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बिहार विधानसभा चुनाव में अभी 4 साल का समय बाकी है, लेकिन अभी से ही मोकामा की राजनीतिक रूप से उर्वर भूमि पर शतरंज की गोटियां फिट की जाने लगी हैं. मोकामा विधानसभा क्षेत्र अनंत सिंह का गढ़ रहा है और आज भी वहां की विधायकी उन्हीं के नाम है. बस उनका समय थोड़ा सा गड़बड़ा गया है. खासतौर से तब, जब उन्होंने बिहार विधान परिषद चुनाव में सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया. अब वे अलग थलग पड़ गए हैं. जिसके लिए अपनी पार्टी से बैर मोल लिया, वो अब किनारे हो गए हैं और बीच मंझधार में अनंत सिंह फंस गए हैं. अब तो दुलारचंद हत्याकांड में उनकी जमानत भी सुप्रीम कोर्ट ने कैंसिल कर दी है और उन्हें 1 दिसंबर को सरेंडर करने को कहा है. पार्टी से तो वे पहले ही निकाल दिए गए थे. इस बीच सूत्रों के अनुसार खबर आ रही है कि अगले विधानसभा चुनाव में अनंत सिंह खुद के बदले बेटे को मैदान में उतार सकते हैं. इससे भी बड़ी खबर यह है कि 2030 में अनंत सिंह या उनके बेटे को मोकामा विधानसभा सीट से सोनू-मोनू से कड़ी टक्कर मिल सकती है.
पटना से जी न्यूज को सूत्रों के अनुसार जो बड़ी खबर मिली है, उसके अनुसार सोनू-मोनू से अगले विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटने को कहा गया है. सोनू-मोनू को यह निर्देश एक बड़ी पार्टी की ओर से दिया गया है. जाहिर है, अनंत सिंह को चौतरफा घेरने की कोशिश में सोनू-मोनू की भूमिका महत्वपूर्ण साबित हो सकती है. सोनू-मोनू की ओर से मोकामा में अनंत सिंह को कड़ी टक्कर मिलती रही है. हालांकि, अभी सोनू-मोनू राजनीति में नहीं हैं, लेकिन राजनीति उनसे अब इतनी दूर भी नहीं रही. खुद राजनीति उन्हें अपने आलिंगन में लेने के लिए आतुर हो रही है.
ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, राजनीति में अपराधीकरण का शोर होगा. कुछ आर्टिकल लिखे जाएंगे. कुछ टीवी शोज होंगे. वीडियो वायरल होंगे, लेकिन राजनीति के अपराधीकरण का यह दौर शायद कभी नहीं थमने वाला है. आज भी नहीं थमा है और आगे भी थमता नहीं दिख रहा है. बाहुबल, राजनीति की एक शाखा बन चुका है, जो साथ-साथ आगे बढ़ता जाता है. आज भी अनंत सिंह तो बाहुबली होने के नाम पर ही राजनीति में हैं. अगर बाहुबल न होता तो क्या अनंत सिंह राजनीति में होते, नहीं होते.
खैर, ये सब उपदेशात्मक बातें हैं. राजनीति में इतने उपदेश की जरूरत नहीं होती. वहां तो देखा जाता है कि 'देखना है जोर कितना बाहुएं कातिल में हैं.' अभी तक सोनू-मोनू राजनीति में नहीं हैं तो मोकामा में अनंत सिंह का राज चल रहा है, लेकिन उनके राजनीति में आने के साथ ही यह एकछत्र राज खत्म हो जाएगा. मोकामा के जरायम में सोनू-मोनू की एक निश्चित हिस्सेदारी तो आज भी है. वहीं हिस्सेदारी जब राजनीति में अपना हिस्सा मांगेगी, तो देना तो पड़ेगा. बाकी जनता के हाथ में है.
सोनू-मोनू मोकामा और पटना के जरायम की दुनिया के वो नाम हैं, जो अनंत सिंह को भी परेशान करते हैं. ये दोनों सगे भाई हैं और उनके पिता पटना हाई कोर्ट में अधिवक्ता हैं. दोनों ईंट-भट्ठे का भी काम करते हैं. कभी ये दोनों अनंत सिंह के करीबी हुआ करते थे और उन्हीं के लिए काम करते थे, लेकिन पैसों के लेन देन और वर्चस्व को लेकर अनंत सिंह से इनकी अदावत हो गई थी. दोनों भाइयों पर हत्या, अपहरण, फिरौती, ट्रेन लूट और गोलीबारी जैसे 30 से अधिक मुकदमे हैं. इसी साल मई में जब मोकामा के नौरंगा जलालपुर गांव में पुलिस सोनू-मोनू के घर छापेमारी करने पहुंची थी तो वहां पुलिसकर्मियों की ही तलाशी ले ली गई थी. इसका वीडियो काफी वायरल हुआ था.