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अमेरिकी संसद में क्या घटेगी भारतीयों की ताकत, 'समोसा कॉकस' पर संकट; मिड-टर्म चुनाव में ट्रंप को कैसे लगेगा झटका?

अमेरिका में होने वाले मिड टर्म चुनाव सिर्फ ट्रंप के लिए ही नहीं, भारतीय मूल के लिए भी बहुत हैं. हो सकता है कि इन चुनावों के बाद अमेरिकी कांग्रेस में भारतीय मूल के सदस्यों की संख्या कम हो सकती है.

Written By Tahir Kamran
Published: Oct 13, 2026, 05:07 PM IST | Updated: Oct 13, 2026, 05:39 PM IST
Image Credit: एआई की मदद से बनाई गई तस्वीर
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अमेरिका में भारतीय मूल के लोग मुख्य राजनीति में चर्चा बने हुए हैं. 'PEW' की रिपोर्ट के मुताबिक तकरीबन 52 लाख की आबादी के साथ भारतीय मूल के लोग अमेरिका के अंदर अप्रवासी समुदाय में दूसरे नंबर पर आते हैं. भारत के ऊपर इस लिस्ट में मैक्सिको को नाम आता है, जिनकी तादाद 4 करोड़ के आसपास है. खास बात यह है कि भारतीय मूल के लोग आर्थिक और शिक्षा के मामले में भी बेहतर होते जा रहे हैं. साथ ही अमेरिका में होने वाले चुनावों में यह समुदाय बड़ा किरदार अदा करता है. नवंबर में होने वाले मिड टर्म इलेक्शन में एक बार फिर भारतीय समुदाय चर्चा में है. क्योंकि ये कई मुख्य सीटों पर हार जीत तय करते हैं. साथ ही अमेरिका कांग्रेस में उनकी हिस्सेदारी भी लगातार बढ़ती जा रही है.

साल 2012 से पहले अमेरिकी कांग्रेस में सिर्फ 2 भारतीय अमेरिकी ही थे. इनमें कैलिफोर्निया से डेमोक्रेट दलीप सिंह सौंध, जिन्होंने 1957 से 1963 तक सेवा की और दूसरे नंबर पर बॉबी जिंदल, जो लुइसियाना से रिपब्लिकन नेता थे. बॉबी 2005 से 2008 तक कांग्रेस में रहे. फिर 2012 में कैलिफोर्निया से डेमोक्रेट उम्मीदवार अमी बेरा ने चुनाव जीतकर इस संख्या को और आगे बढ़ाया. इसके बाद 2017 में रो खन्ना, प्रमिला जयपाल और राजा कृष्णमूर्ति ने इस लिस्ट को और आगे बढ़ाया. फिर 2023 में श्री थानेदार और सुहास सुब्रमण्यम 2025 में शामिल हुए.

लेकिन चिंता की बात यह है कि तेजी से आगे बढ़ रहे इस सिलसिले पर ब्रेक लग सकता है. क्योंकि कृष्णमूर्ति और थानेदार का कार्यकाल पूरा हो रहा है और यह संख्या तभी आगे बढ़ सकती है, जब 3 नवंबर को होने वाले मिड टर्म चुनावों में एरिजोना में डेमोक्रेट अमीश शाह या फ्लोरिडा में पिया डंडिया अपने कड़े मुकाबले वाले चुनावों में जीत हासिल नहीं कर लेते. हालांकि रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से चुनाव लड़ने वाले रितेश टंडन, नीरव शेठ और महेश गनोरकर की जीत से भी यह आंकड़ा बढ़ सकता है, लेकिन ये तीनों मजबूत डेमोक्रेटिक सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं, इनकी जीत मुश्किल लग रही है. अगर ये चुनाव जीतकर कांग्रेस तक नहीं पहुंचते हैं, तो अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में भारतीय अमेरिकियों की तादाद छह से कम हो कर चार ही रह जाएगी.

अभी अमेरिकी सदन में 6 छह भारतीय-अमेरिकी सदस्य हैं, जिन्हें अनौपचारिक तौर पर 'समोसा कॉकस' के नाम से भी जाना जाता है.

वॉशिंगटन में मौजूद थिंक टैंक कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के मुताबिक अमेरिका में लगभग 26 लाख भारतीय अमेरिकी वोटर्स हैं. हालांकि, यह समुदाय कुल वोटर्स की तादाद में बहुत छोटा है, लेकिन इनकी संख्या उन क्षेत्रों में केंद्रित है, जहां अंतर बहुत कम है. जैसे- पेंसिल्वेनिया, मिशिगन, जॉर्जिया, टेक्सास, न्यू जर्सी, अटलांटा और वॉशिंगटन के आसपास के उपनगर हैं.  मध्यावधि चुनाव में जहां कुछ चुनिंदा जिलों और राज्यों में वोटिंग का नतीजा निर्णायक होता है, वहां मतदाताओं में मामूली बदलाव भी मायने रख सकता है.

