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बिहार के जमुई में नाबालिग लड़की से बदसलूकी मामले में सात लोगों के खिलाफ POCSO एक्ट के तहत केस दर्ज किया है. इस मामले में तीन नाबालिग आरोपियों को भी हिरासत में लिया है. इसके अलावा सीएम कार्यालय के स्टेनोग्राफर सागर प्रसाद के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हो चुका है. सीएमओ के स्टेनोग्राफर सागर प्रसाद पर नाबालिग पीड़िता की पहचान उजागर करने का आरोप है. जमुई पुलिस के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती जमुई कांड के हैवानों को सजा दिलाने की है. पुलिस को अब कोर्ट में आरोपियों के खिलाफ ऐसे ठोस सबूत पेश करने होंगे, जिससे पीड़िता को इंसाफ मिल सके.
क्या है पूरा मामला?
जमुई से हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें कुछ एक नाबालिग लड़की और उसके दोस्त के साथ दुर्व्यवहार करते हुए दिखाई दे रहे हैं. वीडियो में नजर आ रहे लोगों ने लड़की के साथ अभद्रता की, उसके कपड़े फाड़ दिए. जानकारी के मुताबिक, ये वारदात 19 सितंबर की शाम की है. हैवानों से खुद को बचाने के लिए लड़की मिन्नतें करती रही, लेकिन दरिंदों को जरा सा भी तरस नहीं आया. एक शख्स ने तो हद ही पार कर दी. वह लगातार लड़की के प्राइवेट पार्ट्स पर छूता रहा. इतना ही नहीं उसने लड़की को लेकर भागने की कोशिश की. वीडियो वायरल होने पर इस शख्स की पहचान नंदन यादव के रूप में हुई. पुलिस ने उसे हाफ एनकाउंटर करके गिरफ्तार कर लिया है. उसका साथी हरेराम यादव भी पुलिस की पकड़ में आ गया है. पुलिस ने वीडियो में दिख रहे गुंडों की पहचान करने के साथ ही सात लोगों के खिलाफ POCSO एक्ट के तहत केस दर्ज किया है.
पॉक्सो एक्ट क्या है?
लैंगिक अपराधों से बच्चों को सुरक्षा देने के लिए साल 2012 में पॉक्सो कानून बना था. यह कानून 14 नवंबर 2012 को पूरे देश में लागू हुआ था और पिछले चौदह वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने इसे दुनिया के सबसे सुरक्षित बाल-अधिकार कानूनों में से एक के रूप में आकार दिया है. यह कानून 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को यौन उत्पीड़न, यौन शोषण और पोर्नोग्राफी जैसे गंभीर अपराधों से सुरक्षित रखता है. इस कानून में लैंगिक भेदभाव नहीं है, यानी नाबालिग लड़की और लड़के दोनों को यह कानून संरक्षण देता है. साल 2019 में इस कानून को और ज्यादा सख्त कर दिया गया.
पॉक्सो एक्ट का मुख्य उद्देश्य
पॉक्सो एक्ट, बच्चों के प्रति अपराधों को सटीक रूप से परिभाषित करता है. ऐसे अपराधों में दोषियों के खिलाफ कड़े और श्रेणीबद्ध दंड निर्धारित करता है. न्याय मिलने में देरी ना हो इसके लिए पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज मुकदमों की विशेष अदालतों में सुनवाई होती है. इस तरह से न्यायपालिका पर भी दबाव नहीं रहता है. इतना ही नहीं सबूत का भार आरोपी पर रहता है. साथ ही पूरी जांच तथा सुनवाई प्रक्रिया को बच्चों के हित को ध्यान में रखकर बनाया गया है. इतना ही नहीं यह एक्ट, संविधान के अनुच्छेद 15(3) को प्रभाव प्रदान करता है, जो बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है. साथ ही बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन-1989 के तहत भारत के दायित्वों को पूरा करता है (जिसे भारत ने 1992 में अनुमोदित किया था).
पॉक्सो एक्ट की मुख्य बातें
2019 के संशोधन से और सख्त हुआ कानून
| अपराध | धारा | सजा |
|---|---|---|
| गंभीर यौन हमला (Penetrative sexual assault) | 4 | न्यूनतम 10 वर्ष, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माना। (यदि बच्चा 16 वर्ष से कम आयु का है, तो न्यूनतम 20 वर्ष, जिसे शेष प्राकृतिक जीवन के लिए कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माना।) |
| अति-गंभीर यौन हमला (Aggravated penetrative sexual assault) | 6 | (धारा 5 के अंतर्गत उदाहरण- पुलिस, लोक सेवक, रिश्तेदार, गिरोह द्वारा या गंभीर चोट पहुंचाना) न्यूनतम 20 वर्ष, जिसे शेष प्राकृतिक जीवन के लिए कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माना, या मृत्युदंड। |
| यौन हमला (Sexual assault) | 8 | 3 से 5 वर्ष और जुर्माना। |
| अति-गंभीर यौन हमला (Aggravated sexual assault) | 10 | (धारा 9 के अंतर्गत) 5 से 7 वर्ष और जुर्माना। |
| यौन उत्पीड़न (Sexual harassment) | 12 | 3 वर्ष तक और जुर्माना। |
| अश्लील उद्देश्यों के लिए बच्चे का उपयोग | 14 | न्यूनतम 5 वर्ष और जुर्माना; दोबारा दोषी पाए जाने पर न्यूनतम 7 वर्ष। |
| बाल अश्लील सामग्री का भंडारण या कब्जा | 15 | डिलीट न करने या रिपोर्ट न करने पर कम से कम ₹5,000 जुर्माना; प्रसारित या प्रचारित करने पर 3 वर्ष तक; व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए 3 से 5 वर्ष। |
| उकसाना (Abetment) | 17 | उकसाए गए अपराध के समान सजा। |
| प्रयास (Attempt) | 18 | अपराध के लिए प्रदान की गई सबसे लंबी अवधि के आधे तक। |
| अपराध की रिपोर्ट या रिकॉर्ड न करना | 21 | 6 महीने तक, या जुर्माना, या दोनों; किसी संस्था के प्रभारी व्यक्ति के लिए 1 वर्ष तक और जुर्माना। |
| झूठी शिकायत या झूठी जानकारी (वयस्क के खिलाफ) | 22 | 6 महीने तक, या जुर्माना, या दोनों; (झूठी शिकायत करने वाले बच्चे पर कोई सजा नहीं) |
पॉक्सो एक्ट से पहले क्या कानून था?
पॉक्सो एक्ट 2012 से पहले बाल यौन शोषण का मुकदमा भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375, 354 और 377 के तहत मुकदमा चलाया जाता था. ये प्रावधान बच्चों के हिसाब से नहीं बनाए गए थे. वे शोषण के कई रूपों को स्वीकार नहीं करते थे. इसके अलावा पीड़ित लड़कों को दुष्कर्म या बलात्कार के खिलाफ कोई सुरक्षा नहीं देते थे और बाल गवाहों को वयस्कों की तरह ही प्रतिकूल अदालत प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था.
पॉक्सो पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले