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मुंबई पर खतरा टला, इस मुल्क के आसमान में 'स्विफ्ट' जला, ब्रह्मांड के हजारों धमाके देखने वाला टेलीस्कोप धरती पर दफन

मुंबई पर एक बड़ा खतरा टल गया. दरअसल, नासा के जिस स्पेस टेलीस्कोप के मुंबई पर गिरने का खतरा मंडरा रहा था, वह इंडोनेशिया के आसमान में खाक हो गया. इसी के साथ 22 साल पुराना स्पेस मिशन खत्म हो गया.

Written By Rachit Kumar
Published: Nov 05, 2026, 08:45 AM IST | Updated: Nov 05, 2026, 08:51 AM IST
Image Credit: नासा का टेलीस्कोप अब खाक हो चुका है.
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नासा का 22 साल पुराना 'स्विफ्ट' स्पेस टेलीस्कोप बुधवार को वापस धरती पर आ गिरा. पहले इसका मलबा मुंबई या हैदराबाद पर गिरने का खतरा था. लेकिन इंडोनेशिया के ऊपर वायुमंडल में एंट्री करते ही यह जल गया.इसी के साथ ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली विस्फोटों की स्टडी करने वाला दो दशक लंबा मिशन खत्म हो गया. इसी के साथ भारत के लोगों को राहत मिली है.

'नील गेहरेल्स स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी' की वापसी इसकी लाइफ को बढ़ाने के लिए चलाए गए एक रेस्क्यू मिशन के फेल होने के तीन महीने से भी कम समय बाद हुई है.

नासा के मुताबिक, यह टेलीस्कोप इंडोनेशिया के उत्तरी सुमात्रा प्रांत के ऊपर वायुमंडल में फिर दाखिल हुआ. उस समय इसकी रफ्तार आवाज की रफ्तार से लगभग 22 गुना ज्यादा थी.

स्पेस एजेंसी को उम्मीद थी कि 1,452 किलोग्राम वजनी इस स्पेसक्राफ्ट का ज्यादातर हिस्सा फ्रिक्शन से पैदा हुई गर्मी के कारण जल जाएगा, हालांकि कुछ मलबे के बचने की संभावना हो सकती है. जमीन पर किसी तरह के नुकसान या किसी के घायल होने की कोई खबर नहीं है.

बचाव मिशन फेल, टेलीस्कोप का अंत

नासा ने पहले ही मलबे के गिरने के जोखिम को बहुत कम आंका था. उनके अनुमान के मुताबिक,धरती पर किसी शख्स को नुकसान पहुंचने की संभावना 2,100 में से केवल 1 थी.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटिश कंपनी 'एक्कू कंपोनेंट्स' के एयरोस्पेस इंजीनियर डीन स्लेडेन ने कहा कि जमीन तक केवल कुछ छोटे, जले हुए टुकड़े ही पहुंचने की उम्मीद थी.

उन्होंने कहा,'इस आकार के सैटेलाइट्स वायुमंडल में वापस आते रहे हैं, और स्पेस उड़ानों के लगभग 70 साल के इतिहास में, कभी भी गिरते हुए मलबे से किसी की जान नहीं गई है.'

नासा ने जुलाई में एरिजोना स्थित स्टार्टअप 'कैटलिस्ट' के साथ मिलकर एक रेस्क्यू मिशन के जरिए 'स्विफ्ट' को बचाने की कोशिश की थी. उनका लिंक स्पेसक्राफ्ट इस तरह डिजाइन किया गया था कि वह ऑब्जर्वेटरी से जुड़कर उसे एक ऊंची कक्षा यानी ऑर्बिट में धकेल सके.

बेकाबू होकर घूमने लगा लिंक

हालांकि, अंतरिक्ष में पहुंचने के बाद 'लिंक' बेकाबू होकर घूमने लगा, जिसके कारण मिशन मैनेजर्स को इस कोशिश को रोकना पड़ा.

दो दशकों तक क्रांतिकारी खोज करने वाले स्विफ्ट को साल 2004 में लॉन्च किया गया था. हालांकि, इसकी डिजाइनिंग 2 साल के लिए ही हुई थी. इसका काम 'गामा-रे बर्स्ट' की स्टडी करना था, जो ब्रह्मांड में होने वाले सबसे शक्तिशाली विस्फोटों में से एक हैं. यह अपने तय जीवनकाल से कहीं ज्यादा यानी पूरे 22 साल तक काम करता रहा.

इस दौरान, इसने सुपरनोवा, ब्लैक होल, एक्स-रे फ्लेयर्स, एस्टेरॉयड्स और धूमकेतुओं का भी जांच-परख किया. करीब 7,000 साइंटिफिक रिसर्च पेपर्स को बनाने में इसका बेहद अहम योगदान रहा.कई महीनों तक इसके ऑर्बिट में गिरावट आई. फिर 20 अक्टूबर को टेलीस्कोप ने काम करना बंद कर दिया.

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About the Author

रचित कुमार जी न्यूज डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर हैं. देश, दुनिया और डिफेंस की खबरों को आसान भाषा में बताने में महारत हासिल है. जी न्यूज से मई 2022 में जुड़े और शिफ्ट देखने का 12 साल से ज्यादा का अनुभव है. जी न्यूज में Best Performer अवॉर्ड भी मिल चुका है. जी न्यूज, आजतक और एबीपी न्यूज में शिफ्ट देखते हुए महामहिम, बिहार के बाहुबली सीरीज शुरू की और कई एक्सप्लेनर खबरों पर काम किया.  इंडिया न्यूज और जनसत्ता में शिफ्ट देखने के साथ-साथ ट्रैफिक लाने वाली खबरों को तवज्जो दी. नवभारत टाइम्स से करियर की शुरुआत हुई और वहां तकरीबन ढाई साल तक फ्रंट पेज 2 और देश-विदेश के पन्नों की जिम्मेदारी संभाली. जर्नलिज्म में पोस्टग्रेजुएट और IIMC से डिप्लोमा करने  वाले रचित कुमार 13 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. आप Rachit.kumar@India.com पर सीधे ईमेल कर इनसे जुड़ सकते हैं. 
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