एक सर्वे के मुताबिक, मध्यावधि चुनावों से पहले भारतीय-अमेरिकी वोटर् डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ झुक रहे हैं, जबकि ट्रंप के अप्रवासन विरोधी एजेंडे के चलते कई एशियाई अमेरिकी और प्रशांत द्वीप समूह के वोटर्स राजनीतिक रूप से थक चुके हैं. AAPI डेटा और APIAVote के जरिए किए गए 2026 एशियाई अमेरिकी और प्रशांत द्वीप समूह वोटर सर्वे के आंकड़ों से पता चलता है कि 66 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकी ने डेमोक्रेटिक सीनेट उम्मीदवार को प्राथमिकता देने की बात कही है, जबकि 22 प्रतिशत ने रिपब्लिकन उम्मीदवार को अपने समर्थन की बात कही है.

सर्वे में यह भी पाया गया कि रजिस्टर्ड भारतीय-अमेरिकी वोटरों में से 90 फीसद मध्यावधि चुनावों में मतदान करने की योजना बना रहे थे, जबकि 71 प्रतिशत ने कहा कि वे यकीनी तौर पर वोट डालेंगे. यह हालात भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं को उन राज्यों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनाती है जहां मुकाबला कड़ा है.

भारतीय अमेरिकी समुदाय संयुक्त राज्य अमेरिका में सबसे अधिक कमाई करने वाले जातीय समूहों में से एक है, जिसकी औसत घरेलू आय 1 लाख 50 हजार डॉलर से ज्यादा है, जो कुल अमेरिका के औसत से लगभग दोगुनी है. सिलिकॉन वैली, वॉल स्ट्रीट, स्वास्थ्य सेवा नेटवर्क, कॉर्पोरेट कानून और वाणिज्यिक रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में केंद्रित प्रतिनिधित्व के साथ, इस समुदाय के पास अपने उम्मीदवारों को आर्थिक मदद देने की भी ताकत है.

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About the Author

Zee News में नेशनल डेस्क पर देश–विदेश और राजनीति से जुड़ी खबरें लिखते हैं. करियर का आगाज 2015 से 'पंजाब केसरी' ग्रुप के उर्दू अखबार ‘हिंद समाचार’ से किया, जहां वे कंटेट राइटर से पेज डिजाइनर तक पहुंचे. इसके बाद उर्दू, हिंदी और पंजाबी - तीनों भाषाओं में काम करने का मौका मिला. 2018 में डिजिटल की तरफ कूच करते हुए पंजाब केसरी ग्रुप की उर्दू वेबसाइट की लॉन्चिंग टीम का नेतृत्व किया. इसके बाद 2020 में 'Zee Salaam' ज्वाइन किया, यहां भी वेबसाइट को लॉन्च करने के साथ-साथ तीन साल टीम का नेतृत्व भी किया. इसी दौरान ZEE Delhi NCR वेबसाइट भी लॉन्च हुई, जिसमें उनका अहम योगदान रहा. 2023 में India Daily Live की लॉन्चिंग टीम के साथ काम किया और शुरुआती दिनों में हिंदी के अलावा पंजाबी, तमिल, तेलुगु और गुजराती वेबसाइट टीमों को मैनेज किया. अक्टूबर 2024 में फिर से Zee Media में में वापसी करते हुए नेशनल टीम का हिस्सा बने. तकनीक में दिलचस्पी की वजह से उन्होंने React.js और वेब डिजाइनिंग सीखी. यही कारण है कि उनकी खबरों में HTML-CSS के छोटे-छोटे ग्राफिक्स दिख जाते हैं, जो मुश्किल बातों को भी आसान बना देते हैं. करियर की शुरुआत में कुछ दिनों तक फोटो स्टूडियो में भी काम किया, जहां कैमरा, Adobe Photoshop और ग्राफिक डिजाइनिंग सीखी, जो आज भी उनके डिजिटल काम में मदद करता है. उर्दू शायरी से प्यार अलग ही है. ग़ज़लें, नज़्में, गीत भी लिखते हैं और कई अखबारों में उनकी शायरी छप भी चुकी हैं. राहत इंदौरी, मुनव्वर राणा, अनवर जलालपुरी खुशबीर सिंह शाद और नवाज देवबंदी, माजिद देवबंदी  जैसे शायरों के इंटरव्यू व बातचीत का अनुभव भी उनके पास है. आप tahir.kamran@india.com पर सीधे ईमेल या फिर नीचे X और Facbook से जुड़ सकते हैं. 
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