धरती को बचाने का वादा पड़ रहा कमजोर! खतरे में 1.5 डिग्री का लक्ष्य, ग्लोबल वार्मिंग पर नई रिपोर्ट ने सबको चौंकाया
2015 में पेरिस जलवायु समझौते के जरिए दुनिया ने धरती को ग्लोबल वार्मिंग से बचाने का वादा किया था, लेकिन करीब 11 साल बाद यह लक्ष्य कमजोर पड़ता दिख रहा है. संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है. आखिर अब क्या होगा?
साल था 2015 और जगह थी पेरिस, जहां दुनिया भर के देश इक्टठे होकर धरती को बचाने के लिए बहुत बड़ा संकल्प ले रहे थे. तभी सभी देशों ने वादा किया कि हम आने वाली पीढ़ी के लिए इस धरती को सुरक्षित रखेंगे और बढ़ते तापमान को काबू में रखेंगे. तब से अब तक करीब 11 बरस बीत गए हैं, लेकिन अब वही खूबसूरत सपना टूटने की कगार पर पहुंच गया है. इसी को लेकर संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट आई है, जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है, रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि तापमान का 1.5 डिग्री वाला दायरा अब टूटना की कगार पर है.
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के बाद सवाल यह उठता लाजमी हो जाता है कि क्या पेरिस जलवायु समझौता अब टूटने की कगार पर है? भयंकर गर्मी और बाढ़ का सामना कर रहे भारत जैसे विकासशील देश के सामने अब क्या चुनौतियां बची हैं और क्या इस गहरे संकट के बीच कोई नई उम्मीद बाकी है? आइए जानते हैं इस पूरी रिपोर्ट की असली कहानी.
1.5 डिग्री का लक्ष्य क्यों मुश्किल?
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानी UNEP की Emissions Gap Report 2026 के अनुसार, दुनिया के लिए 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार होने से बचना लगभग नामुमकिन होता जा रहा है. UNEP की रिपोर्ट के अनुसार, अगर दुनिया ने उत्सर्जन कम करने के लिए तेजी से कदम उठाए, तो इस सदी के मध्य तक तापमान 1.7 से 1.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है. इसके बाद इसे घटाकर साल 2100 तक फिर 1.5 डिग्री या उससे नीचे लाने की 50 फीसदी संभावना है.
इसके लिए 2025 के स्तर के मुकाबले ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 2030 तक 18 फीसदी, 2035 तक 45 फीसदी और 2040 तक 69 फीसदी की कटौती करनी होगी. लेकिन मौजूदा जलवायु वादों के आधार पर 2030 तक उत्सर्जन में सिर्फ 5 से 8 फीसदी कमी का अनुमान है. मौजूदा नीतियां जारी रहीं, तो सदी के अंत तक दुनिया का तापमान 2.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है.
भारत के सामने भी बड़ी चुनौती
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देश है. UNEP के मुताबिक, 2025 में भारत से करीब 4.5 अरब टन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ. लेकिन राहत की बात यह है कि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के मामले में भारत वैश्विक औसत से काफी नीचे है. भारत ने स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं. फरवरी 2026 तक देश की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता में गैर जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी 52.57 फीसदी हो गई थी. वहीं, 2005 से 2020 के बीच GDP के मुकाबले उत्सर्जन की तीव्रता में 36 फीसदी की कमी आई.
लेकिन एक साल उत्सर्जन घटने का मतलब यह नहीं कि यह गिरावट लगातार जारी रहेगी. रिपोर्ट के शुरुआती अनुमानों के अनुसार, 2016 से 2025 के बीच भारत के उत्सर्जन में हर साल औसतन 2.6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.
क्या कोयले की जगह ले पाएगी स्वच्छ ऊर्जा?
Ember की Global Electricity Review 2026 के मुताबिक, भारत में 2025 के दौरान अक्षय ऊर्जा से बिजली प्रोडक्शन 98 टेरावाट घंटे बढ़ा. सौर ऊर्जा से उत्पादन में 53 टेरावाट घंटे और पवन ऊर्जा से 22 टेरावाट घंटे की बढ़ोतरी हुई. वहीं, कोयले से बनने वाली बिजली में करीब 44 टेरावाट घंटे की कमी आई. इसके बावजूद देश की करीब 71 फीसदी बिजली कोयले से बनी.
एक्सपर्ट्स के अनुसार, स्वच्छ ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाने के लिए बिजली ग्रिड, बैटरी स्टोरेज और दूसरी जरूरी सुविधाओं में निवेश करना होगा. स्टील और सीमेंट जैसे उद्योगों में भी प्रदूषण घटाने के उपाय अपनाने होंगे.
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क्या पेरिस समझौता फेल हो गया?
1.5 डिग्री का लक्ष्य खतरे में जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पेरिस समझौता पूरी तरह असफल हो या फेल हो गया. इस समझौते ने देशों को उत्सर्जन घटाने और जलवायु संबंधी अपने लक्ष्यों को मजबूत करने का साझा रास्ता दिया था. समस्या यह है कि वादों के मुकाबले एक्शन बहुत स्लो है.
भारत जैसे विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने के लिए निवेश और नई तकनीक की जरूरत है. विकसित देशों को भी जलवायु वित्त से जुड़े वादे पूरे करने होंगे. आखिरकार, दुनिया तापमान में बढ़ोतरी को कितना रोक पाएगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि देश अब अपने वादों को कितनी गंभीरता से पूरा करते हैं.
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