यूएस-ईरान के बीच पिछले 7 महीने से चले आ रहे सैन्य संघर्ष में तेहरान पश्चिम एशिया में एक बड़ी शक्ति बनकर उभरा है. वह खाड़ी में जहां चाहे, उस देश को निशाना बना रहा है. सऊदी अरब भी उसकी मिसाइलों और घातक हमलावर ड्रोनों का स्वाद कई बार चख चुका है. अब सऊदी अरब भी ईरान से मुकाबले के लिए अपने शस्त्रागार में लंबी दूरी वाली मिसाइलों को शामिल करने पर काम कर रहा है. इन मिसाइलों के बनने से सऊदी अरब को अपने एफ-15 लड़ाकू जेट ईरान के ऊपर भेजने के बजाय सीधे उसे टारगेट करके जवाबी क्षमता हासिल हो जाएगी.
न्यूज एजेंसी रायटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यह खुलासा अमेरिका के दो रिसर्चरों ने सैटेलाइट इमेजों के विश्लेषण के बाद किया है. असल में अमेरिकी सैटेलाइट कंपनी प्लैनेट लैब्स ने अप्रैल 2025 से सितंबर 2026 के बीच सऊदी अरब रक्षा उत्पादन प्लांटों की तस्वीरें ली थी. इसमें राजधानी रियाद से लगभग 200 किमी पश्चिम में स्थित अल-दुवादमी प्लांट की तस्वीरें भी शामिल थीं.
अमेरिकी 'फॉरेन पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट' (FPRI) के दो शोधकर्ताओं, सैम लेयर और माइकल डुइट्समैन ने उन तस्वीरों का विश्लेषण किया, तो उन्हें एक अनोखी बात दिखाई. उन्होंने देखा कि सितंबर 2026 की तस्वीर में उसी तस्वीर में कास्टिंग पिट्स बने हुए नजर आ रहे थे. ये पिट्स ऐसे गहरे गड्ढे होते हैं, जिनमें ईंधन सामग्री के मिश्रण को मिसाइल मोटर के खोल में डाला जाता है. इसके बाद उन्हें गड्डों में सख्त होने के लिए छोड़ दिया जाता है.
इन तस्वीरों के विश्लेषण के आधार पर दोनों रिसर्चरों ने यह अनुमान जाहिर किया है कि सऊदी अरब चुपके से लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम बैलिस्टिक मिसाइलों के निर्माण पर काम कर रहा है. उसकी यह मिसाइलें ठोस ईंधन से चलने वाली होंगी. इस तरह की मिसाइलों को लंबे समय तक स्टॉक करने और ज्यादा दूरी तक मार करने की सुविधा होती है. ये मिसाइलें अपने साथ भारी पेलोड यानी हथियार ले जाने में भी सक्षम होती हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के पास इस तरह की मिसाइलों को बनाने की क्षमता है. उसने यह क्षमता गुप्त रूप से चीन से हासिल की थी. अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA का अनुमान है कि सऊदी अरब ने 1987 में चीन से सीक्रेटली लगभग 40 DF-3 बैलिस्टिक मिसाइलें हासिल की थीं. ये सभी मिसाइलें तरल-ईंधन वाली थीं. उसने उसने अप्रैल 2014 की सैन्य परेड में पहली बार इनमें से दो को प्रदर्शित किया था.
इसके बाद उसने इसी तकनीक पर काम करते हुए अपनी खुद की मिसाइलें विकसित कीं. FPRI टीम ने हाल में यमन की हूती विद्रोहियों पर दागी गई एक मिसाइल के मलबे की पहचान DF-15 मिसाइल के रूप में की. सऊदी अरब का अल-दुवादमी परिसर भी चीनी तकनीक पर आधारित बताया जा रहा है.
सऊदी अरब के चीन से पास जाने की वजह ये है कि घनिष्ठ सहयोगी होने के बावजूद अमेरिका दूसरे मुल्कों को लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियों को देने से परहेज करता रहा है. इसलिए सऊदी ने गोपनीय तरीके से चीन का रुख किया और उससे मिसाइल टेक्नॉलॉजी हासिल कर खुद की मिसाइलें बनाईं. लेकिन उसकी बनी सभी मिसाइलें तरल ईंधन वाली थीं. जो एक सीमित दूरी तक मार कर सकती हैं और उन्हें लंबे वक्त तक स्टॉक करके रखना भी मुश्किल होता है.
ऐसे में ईरान और हूती विद्रोहियों के खतरे से निपटने के लिए अब सऊदी अरब लंबी दूरी की मिसाइलें बनाने में जुटा हुआ है. रिसर्चरों के मुताबिक, सऊदी अरब के शासकों की मंशा एकदम साफ है. वे इस बात को समझ चुके हैं कि जब तक ईरान से निपटने के लिए वे ठोस हथियार हासिल नहीं कर लेते हैं, तब तक मुस्लिम उम्माह के मुखिया की उनकी प्रतिष्ठा दांव पर ही रहेगी.
यही वजह है कि सऊदी अरब अब लंबी दूरी की मिसाइलों पर फोकस कर रहा है. जिससे जंग के हालात में वह ईरान में इतनी तबाही मचा सके कि तेहरान उस पर हाथ डालने से पहले कई बार सोचे.
आज की तारीख में हथियारों के मामले ईरान उससे आगे है. उसके पास लंबी दूरी की घातक मिसाइलें और ड्रोन हैं, जिनके जरिए वह सऊदी अरब पर जब चाहे और जहां चाहे हमला कर सकता है. जबकि सऊदी के पास ऐसी क्षमता नहीं है. ऐसे में वह लंबी दूरी की मिसाइलें बनाकर इस अंतर को कम करना चाह रहा है.
विश्लेषक डेकर एवेलेथ के मुताबिक, अपने शस्त्रागार को मजबूर करने का काम केवल सऊदी अरब नहीं कर रहा, बल्कि पश्चिम एशिया के लगभग सभी देश इन दिनों आक्रामक तरीके से खुद को शक्तिशाली बनाने में जुटे हैं. यूएई से लेकर तुर्किये तक, सभी देश अपनी हथियार निर्माण क्षमताओं को तेजी से बढ़ा रहे हैं, जिससे दुनिया में हथियारों की रेस तेज होती जा रही है.