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हरीश रावत. उत्तराखंड की राजनीति का वो नाम, जिसे सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्री कहना शायद उनके पूरे राजनीतिक सफर को बयां नहीं करता. 27 अप्रैल 1948 को अल्मोड़ा के मोहनरी गांव में जन्मे हरीश रावत ने ग्राम प्रधान से शुरू होकर उत्तर प्रदेश की राजनीति, लोकसभा, केंद्र की सरकार और फिर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद तक का सफर तय किया.
लेकिन उनकी कहानी सिर्फ उपलब्धियों की कहानी नहीं है. इसमें लगातार संघर्ष, सत्ता के लिए लंबी प्रतीक्षा, संगठन के भीतर टकराव, राजनीतिक वापसी, चुनावी हार और विवादों से जूझने की क्षमता शामिल है.
आज, जब उत्तराखंड कांग्रेस 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी है और पार्टी लगातार संगठनात्मक कमजोरी, आपसी खींचतान और नेतृत्व के सवालों से जूझ रही है, हरीश रावत का महत्व एक बार फिर सामने आता है.
लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या वह कांग्रेस के लिए समाधान हैं या उस समस्या का हिस्सा भी, जिससे पार्टी लंबे समय से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है?
हरीश रावत की राजनीतिक कहानी का पहला महत्वपूर्ण अध्याय किसी बड़े मंच से नहीं, बल्कि अल्मोड़ा के एक दूरदराज गांव मोहनरी से शुरू होता है.
1972 में उन्होंने ग्राम प्रधान का चुनाव जीता और अगले ही वर्ष ब्लॉक प्रमुख बने. यानी जिस व्यक्ति ने आगे चलकर दिल्ली की सत्ता के गलियारों में अपनी जगह बनाई उसकी राजनीति की पहली प्रयोगशाला गांव था.
1977 में वह यूथ कांग्रेस के जिला अध्यक्ष बने. इसी दौर में उनकी मुलाकात संजय गांधी से हुई. इसके बाद 1980 में कांग्रेस ने उन्हें अल्मोड़ा से लोकसभा का टिकट दिया.
रावत ने उस चुनाव में भाजपा के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी को हराया. अगले चुनाव में भी उन्होंने जोशी को मात दी. यह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं थी, यह उस दौर के एक उभरते पहाड़ी नेता के राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश की घोषणा थी.
लेकिन यहां एक दिलचस्प बात यह है कि रावत की यात्रा हमेशा जीत की सीधी रेखा नहीं रही. वह अल्मोड़ा लोकसभा सीट लगातार तीन बार (1996, 1998 और 1999 में) भाजपा के बच्ची सिंह रावत से हारे.
यानी उनकी राजनीति का चरित्र जीत से ज्यादा वापसी का रहा. हार के बाद फिर खड़ा होना शायद उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की सबसे स्थायी विशेषता है.
उत्तराखंड के गठन के बाद 2000 में मुख्यमंत्री बनने की रावत की सबसे बड़ी राजनीतिक महत्वाकांक्षा स्पष्ट हो गई थी. 2002 में राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की.
रावत उस समय प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे और चुनावी जीत में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी.
स्वाभाविक रूप से मुख्यमंत्री पद की दावेदारी उनके सामने थी लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने अनुभवी नेता एनडी तिवारी को मुख्यमंत्री बना दिया.
यह वह क्षण था जहां किसी नेता का राजनीतिक धैर्य टूट सकता था लेकिन रावत ने इंतजार किया.
2012 में दूसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी उनसे दूर हुई. विधानसभा चुनाव के बाद विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाए जाने के फैसले से रावत नाराज हुए.
उन्होंने हाईकमान के निर्णय का विरोध किया. उनके पास 32 में से 17 कांग्रेस विधायकों का खुला समर्थन था, जिन्होंने बहुगुणा के शपथ ग्रहण का विरोध किया था. फिर भी मुख्यमंत्री की कुर्सी उन्हें नहीं मिली.
लेकिन राजनीति में कभी-कभी सबसे लंबा इंतजार ही सबसे बड़ी पूंजी बन जाता है. वो केंद्र में सक्रिय रहे. 5 बार सांसद लोकसभा और राज्यसभा में रहे. यूपीए-दो में कैबिनेट मंत्री भी रहे.
2012 से 2014 तक मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय जल संसाधन मंत्री रहे. उससे पहले उन्होंने संसदीय कार्य मंत्रालय, कृषि मंत्रालय और श्रम एवं रोजगार मंत्रालय में राज्य मंत्री के तौर पर भी अपनी सेवाएं दी थीं. फिर वे उत्तराखंड की राज्य राजनीति में लौटे.
2014 में विजय बहुगुणा के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ बढ़ते असंतोष और 2013 की विनाशकारी बाढ़ के बाद कांग्रेस ने आखिरकार रावत को मुख्यमंत्री बनाया.
