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खाने पर CO2 की मार, प्रोटीन पर उठे सवाल: किचन तक पहुंचा ग्लोबल वार्मिंग का असर, थाली से गायब हो रहे ये जरूरी पोषण

जलवायु परिवर्तन को लेकर आई हालिया एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पर्यावरण में बढ़ते CO2 के कारण गेहूं में प्रोटीन की मात्रा कम हो रही है. प्रोटीन के बदलते स्वरूप के कारण इससे शरीर को मिलने वाले पोषण में भी कमी नजर आ सकती है.

Written By abhinav tripathi
Published: Oct 18, 2026, 12:05 PM IST | Updated: Oct 18, 2026, 12:09 PM IST
Image Credit: CO2 का असर सीधे आपकी थाली पर दिख रहा असर. (फोटो- एआई)
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जलवायु परिवर्तन यानी क्लाइमेट चेंज की बात आते ही मन में कई प्रकार से सवाल खड़े होते हैं. इस बीच एक नई स्टडी सामने आई है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब हमारी रसोई में भी पहुंच गया है. पर्यावरण में बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की मात्रा सीधे हमारे भोजन को बदल रहा है. इसका सीधा असर खाने से मिलने वाले प्रोटीन में भी दिख रहा है.

दरअसल, हालिया एक शोध में दावा किया गया है कि गेहूं के भीतर मौजूद प्रोटीन में काफी बदलाव नजर आ रहा है. चूंकि, गेहूं हमारी रसोई का एक अहम हिस्सा है. इन बदलावों से बेक किए गए खाद्य पदार्थों (जैसे ब्रेड) की गुणवत्ता खराब हो सकती है. इसके साथ ही भोजन से जुड़ी बीमारियों के लिए भी यह चिंता की बात मानी जा रही है. आइए आपको इस शोध और इसके प्रभाव के बारे में बताते हैं...

शोध में क्या बताया गया?

हाल में ही म्यूनिख की टेक्निकल यूनिवर्सिटी के लीबनिज इंस्टीट्यूट फॉर सिस्टम बायोलॉजी ने एक नई स्टडी की है. इसमें पाया गया कि CO2 का स्तर बढ़ने के कारण गेहूं के प्रोटीन ही बदल रहे हैं. भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में गेहूं बहुत ज्यादा खाया जाता है. रोजमर्रा के खाने में रोटी, चपाती और ब्रेड बनाने के लिए गेहूं का खूब इस्तेमाल किया जाता है.

शोध में कहा गया है कि हवा में बढ़ते कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर लगातार बढ़ रहा है. साल 1980 में यह करीब 340 पार्ट्स पर मिलियन यानी ppm था. वहीं, साल 2024 में यह बढ़कर करीब 425 ppm हो गया है. शोधकर्ताओं ने कहा कि साल 2020 तक यह स्तर 600 ppm पहुंच सकता है. जो वास्तव में हमारे खाने की गुणवत्ता पर असर डालेगा.

कैसे की गई शोध

वैज्ञानिकों की एक टीम ने पर्यावरण में बढ़ते CO2 का असर जांचने के लिए एक खास प्रयोग किया. शोधकर्ताओं ने खेतों में सर्दियों वाले गेहूं की 10 अलग-अलग किस्में उगाईं. कुछ पौधों को 546 ppm वाले अधिक CO2 के बीच रखा गया. इसके अलावा कुछ पौधों को सामान्य हालात में उगाया गया.

फसल के हो जाने के बाद उसके काटा गया और फिर वैज्ञानिकों ने दोनों के प्रोटीन की जांच की. इस दौरान पाया गया कि अधिक CO2 की वजह से कुछ खास प्रोटीन बढ़ गए थे. ये प्रोटीन गेहूं को कीड़ों से बचाने में मदद करते हैं, लेकिन दानों में ग्लूटेन और अन्य जरूरी प्रोटीन की मात्रा बहुत कम मिली.

क्यों जरूरी है ग्लूटेन प्रोटीन

ग्लूटेन प्रोटीन का वह ग्रुप है, जो आटे को खिंचाव देता है. यह आटे को एक साथ बांधकर रखता है. ब्रेड और बेकरी की दूसरी चीजें बनाने के लिए ग्लेटेन बहुत आवश्यक माना जाता है. हालांकि, गेहूं की हर किस्म में यह बदलाव एक जैसा नहीं था. आपको जानना चाहिए कि इस स्टडी की प्रमुख शोधकर्ता सबरीना गीस्लिट्सज हैं, जिन्होंने बताया कि यह बदलाव काफी हद तक गेहूं की किस्म पर निर्भर करता है. उनकी ओर से यह भी कहा गया कि हमारे इन नतीजों से पता चलता है कि ग्लूटेन प्रोटीन कम होने से बेकिंग क्वालिटी खराब हुई है.

बदलते प्रोटीन का खाने पर क्या होगा असर?

नई शोध से माना जा रहा है कि गेहूं में बदलते प्रोटीन का सीधा असर इंसानी शरीर पर भी देखने को मिलेगा. शोधकर्ताओं ने सीलिएक रोक से जुड़े प्रोटीन में भी बदलाव देखे हैं. सीलिएक रोग एक प्रकार की ऐसी बीमारी है, जिसके कारण शरीर का इम्यून सिस्टम ग्लूटेन को नहीं पचा पाता है. इस कारण छोटी आंत को नुकसान पहुंचने की प्रबल संभावना रहती है.

हालांकि, इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि इस स्टडी में यह नहीं कहा गया कि CO2 के बढ़ने से ज्यादा लोगों को यह बीमारी होने लगेगी. संस्थान की एक अन्य शोधकर्ता कैटरीना शेर्फ ने भी इस विषय पर अपनी बातें रखी हैं. उन्होंने कहा कि गेहूं से जुड़ी बीमारियों के मामले में यह बदलाव लंबे समय में अपना असर दिखा सकते हैं. उन्होंने कहा कि इन बदलावों का शरीर पर क्या असर होगा, इसको समझने के लिए अभी और स्टडी की जरूरत है.

किसानों की दी गई ये सलाह

वहीं, अंत में शोधकर्ताओं ने किसानों और वैज्ञानिकों को एक सलाह भी दी. उनका कहना है कि अब केवल अधिक फसल उगाने पर ही ध्यान नहीं देना होगा, बल्कि हमें गेहूं की ऐसी किस्में विकसित करनी चाहिए, जो बढ़ते CO2 में भी बेकिंग की अच्छी क्वालिटी दें. उसमें ऐसे प्रोटीन कम होने चाहिए, जिन्हें पचाने में कुछ लोगों को दिक्कत हो रही हो. 

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About the Author

अभिनव त्रिपाठी जी न्यूज हिंदी में बतौर सब एडिटर कार्यरत हैं।  पत्रकारिता के क्षेत्र में 3 साल से अधिक समय का अनुभव रखते हैं। डेस्क पर रियल टाइम की देश-विदेश की खबरों को कवर करते हैं। राष्ट्रीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय खबरों को लिखना पसंद है। वैश्विक घटनाक्रम के किसी भी जटिल मुद्दे को आसान भाषा में समझाना अच्छी तरीके से आता है। इससे पहले जागरण डॉट कॉम के साथ सब एडिटर के तौर पर काम कर चुके हैं।  करियर की शुरुआत एक सैटेलाइट चैनल से की थी। पत्रकारिता की पढ़ाई काशी विद्यापीठ वाराणसी से की है। 
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