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मैं मोतीझील आपलोगों की जीवनरेखा हूं... मेरी आवाज सुनो, आखिर मुझे कौन बचाएगा मिटने से?

मोतिहारी की हृदयस्थली कहे जाने वाले मोतीझील की पीड़ा... 12 साल हो गए DM से लेकर CM और PM तक अपनी आवाज़ बुलंद कर चुके हैं, लेकिन यहां की बदहाली खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही.

Reported By Zee Bihar Network Edited By Sunil Mishra
Published: Nov 07, 2026, 12:10 PM IST | Updated: Nov 07, 2026, 12:19 PM IST
Image Credit: मोतीझील अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. (File Photo)
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मैं मोतीझील हूं... मेरी बातें थोड़ी कड़वी लग सकती हैं. दिवाली पर हर जगह साफ-सफाई चल रही है. हर चीजों का कलेवर बदलने की कोशिश की जा रही है और कई जगहों पर यह चरितार्थ भी हो रहा है, लेकिन पता नहीं, मुझसे सिस्टम को क्या बैर है. इतने सालों में किसी ने भी सच्चे हृदय से मेरी (मोतीझील) बेहतरी के लिए कोशिश नहीं की. न किसी नेता और न किसी अधिकारी ने. अगर किसी ने किया होता, तो आज यह स्थिति नहीं रहती. विकास का ढिंढोरा अपनी जगह है, लेकिन मेरे दामन में मौजूद गंदगी, उसका बदबूदार पानी और रोज़-रोज़ हो रहे सरकारी एवं गैर-सरकारी प्रायोजित अतिक्रमण चीख-चीखकर नाकामी की दास्तान बयां कर रहे हैं.

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हां, अपवाद के तौर पर पूर्व DM शीर्षत कपिल अशोक, SDM प्रियरंजन राजू जैसे अधिकारी मोतिहारी को ज़रूर मिले, जिन्होंने अतिक्रमण जैसी बड़ी समस्या से मुक्ति के लिए एक सार्थक प्रयास किया, जिसके नतीजे में आज मरीन ड्राइव मिला. काश! ऐसे अधिकारी कुछ और दिन रहते. मेरे लिए जब कोई कुछ बोलता है या कुछ करता है, तो कई ज़बानें सक्रिय हो जाती हैं. लोग तरह-तरह की बातें करने लगते हैं. कुछ को लगता है कि यह लाइमलाइट में आने के लिए है. कुछ राजनीतिक महत्वाकांक्षी समझते हैं. कुछ सत्ता-विरोधी तो कुछ फेसबुकिया और पता नहीं क्या-क्या.

सार्वजनिक फायदे के लिए एक सकारात्मक पहल में भी कुछ ना समझ टांग खींचने लगते हैं. बावजूद इसके मोतिहारी में इक्का-दुक्का जिंदा लोग भी हैं, जो मेरी आवाज हैं. उन्हें देखकर एक उम्मीद जगती है कि शायद बेंगलुरू और महाराष्ट्र में हुए जलसंकट जैसे हालात मेरे नहीं होंगे. वहां पर भी सिस्टम ने नहीं, लोगों ने ही झील को बचाया था. महाराष्ट्र में एक सरकारी इंजीनियर ने अपने निजी प्रयासों से तो बेंगलुरू में एक प्राइवेट कंपनी में काम कर रहे इंजीनियर ने झील को बचाया था. मेरे शहर में भी कुछ ऐसे लोग जिंदा है.

मुझे बहुत दुख होता है, जब मैं देखता हूं कि मोतिहारी शहर के जल स्तर को बनाए रखने वाली अनमोल धरोहर की ऐसी दुर्गति होते देखकर भी लोग तमाशबीन बने रहते हैं. हर साल दीपावली की संध्या पर झील के संरक्षण के लिए एक दीया जलाने के लिए लोगों को आमंत्रित किया जाता है. कई लोग इसमें शामिल होते हैं, लेकिन मुद्दे की गंभीरता और झील की अहमियत को देखते हुए ज्यादा से ज्यादा लोग आने चाहिए. अगर 10 हजार लोग भी मेरे जीर्णोद्धार के लिए पहुंच जाएं, तो किसकी मजाल है कि मेरे दिन बहुरने से कोई रोक सके.

पर्यावरण के दृष्टिकोण से मेरी अहमियत कितनी है, शायद लोग आज नहीं समझ रहे हैं. खैर, गहरी निराशा के साथ मोतिहारी वालों, आप सभी से कहना चाहता हूँ कि मोतीझील की बेहतरी के लिए जो संकल्प का दीया 12 वर्ष पहले जलाया गया था, उसे कम से कम बुझने ना दें. कम-से-कम अपने मन के भीतर मोतीझील के प्रति अपने जज़्बातों का दीया जलाए रखिए. आप अगर आज शाम मेरे किनारे आना चाहें, तो आपका स्वागत है!

मोतिहारी से पंकज कुमार की रिपोर्ट

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