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Dehradun News: उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) में एक बार फिर संगठनात्मक असहमति सामने आई है. बुधवार को अल्मोड़ा में केंद्रीय और जिला स्तर के 17 पदाधिकारियों ने पार्टी से इस्तीफा देने की घोषणा की. उन्होंने यूकेडी-डी के साथ आगे की राजनीतिक गतिविधियां जारी रखने की बात कही. इस दौरान बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक मौजूद रहे.
नेताओं की बातों और कार्यों में विरोधाभास
यूकेडी के केंद्रीय संगठन मंत्री रहे नरेंद्र सिंह बिष्ट ने पार्टी नेतृत्व पर उपेक्षा का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि नेताओं की बातों और कार्यों में विरोधाभास दिखाई दे रहा है और संगठन के संविधान के खिलाफ भी काम किए जा रहे हैं. इन्हीं कारणों से 17 से अधिक पदाधिकारियों और कई कार्यकर्ताओं ने पार्टी छोड़ने का फैसला लिया.
रोजगार और शिक्षा पर काम करने की बात कही
नरेंद्र बिष्ट ने कहा कि आगे जल, जंगल और जमीन के साथ रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन जैसे क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर काम किया जाएगा. उन्होंने कहा कि यह फैसला किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि संगठन की कार्यप्रणाली और निर्णय प्रक्रिया को लेकर असहमति के चलते लिया गया है.
इन्होंने दिया इस्तीफा
इस्तीफा देने वालों में कार्यकारी अध्यक्ष पवन लतवाल, जिला उपाध्यक्ष विनोद बिष्ट, जिला महामंत्री सचिन जोशी, केंद्रीय संगठन मंत्री नरेंद्र सिंह बिष्ट, मंडल उपाध्यक्ष नीरज सिंह मेहता, मंडल अध्यक्ष पंकज सिंह बिष्ट, बागेश्वर जिला महामंत्री पंकज भट्ट, जिला महिला प्रकोष्ठ अध्यक्ष दीपा जोशी, संगठन मंत्री प्रियंका बिष्ट, कोषाध्यक्ष किरण मेहरा, आरती आर्य, मनीषा नेगी, सरस्वती आर्य और सुंदर सिंह शामिल हैं.
उत्तराखंड राज्य बनने से पहले की है पार्टी
बता दें कि उत्तराखंड क्रांति दल की स्थापना साल 1979 में हुई थी. यूकेडी ने उत्तराखंड अलग राज्य बनने में भूमिका निभाई थी. 2000 में उत्तराखंड अलग राज्य बनने के बाद 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में यूकेडी ने 4 सीटों पर जीत दर्ज की थी. 2007 के विधानसभा चुनाव में यूकेडी के खाते में तीन सीटें गईं. हालांकि, 2012 के चुनाव में यूकेडी एक ही सीट जीत सका. 2017 के बाद यूकेडी का कोई विधायक नहीं बना. आज भी यूकेडी के पास विधानसभा में कोई सीट नहीं है, लेकिन यूकेडी अपने मूल मुद्दों, स्थायी राजधानी, मूलनिवास कानून, पलायन, शिक्षा और रोजगार को लेकर सक्रिय है.
पहले भी पार्टी में टकराव की स्थिति बनी रही
उत्तराखंड क्रांति दल के भीतर कई बार बार टकराव हो चुके हैं. यही वजह है कि पार्टी को नुकसान पहुंचता रहता है. पार्टी के भीतर चुनाव चिन्ह को लेकर दो फाड़ हो चुकी है. पार्टी के भीतर की लड़ाई चुनाव आयोग तक पहुंची. साल 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन पार्टी के अध्यक्ष त्रिवेंद्र सिंह पवार उत्तराखंड क्रांति दल पी और पार्टी के वरिष्ठ नेता दिवाकर भट्ट के नेतृत्व में उत्तराखंड क्रांति दल डी के रूप में पार्टी दो भागों में बट गई. आयोग ने पार्टी का चुनाव चिह्न कुर्सी को भी जब्त कर लिया. हालांकि बाद में दोनों गुटों का विलय हो गया और 2017 में उत्तराखंड क्रांति दल नाम और चुनाव चिह्न बहाल कर दिया गया.