66 साल की उम्र में उन्होंने वह कुर्सी हासिल की जिसका सपना उन्होंने राज्य बनने के बाद देखा था.
यहां हरीश रावत की जुझारूपन की पहली बड़ी परिभाषा मिलती है कि वह ऐसे नेता हैं जिन्हें सत्ता हमेशा पहली कोशिश में नहीं मिली, लेकिन उन्होंने सत्ता की दौड़ कभी छोड़ी भी नहीं.
हरीश रावत की राजनीतिक जिंदगी का सबसे नाटकीय अध्याय 2016 का उत्तराखंड संकट था.
कांग्रेस के भीतर बगावत हुई. केंद्र ने राष्ट्रपति शासन लगाया और रावत मुख्यमंत्री की कुर्सी से बाहर हो गए. उनके सामने सिर्फ सरकार बचाने की चुनौती नहीं थी, बल्कि अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने का सवाल भी था.
इसी दौरान उनके खिलाफ कथित विधायकों की खरीद-फरोख्त से जुड़ा स्टिंग सामने आया. रावत ने स्टिंग को फर्जी बताया और भाजपा पर साजिश का आरोप लगाया. बाद में सीबीआई ने भी कथित हॉर्स ट्रेडिंग स्टिंग के सिलसिले में उनसे पूछताछ की प्रक्रिया शुरू की.
इसके बावजूद कहानी का अगला दृश्य पूरी तरह अलग था. सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में विधानसभा में फ्लोर टेस्ट हुआ और रावत के पक्ष में 33 विधायकों ने वोट किया जबकि 28 उनके खिलाफ थे. इसके बाद वह दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लौटे.
यह उनकी राजनीति का शायद सबसे मजबूत दृश्य था. उनकी सरकार गई, मुख्यमंत्री पद गया, पार्टी टूटने की कगार पर पहुंची, उन पर गंभीर राजनीतिक आरोप लगे, लेकिन अंत में वह विधानसभा के शक्ति परीक्षण में वापस खड़े थे.
इसीलिए हरीश रावत के व्यक्तित्व को समझने के लिए 'जुझारू' शब्द महज राजनीतिक विशेषण नहीं है. वह संकट में अपनी राजनीतिक उपयोगिता साबित करने की क्षमता रखते हैं.
लेकिन हर संघर्ष का अंत जीत नहीं होता. 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हार गई और रावत स्वयं दो विधानसभा सीटों, हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा से चुनाव हार गए.
बाद के वर्षों में भी उनकी चुनावी यात्रा आसान नहीं रही. 2019 में लोकसभा चुनाव में उन्हें बड़ी हार मिली और 2022 में लालकुआं विधानसभा सीट से भी उन्हें भाजपा के मोहन सिंह बिष्ट ने हरा दिया. उस चुनाव में कांग्रेस 19 सीटें जीत पाई, जबकि भाजपा 47 सीटों के साथ सत्ता में लौटी.
2022 की हार इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि रावत को कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद का सबसे प्रमुख चेहरा माना जा रहा था. उनके सामने एक ऐसी पार्टी थी जिसके भीतर गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर लगातार खींचतान थी. फिर भी उन्होंने राजनीति से दूरी नहीं बनाई।
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड की पांचों सीटें भाजपा ने जीतीं और कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी. कांग्रेस का वोट शेयर करीब 32.83 प्रतिशत रहा.
पार्टी के अपने पोस्टमार्टम में भी समन्वय, सामंजस्य और नेताओं के बीच संवाद की कमी को बड़ी समस्या बताया गया.
यही वह जगह है जहां रावत का वर्तमान महत्व समझ में आता है. हरीश रावत की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत शायद यह है कि वह उत्तराखंड की राजनीति को सिर्फ देहरादून की सत्ता के नजरिए से नहीं देखते.
उनकी राजनीति की जड़ें गांव, पहाड़, प्रवास, किसान, स्थानीय रोजगार और क्षेत्रीय अस्मिता के सवालों में रही हैं. लेकिन दो बड़ी कमजोरियां भी हैं.
हरीश रावत की ताकत ही उनकी कमजोरी भी बन जाती है. वह खुद एक मजबूत राजनीतिक ब्रांड हैं, लेकिन कांग्रेस के भीतर उनकी राजनीति को लेकर कई बार यह धारणा बनी कि राज्य की राजनीति उनके इर्द-गिर्द ज्यादा घूमती है.
2022 में कांग्रेस की हार के विश्लेषणों में गुटबाजी और नेतृत्व संघर्ष प्रमुख कारणों में गिने गए. रावत और दूसरे वरिष्ठ नेताओं के बीच खींचतान ने पार्टी के सामूहिक नेतृत्व की छवि को नुकसान पहुंचाया.
यानी रावत भीड़ जुटा सकते हैं, कार्यकर्ताओं को ऊर्जा दे सकते हैं और भाजपा से लड़ने का नैरेटिव बना सकते हैं लेकिन उनके सामने बड़ी चुनौती यह है कि क्या वह अपने आसपास एक नई, दूसरी पंक्ति का नेतृत्व तैयार कर सकते हैं?
