारतीय शेयर बाजार में अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज कराई, बल्कि ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और न्यूजीलैंड तक अपने कारोबार का सफल विस्तार किया.
आरके सिन्हा गर्व से भरे स्वर में कहा करते थे कि एक पिता के जीवन का सबसे बड़ा सुख तब होता है, जब उसका बेटा उसकी विरासत को दुनिया के नक्शे पर स्थापित कर दे. ऋतुराज की सफलता को देखकर उनकी आंखों में जो चमक होती थी, वह एक संतुष्ट पिता और एक सफल मार्गदर्शक की अमूल्य पूंजी थी. आज एसआईएस समूह लाखों परिवारों के घरों में चूल्हा जलाने का माध्यम बना हुआ है.
राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में अपनी बादशाहत कायम करने के बावजूद आरके सिन्हा कभी सत्ता या समाज से कटे नहीं. वे भाजपा के शुरुआती दिनों के निष्ठावान सिपाही और संस्थापक सदस्यों में रहे. पार्टी जब विपक्ष में थी, तब भी और जब वह सत्ता के शीर्ष पर पहुंची, तब भी वे हमेशा एक मौन, कर्मठ और निस्वार्थ रणनीतिकार के रूप में डटे रहे.
राज्यसभा सांसद के रूप में उनके कार्यकाल को संसद के उच्च सदन में जनहित के तार्किक और गंभीर मुद्दों को उठाने के लिए याद किया जाता है. वे उन चंद नेताओं में थे, जिनकी राजनीति जनसेवा, संगठन और राष्ट्र प्रथम की भावना से प्रेरित थी.
राजनीति और उद्योग के अलावा उनका साहित्यिक और सांस्कृतिक व्यक्तित्व बेहद समृद्ध था. वे मां सरस्वती के सच्चे उपासक थे. शहनाई नवाज भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की जन्मस्थली डुमरांव (बक्सर) में स्थापित 'शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ट्रस्ट' के वे मुख्य संरक्षक रहे. कला, संगीत और लोक-संस्कृति के उत्थान में उनका योगदान अप्रतिम था. इसी विराट व्यक्तित्व के सम्मान स्वरूप हमारी संस्था ने उन्हें 'लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड' से सम्मानित किया था, जिसे उन्होंने बड़ी विनम्रता से स्वीकार किया था. केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के कुलपति संजीव श्रीवास्तव की ओर से उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजा गया था.
देहरादून के वे अनकहे किस्से
आरके सिन्हा जी के जीवन के अनछुए पहलुओं को करीब से जानने का मुझे जो सौभाग्य प्राप्त हुआ, वह मेरे जीवन की सबसे अनमोल धरोहर है. उनकी दिली ख्वाहिश थी कि उनकी जीवनी मैं लिखूं. अपनी व्यस्ततम दिनचर्या से समय निकालकर वे 2024 में मुझे पूरे एक सप्ताह के लिए अपने साथ देहरादून ले गए. वे सात दिन किसी तपस्या जैसे थे. देहरादून की शांत वादियों में रोज घंटों बैठकर उन्होंने अपने जीवन की पूरी कहानी सुनाई. बक्सर के बचपन की मासूमियत, पिता का साया उठने के बाद का संघर्ष, जेपी आंदोलन की तपिश, आपातकाल की जेल यातनाएं, एसआईएस की नींव रखने के पीछे का पसीना, व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता और राजनीतिक उतार-चढ़ाव उन्होंने हर पहलू को बिना किसी लाग-लपेट के, पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ बयां किया. उन्होंने अपने आंसुओं को भी साझा किया और अपनी जीत की मुस्कान को भी.
मैंने पूरी निष्ठा से उस विस्तृत जीवन-गाथा को शब्दों में पिरोया और पुस्तक की पांडुलिपि तैयार की. देश के वरिष्ठ एवं मूर्धन्य पत्रकार रामबहादुर राय जी ने सहर्ष इस पुस्तक का प्राक्कथन लिखने का दायित्व संभाला.
पुस्तक की पांडुलिपि तैयार होने के बाद मैंने उन्हें वह पूरी रचना अक्षरशः पढ़कर सुनाई थी. वे बहुत संतुष्ट थे. उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई, स्नेह दिया और अपनी उस जीवनी को देखकर मुस्कुराए, जिसमें उनके खून-पसीने की महक थी.
मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था. कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों और व्यावहारिक विवशताओं के कारण पुस्तक के अंतिम प्रकाशन में विलंब हुआ. अफसोस और एक गहरी टीस मेरे सीने में हमेशा चुभती रहेगी कि मैं उस पुस्तक का मुद्रित रूप उनके हाथों में नहीं सौंप सका. काश, ईश्वर मुझे कुछ वक्त और देता, लेकिन मन के किसी कोने में यह परम संतोष और गर्व भी है कि वे अपनी संपूर्ण जीवन-गाथा को मेरे शब्दों में सुन चुके थे. उन्होंने अपनी उस यात्रा को अंतिम रूप से देख लिया था, जिसने एक अभावग्रस्त बालक को देश के सबसे बड़े रोजगार प्रदाताओं में से एक बना दिया.
आरके सिन्हा आज हमारे बीच सशरीर नहीं हैं, लेकिन उनका जीवन-दर्शन, उनका हौसला और लाखों लोगों को स्वाभिमान से जीने की राह दिखाने वाला उनका अवदान हमेशा जीवित रहेगा. वे एक ऐसे वटवृक्ष थे, जिसकी छाया में कई पीढ़ियों ने सुकून पाया. यह जीवनी जब भी प्रकाशित होकर दुनिया के सामने आएगी, वह केवल एक पुस्तक नहीं होगी, बल्कि उस महामानव के चरणों में एक लेखक का अश्रुपूर्ण, श्रद्धा-सुमन और कृतज्ञता का अर्घ्य होगी. सिन्हा साहब, आप विचारों में, स्मृतियों में और लाखों कर्मयोगियों के स्वाभिमान में सदैव अमर रहेंगे.
लेखक मुरली मनोहर श्रीवास्तव पिछले तीन दशक से पत्रकारिता और लेखक के रुप में सक्रिय हैं. ज़ी मीडिया के लिए गेस्ट राइटर के तौर पर अपने विचारों को साझा करते हैं. वह डॉक्यूमेंट्री, नाटक आदि लेखन सहित कई पुस्तकों की रचना कर चुके हैं. शोधपरक लेखन के साथ-साथ राजनीति, कला-संस्कृति और साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं.