मौत के तांडव को रोक सकती थी यह एक तकनीक! नेपाल ने चीन बॉर्डर पर क्यों शुरू किया VSAT का मिशन?
नेपाल ने चीन सीमा पर आपदा प्रबंधन और सटीक अर्ली वार्निंग के लिए VSAT मिशन शुरू किया है. जानिए कैसे सैटेलाइट तकनीक से हिमालयी क्षेत्र में टल सकता है बड़ा नुकसान.
नेपाल में आई बाढ़ से हुई तबाही को शायद टाला नहीं जा सकता था, लेकिन इस आपदा में गई इतनी बड़ी संख्या में जानें बचाई जा सकती थीं. अगर समय रहते लोगों को खतरे का अंदाजा हो जाता, तो तस्वीर कुछ और हो सकती थी. अब नेपाल ने इसी कमी को दूर करने की दिशा में कदम बढ़ाया है. देश के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) ने चीन की सीमा से लगे इलाकों में नए अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने का काम शुरू कर दिया है.
इन नए सिस्टम में भूकंपीय सेंसर, रिमोट कैमरे और VSAT जैसी तकनीक शामिल है. VSAT सैटेलाइट के जरिए काम करने वाला संचार सिस्टम है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि किसी बड़ी आपदा के दौरान अगर मोबाइल नेटवर्क या सामान्य संचार व्यवस्था ठप हो जाए, तब भी इसके जरिए संपर्क बनाए रखा जा सकता है. यानी खतरे की सूचना लोगों तक पहुंचाने के लिए सिर्फ मोबाइल नेटवर्क पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं होगी.
बाढ़ की वजह से 1204 लोगों की मौत
नेपाल की भोटेकोसी नदी में अचानक आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई. रिपोर्ट के मुताबिक, इस आपदा में अब तक करीब 1204 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि साढ़े चार हजार से ज्यादा लोग अभी भी लापता हैं. इस घटना ने नेपाल के मौजूदा अर्ली वार्निंग सिस्टम की सीमाओं को भी उजागर कर दिया. दरअसल, वहां लगाए गए पुराने सिस्टम मुख्य रूप से नदियों के जलस्तर में धीरे-धीरे होने वाली बढ़ोतरी पर नजर रखने के लिए तैयार किए गए थे. अचानक ग्लेशियर टूटने या उसके ढहने से पैदा होने वाले तेज सैलाब की भविष्यवाणी करने में ये सिस्टम उतने प्रभावी नहीं थे.
क्या होता है VSAT?
VSAT यानी वेरी स्मॉल अपर्चर टर्मिनल, एक तरह की सैटेलाइट आधारित संचार व्यवस्था है. इसकी खासियत यह है कि इसके जरिए बिना मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट के भी जरूरी सूचनाएं एक जगह से दूसरी जगह भेजी जा सकती हैं. आमतौर पर वॉर्निंग सेंटर से मौसम या दैवीय आपदा से जुड़ी जानकारी मोबाइल टावर, फाइबर नेटवर्क और इंटरनेट के जरिए भेजी जाती है. लेकिन बाढ़, भूस्खलन या दूसरी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सबसे पहले यही संचार व्यवस्था प्रभावित होती है. मोबाइल टावर बंद हो सकते हैं और इंटरनेट या फाइबर की लाइनें टूट सकती हैं. ऐसे हालात में VSAT काफी अहम साबित होता है. यह सीधे सैटेलाइट से जुड़कर काम करता है. इसलिए जमीन पर मौजूद मोबाइल टावर या इंटरनेट लाइन के खराब होने के बावजूद आपदा से जुड़ी चेतावनी और जरूरी सूचनाएं दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचाई जा सकती हैं.
कुछ मिनटों में बदल गई थी पूरी तस्वीर
भोटेकोसी में जब पानी का सैलाब अचानक आया, तब लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिला. खतरे की सूचना बड़े पैमाने पर पहुंचाने से पहले ही चार हाइड्रोलॉजिकल मॉनीटरिंग सिस्टम बाढ़ की चपेट में आकर नष्ट हो चुके थे. बाद में करीब छह लाख लोगों के मोबाइल फोन पर आपदा से जुड़ी चेतावनी के संदेश भेजे गए, लेकिन तब तक हालात काफी बिगड़ चुके थे.
अब चीन बॉर्डर पर सबसे ज्यादा जोर
इस हादसे के बाद नेपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भविष्य में ऐसी आपदा आने पर चेतावनी कुछ मिनट पहले ही सही, लेकिन लोगों तक पहुंच जाए. खासतौर पर चीन की सीमा से लगे पहाड़ी इलाकों को लेकर चिंता ज्यादा है, क्योंकि यहां ग्लेशियर, भूस्खलन और अचानक आने वाले सैलाब का खतरा बना रहता है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रभावित इलाकों में आने वाले समय में भूस्खलन का खतरा भी बना हुआ है.
अगली आपदा से निपटने की तैयारी
ऐसे में नेपाल के लिए यह सिर्फ मौजूदा नुकसान से निपटने का मामला नहीं है, बल्कि अगली आपदा से पहले तैयारी करने की चुनौती भी है. यही वजह है कि नेपाल ने चीन बॉर्डर से लगे इलाकों में नए चेतावनी सिस्टम लगाने को प्राथमिकता दी है. सेंसर, कैमरे और सैटेलाइट आधारित संचार व्यवस्था के जरिए कोशिश यही है कि किसी भी बड़े खतरे के संकेत मिलते ही जानकारी तेजी से स्थानीय प्रशासन और आम लोगों तक पहुंचाई जा सके.
सबक साफ है, चेतावनी में देरी की कोई गुंजाइश नहीं
नेपाल की इस आपदा ने एक बात साफ कर दी है कि पहाड़ी इलाकों में सिर्फ बाढ़ आने के बाद राहत पहुंचाना काफी नहीं है. असली जरूरत ऐसे सिस्टम की है जो खतरे के कुछ मिनट पहले ही सही, लोगों को सुरक्षित जगह जाने का मौका दे सके. कुदरत के कहर को रोकना इंसान के हाथ में नहीं है, लेकिन उसके असर को कम करना जरूर संभव है. नेपाल अब अपने नए अर्ली वार्निंग सिस्टम के जरिए इसी दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है.
38 मिनट की देरी ने ली कई हजार लोगों की जान
नेपाल में बाढ़ की चेतावनी को लेकर एक गंभीर चूक सामने आई है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों ने लोगों तक चेतावनी के संदेश भेजने में करीब 38 मिनट की देरी की. बताया जा रहा है कि इस देरी की बड़ी वजह यह थी कि अधिकारियों को काफी देर तक इस बात का पता ही नहीं चल पाया कि अर्ली वार्निंग सिस्टम काम नहीं कर रहा है. दरअसल, नेपाल में अब तक जिन सिस्टम्स का इस्तेमाल किया जा रहा था, वे पूरी तरह से अर्ली वार्निंग सिस्टम नहीं थे. ये मुख्य रूप से मॉनिटरिंग स्टेशन थे, जिनका काम नदियों के जलस्तर पर नजर रखना और पानी बढ़ने की स्थिति में अलर्ट देना था.