दूसरा, रावत के राजनीतिक करियर में स्टिंग, विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप और सरकार के दौरान उठे भ्रष्टाचार संबंधी सवाल भी जुड़े रहे हैं. इन आरोपों को प्रमाणित तथ्य की तरह पेश करना सही नहीं होगा लेकिन राजनीतिक धारणा के स्तर पर इनका प्रभाव नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
सबसे ताजा मामला सितंबर 2026 का है. ईडी ने 10 सितंबर 2026 को उनके पूर्व ओएसडी और मौजूदा निजी सहयोगी चंदन सिंह जीना के परिसरों पर छापा मारा. इसके बाद, 12 सितंबर 2026 को हरीश रावत ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पार्टी के संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे दिया.
बाद में रावत ने सोशल मीडिया (X) पर यह भी लिखा कि कांग्रेस पार्टी की सदस्यता मेरे खून और हड्डियों में है. मैंने केवल संगठनात्मक पदों से हटने की बात कही है ताकि भ्रष्टाचार के खिलाफ पार्टी का संघर्ष कमजोर न हो.
यह कार्रवाई 2016 की UKSSSC ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़ी जांच के संदर्भ में हुई. रावत ने आरोपों से असहमति जताई और इसे चुनाव से पहले राजनीतिक नैरेटिव बनाने की कोशिश बताया.
यहां भी एक महत्वपूर्ण अंतर बनाए रखना जरूरी है कि ईडी की कार्रवाई उनके सहयोगी के खिलाफ हुई है, इससे अपने आप रावत की व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी सिद्ध नहीं होती.
लेकिन वरिष्ठ नेता के रूप में राजनीतिक जवाबदेही और सार्वजनिक धारणा का सवाल जरूर पैदा होता है.
आज कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ बीजेपी को हराना नहीं, बल्कि संगठन को फिर से चुनावी मशीन में बदलना है. 2024 में कांग्रेस उत्तराखंड की पांचों लोकसभा सीटें हार गई. 2022 में 19 विधानसभा सीटों तक पहुंचने के बावजूद वह सरकार बनाने से काफी दूर रही.
2027 की लड़ाई के लिए कांग्रेस को एक ऐसा नेता चाहिए जो पहाड़ और मैदान, कुमाऊं और गढ़वाल, पुराने कार्यकर्ता और नए मतदाता के बीच संवाद स्थापित कर सके.
रावत इस भूमिका में उपयोगी हो सकते हैं लेकिन मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर नहीं बल्कि राजनीतिक रणनीतिकार, कैंपेन फेस और संगठन के वरिष्ठ मार्गदर्शक के तौर पर.
वह अब चुनाव न लड़ने की बात कह चुके हैं और पार्टी को जिताने पर ध्यान देने का संकेत दिया है. अगस्त 2026 में उन्होंने राजनीति से संन्यास की अफवाहों को भी खारिज किया था.
यही शायद उनके राजनीतिक जीवन का अगला और सबसे महत्वपूर्ण अध्याय हो सकता है.
हरीश रावत की कहानी को सिर्फ 'पूर्व मुख्यमंत्री' की कहानी कहना उनके राजनीतिक सफर को छोटा कर देना होगा. वह उस पीढ़ी के नेता हैं जिन्होंने उत्तराखंड की राजनीति को बनते हुए देखा और खुद भी उस राजनीति को आकार दिया.
ग्राम प्रधान से मुख्यमंत्री तक पहुंचना आसान नहीं था. लेकिन अब उनके सामने सबसे कठिन सवाल है कि क्या वह अपने संघर्ष को कांग्रेस की सामूहिक ताकत में बदल पाएंगे?
कांग्रेस को अगर रावत से सिर्फ भाषण और भीड़ चाहिए तो वह उनके राजनीतिक अनुभव का छोटा इस्तेमाल होगा.
पार्टी को उनसे संगठन के पुराने नेटवर्क को नए नेतृत्व से जोड़ने, गुटों को साथ बैठाने, पहाड़ के मुद्दों को चुनावी एजेंडे में बदलने और बीजेपी के खिलाफ एक विश्वसनीय वैकल्पिक नैरेटिव तैयार करने की जरूरत है.
और रावत के लिए भी यह शायद आखिरी बड़ी राजनीतिक परीक्षा है. अब सवाल यह नहीं कि हरीश रावत मुख्यमंत्री बनेंगे या नहीं.
सवाल यह है कि क्या वह ऐसा उत्तराखंड कांग्रेस तैयार कर पाएंगे जिसमें अगला मुख्यमंत्री कोई दूसरा बने और फिर भी यह कहा जाए कि उस जीत की जमीन हरीश रावत ने तैयार की थी?
यही उनके लंबे राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि और सबसे बड़ी चुनौती भी हो सकती है.