Opinion: जमीन खिसकी पर नहीं बदली रणनीति: राहुल गांधी का SIR विरोध और कांग्रेस के पतन की कहानी
इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि जमीन से कटकर हवा में राजनीति नहीं हो सकती. राजनीति करने के लिए आपको जमीन पर उतरना होगा. पहले संगठन पर फोकस करना होगा. नेताओं के बीच असंतोष को खत्म करना होगा. केवल टीवी और यू-ट्यूब चैनलों पर छाने के लिए आंदोलन करना ही मकसद हो तो बात ही और है.
देश की सियासत की दशा और दिशा बिहार तय करता है. इसका साक्षात उदाहरण बिहार के चंपारण में महात्मा गांधी का सत्याग्रह आंदोलन और 1974 का जेपी आंदोलन है. और तो और पिछले साल चुनाव आयोग ने बिहार चुनाव से ठीक पहले वोटर लिस्ट का गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर बिहार से ही शुरू किया था, जिसको बाद में पूरे देश में अमल में लाया गया. आज राहुल गांधी एसआईआर के विरोध में सभी विपक्षी दलों के नेतृत्व में दिल्ली में आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन ऐसा करते हुए वे यह भूल जा रहे हैं कि उनके पिता और देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय में भी 1989 में गहन पुनरीक्षण हुआ था. तब राजीव गांधी की सरकार ने मतदाताओं की न्यूनतम उम्र सीमा 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया था. तब 18 साल के मतदाताओं को वोटर लिस्ट में शामिल करने के लिए गहन पुनरीक्षण कराया गया था. उसके ठीक बाद 1990 में बिहार में चुनाव हुए थे और कांग्रेस केवल 71 सीटों पर अटक गई थी.
कांग्रेस से भटका मतदाता अब तक नहीं लौटा
इसका मतलब यह निकाला गया था कि नए मतदाताओं ने कांग्रेस को स्वीकार नहीं किया. वे आरक्षण और मंडल-कमंडल के चक्कर में दूसरे दलों की ओर आकर्षित हो गए थे. वो दिन और आज का दिन... कांग्रेस बिहार में कभी सत्ता में नहीं लौट सकी. नीतीश कुमार के पलटी मारने की स्थिति में वह गठबंधन सरकार का हिस्सा तो बनी, लेकिन पिछलग्गू बनकर.
पहले जितने वामपंथी सरकारें थीं, उतने पर पहुंची कांग्रेस
एक समय ऐसा था कि देश में सभी सरकारें कांग्रेस की हुआ करती थीं, लेकिन धीरे-धीरे कांग्रेस का यह तिलिस्म टूटता चला गया और राज्यों को खोते-खोते वह केंद्र की सत्ता से भी हाथ धो बैठी. लंबे अंतराल के बाद 2004 में कांग्रेस ने केंद्र की सत्ता में वापसी की, लेकिन 10 साल बाद ही उसका आभामंडल समाप्त हो गया और 2014 में नरेंद्र मोदी की आंधी में वह उड़ गई. तब से वह केंद्र की सत्ता में आने को लालयित है. आज पूरे भारत में कांग्रेस केवल केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश की सत्ता में काबिज है और झारखंड के अलावा तमिलनाडु की सत्ता में हिस्सेदार है.
1989 में गहन पुनरीक्षण के बाद सत्ता से दूर हो गई कांग्रेस
2025 में शुरू किए गए SIR को कांग्रेस अपनी हार का जिम्मेदार मान रही है, लेकिन वह यह भूल जाती है कि राजीव गांधी के समय में जब गहन पुनरीक्षण हुआ था, तब भी वह बिहार को गंवा बैठी थी. आज कई राज्यों में कांग्रेस छोटे दलों की शरण में है और उनसे सीटों की भीख मांग रही है. राहुल गांधी की दिल्ली में सक्रियता का हवाला देते हुए प्रदेश स्तर के नेता फन उठाते हैं, लेकिन सहयोगी दलों की ओर से उनके फन को कुचल दिया जाता है. उत्तर प्रदेश में अजय राय का हश्र आप देख ही रहे हैं. आलम यह है कि छोटे दलों के साथ आकर कांग्रेस अपने अस्तित्व को बचाए हुए हैं, लेकिन इससे उसका रिवाइवल हो पाएगा, कहना मुश्किल है.
दिल्ली में 3 बार से कांग्रेस शून्य, तब तो एसआईआर था भी नहीं
कांग्रेस की दिक्कत यह है कि वह दिल्ली में 15 साल तक शीला दीक्षित के नेतृत्व में सरकार चलाकर अगले चुनाव में 0 हो जाती है. दिल्ली में पिछले तीन चुनावों से कांग्रेस शून्य पर आउट हो रही है. तब तो कोई एसआईआर भी नहीं था. दरअसल, पूरी पार्टी हकीकत से दूर भाग रही है और यही उसके पतन का सबसे बड़ा कारण है. जब कांग्रेस ने देख लिया कि मुद्दों के आधार पर वह सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला नहीं कर सकती तो उसने संवैधानिक संस्थानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है. चुनाव आयोग को कांग्रेस सबसे बड़ा दुश्मन मान बैठी है. अगला निशाना सुप्रीम कोर्ट है, जिसको लेकर भी केरल कांग्रेस की ओर से आपत्तिजनक पोस्ट किया जा चुका है. हालांकि, खेल बिगड़ता देख वह पोस्ट डिलीट किया जा चुका है.
दिल्ली में आंदोलन करके पूरे देश में छा जाना चाहते हैं राहुल गांधी
कांग्रेस इस बात के लिए अच्छा उदाहरण है, अगर जमीन खिसक जाती है, अपील खत्म हो जाती है तो जमीनी कार्यकर्ता भी कट जाते हैं. जब जमीन खत्म हो जाए और जमीनी कार्यकर्ता कट जाएं तो राहुल गांधी जैसे नेता ही अपनी पार्टी के रिवाइवल का सपना देख सकते हैं. दिल्ली में आंदोलन करने का एक फायदा होता है कि दिन भर आप टीवी का फुटेज खा सकते हैं, लेकिन इससे आप जनता के दिलों उतर जाएं, इसकी गारंटी नहीं है. दिल्ली की राजनीति करने वाले अरविंद केजरीवाल भी यही सपना देख रहे थे, लेकिन दिल्ली के बाद वे पंजाब तक पहुंच पाए कि उनकी जमीन खिसक गई और अब पंजाब बचाने की चुनौती आन खड़ी हुई है. समझ सको तो समझ लो.
लेखक मुरली मनोहर श्रीवास्तव पिछले तीन दशक से पत्रकारिता और लेखक के रुप में सक्रिय हैं. ज़ी मीडिया के लिए गेस्ट राइटर के तौर पर अपने विचारों को साझा करते हैं. वह डॉक्यूमेंट्री, नाटक आदि लेखन सहित कई पुस्तकों की रचना कर चुके हैं. शोधपरक लेखन के साथ-साथ राजनीति, कला-संस्कृति और साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं.