भिखमंगों का 'खलीफा': खुद गले तक कर्ज में डूबा, अब पाकिस्तान बना सबसे ज्यादा लोन लेने वाले देशों का 'सरदार'
पाकिस्तान खुद कर्ज में डूबा हुआ है. लेकिन उसको यूएन समर्थित एक मंच का अध्यक्ष बनाया गया है, जो ऐसे देशों की अगुआई करेगा, जिन पर अत्यधिक कर्ज है. कर्ज लेकर इकोनॉमी तबाह करने में पाकिस्तान का तो कोई सानी ही नहीं है.
आतंकवादियों को पालने-पोसने में माहिर पाकिस्तान को अब ऐसी जिम्मेदारी मिली है, जिसमें कोई भी उसका सानी नहीं है. उसको अब कर्जदारों का खलीफा बनाया गया है. यानी कर्ज के मुद्दे पर जो बातचीत होगी, उसकी वह अगुआई करेगा. जिस एक सब्जेक्ट में पाकिस्तान को बहुत अनुभव है, वह है पैसा उधार लेना.
पाकिस्तान के वित्त मंत्री सीनेटर मुहम्मद औरंगजेब ने सोमवार को थाईलैंड में पाकिस्तान की ओर से 'बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म' (उधार लेने वाले देशों का मंच) की अध्यक्षता संभाली. यह एक प्लेटफॉर्म है, जिसे यूएन का समर्थन हासिल है. इसे कर्ज के बोझ तले दबे देशों की मदद के लिए बनाया गया है ताकि वे एक-दूसरे से लोन मैनेजमेंट सीख सकें. तकनीकी जानकारी एक-दूसरे को दे सकें और विकास के लिए फंडिंग पर अंतरराष्ट्रीय बातचीतों में अपनी स्थिति बेहतर कर सकें. हालांकि, इसमें एक पेच है. यह लेनदारों के साथ बातचीत करने के लिए कोई साझा मंच नहीं है.
फिर भी, पाकिस्तान अब ऐसी स्थिति में है कि वह इस मुद्दे पर बातचीत की अगुआई कर सके कि देश कैसे कर्ज चुकाने के जाल में फंसे बिना उधार ले सकते हैं. कर्ज को सरकारी खर्च पर हावी होने से रोकें. साथ ही लोन को ऐसे निवेश में बदल सकें, जिनसे लॉन्ग टर्म में फायदा हो.
कितना है पाकिस्तान का सरकारी कर्ज?
पाकिस्तान को इन सवालों के जवाब काफी अच्छे से पता हैं. 2026 के आखिर तक पाकिस्तान का पब्लिक डेट-टू-जीडीपी (सरकारी कर्ज और जीडीपी का रेश्यो) लगभग 68.3 से 70.2 परसेंट है, जबकि उसका कुल सरकारी कर्ज लगभग 2,75,18,25,21,92,000 रुपये तक पहुंच गया है.
साल 2026-27 के लिए औरंगजेब ने इस प्लेटफॉर्म को लेकर पाकिस्तान के कामकाज का जो रोडमैप बताया है, वह सुनकर आप भी हंस पड़ेंगे. इसमें पाकिस्तान बताएगा कि लोन मैनेजमेंट कैसे बेहतर किया जा सकता है. साथ ही, आर्थिक सुधारों पर अनुभवों को भी एक-दूसरे को बताया जाएगा. विकास के लिए फंडिंग के नए तरीकों की खोज की जाएगी. यानी जिस देश की इकोनॉमी ही कर्ज पर चल रही है, वह अब कर्ज के मैनेजमेंट पर बाकी अन्य देशों को ज्ञान देगा.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के समर्थन से विकासशील देशों ने अप्रैल 2026 में यह पहल शुरू की थी. इसमें अब तक 31 औपचारिक सदस्य शामिल हो चुके हैं. UN ट्रेड एंड डेवलपमेंट या UNCTAD इसका सचिवालय है. गुटेरेस ने विकासशील देशों के सामने मौजूद आर्थिक हालात को 'परफेक्ट स्टॉर्म' (बहुत गंभीर संकट) बताया है.
खुद कर्ज के महाजाल में पाकिस्तान
कर्ज का इतिहास समझने के लिए पाकिस्तान सबसे शानदार उदाहरण है. 2008 से 2013 तक पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की सरकार के दौरान, देश का कुल कर्ज लगभग 6.4 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये से बढ़कर 15.1 ट्रिलियन हो गया. 2013 के चुनाव के बाद सत्ता में आए नवाज शरीफ के कार्यकाल में पाकिस्तान का विदेशी कर्ज 5 सालों में 52.4 बिलियन डॉलर से बढ़कर 75.3 बिलियन डॉलर हो गया. इसमें चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर से जुड़ा कर्ज और दूसरी वित्तीय जरूरतें भी शामिल थीं.
आंकड़ों के अनुसार, 2018 के चुनाव के बाद शुरू हुए इमरान खान के कार्यकाल में विदेशी कर्ज और बढ़कर 75.3 बिलियन डॉलर से 110.6 बिलियन डॉलर हो गया. इस बीच, चीन पाकिस्तान को कर्ज देने वाला सबसे बड़ा देश बन चुका है. IMF की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में पाकिस्तान के विदेशी कर्ज में चीन का हिस्सा लगभग 30 प्रतिशत था.
पाकिस्तान में मुश्किलों में अवाम
इस संकट ने फिस्कल एडजस्टमेंट (सरकारी खर्च और आमदनी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश) की घरेलू कीमत की पोल खोल दी. जब सरकार आर्थिक स्थिरता लाने की कोशिश कर रही थी, तब ऊंचे टैक्स, बढ़ती कीमतें और महंगे कर्ज के भुगतान ने परिवारों को मुश्किल में डाल दिया.
पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय के एक सूत्र के हवाले से आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, जून 2025 में चीन ने पाकिस्तान को दिए गए 3.4 अरब डॉलर के कमर्शियल लोन को आगे बढ़ा दिया यानी रोल-ओवर कर दिया. इसमें स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के पास 2.1 अरब डॉलर की जमा राशि और 1.3 अरब डॉलर के उस कमर्शियल लोन की रीफाइनेंसिंग शामिल थी, जिसे पहले ही चुकाया जा चुका था.
इस रोल-ओवर से इस्लामाबाद को 30 जून 2025 तक विदेशी मुद्रा भंडार को 14 अरब डॉलर से ऊपर बनाए रखने की IMF की शर्त पूरी करने में मदद मिली. लेकिन इसने पाकिस्तान की वित्तीय स्थिति की एक मुख्य कमजोरी भी सामने आ गई. रीफाइनेंसिंग से कुछ राहत तो मिल सकती है, लेकिन इससे असल कर्ज का बोझ कम नहीं होता.
इस समय, पाकिस्तान का कुल विदेशी कर्ज और देनदारियां 138.8 अरब डॉलर हैं, जिसमें से 92.2 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज सीधे सरकार पर है. यह कर्ज वर्ल्ड बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक और इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड जैसे संस्थानों के अलावा चीन और सऊदी अरब जैसे देशों से लिया गया है.