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वाराणसी: दीपावली से एक दिन पहले नरक चतुर्दशी यानी छोटी दिवाली पर काशी में सबसे बड़ा अनुष्ठान यम दीपदान का होता है. बाकी शहरों में जहां दिवाली की तैयारियां होती हैं, वहीं काशी में लोग सबसे पहले यमराज को दीपक चढ़ाते हैं. ऐसी मान्यता है इस दिन जो काशी में यम दीपदान करता है, उसे यमलोक नहीं, शिवलोक मिलता है. अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है. इसी आस्था के चलते काशी के गंगा घाटों पर दीपदान किया जाता है. दशाश्वमेध, अस्सी और मणिकर्णिका घाट सहित कई घाटों पर श्रद्धालु दीप जलाकर गंगा में प्रवाहित करते हैं.
नरक चौदस पर यम दीपदान का सबसे शुभ समय गोधूलि बेला यानी प्रदोष काल है. इस बार मुहूर्त - 7 नवंबर 2026, शुक्रवार शाम
यम दीपदान मुहूर्त: शाम 5:31 बजे से रात 8:09 बजे तक
गोधूलि बेला: शाम 5:31 - 5:55 बजे (सबसे उत्तम)
प्रदोष काल: शाम 5:31 - 8:09 बजे
एक मिट्टी का नया दीया लें और इसमें सरसों का तेल डालें. चार बत्तियां लगाएं.चार बत्तियां चार दिशाओं और चारों युगों की प्रतीक मानी जाती हैं. दीपक को घर के मुख्य द्वार के बाहर, दक्षिण दिशा में रखें. दक्षिण दिशा ही यमराज की दिशा मानी जाती है. इसके बाद हाथ जोड़कर बोलें - "ॐ यमाय नमः, ॐ धर्मराजाय नमः" फिर इसके बाद प्रार्थना करें - घर में अकाल मृत्यु का भय न हो, परिवार में सुख-शांति बनी रहे.कहते हैं इस दीपक को जलाने के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए. दीपक को बुझाना भी नहीं चाहिए, उसे अपने आप बुझने देना चाहिए.
वाराणसी में नरक चौदस की शाम को गंगा घाटों पर अद्भुत नजारा दिखाई देता है. दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट, मणिकर्णिका घाट, हरिश्चंद्र घाट पर हजारों लोग गंगा में दीप प्रवाहित करते हैं. लोग पत्तों के दोने में दीप रखकर गंगा में छोड़ते हैं.
काशी के पंडितों के अनुसार, 14 दीयों के 3 बड़े अर्थ हैं....
14 लोकों के लिए: भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक समेत 14 लोकों के कल्याण के लिए
14 पीढ़ियों के पूर्वजों के लिए: अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए
यम के 14 नामों के लिए: यम, धर्मराज, मृत्यु, अंतक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दध्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र, चित्रगुप्त - इन 14 नामों से यमराज को प्रणाम किया जाता है.
मणिकर्णिका घाट पर तो मान्यता और भी गहरी है. ऐसा कहा जाता है मणिकर्णिका पर अंतिम संस्कार होने से मोक्ष मिलता है. इसलिए यहां नरक चौदस पर लोग अपने पूर्वजों के नाम का दीप जलाकर गंगा में प्रवाहित करते हैं.
काशी में यम दीपदान के साथ-साथ काल भैरव मंदिर में भी इस दिन भारी भीड़ रहती है. मान्यता है काल भैरव काशी के कोतवाल हैं. काशी में रहने वाले या मरने वाले की रक्षा का जिम्मा उन्हीं का है. इससे जुड़ी एक कथा भी है. धार्मिक कथाओं में उल्लेख है कि एक बार यमराज काशी में किसी की आत्मा लेने आए, तो काल भैरव ने उन्हें रोक दिया. उन्होंने कहा-"काशी में जो मरता है, वो शिव का गण बनता है, यम का दास नहीं।" तभी से काशी में कहा जाता है -"काशी में यम का कोई अधिकार नहीं, यहां काल भैरव का राज चलता है।"इसलिए नरक चौदस पर लोग पहले काल भैरव के दर्शन करते हैं, फिर यम दीपदान करते हैं. काल भैरव मंदिर में इस दिन सरसों के तेल का दीपक, उड़द की दाल की कचौड़ी और जलेबी का भोग चढ़ाया जाता है.
नरक चौदस पर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में भी विशेष व्यवस्था रहती है. सुबह अभ्यंग स्नान के बाद लोग बाबा विश्वनाथ के दर्शन करते हैं. मान्यता है कि इस दिन बाबा के दर्शन से सारे पाप कट जाते हैं और नरक का भय खत्म हो जाता है. मंदिर प्रशासन के अनुसार, 7 नवंबर को सुबह मंगला आरती से लेकर रात शयन आरती तक विशेष दर्शन की व्यवस्था है.
नरक चौदस पर ही हनुमान जयंती है. इस बार 7 नवंबर को नरक चौदस के साथ-साथ हनुमान जयंती भी पड़ रही है. ये संयोग बहुत दुर्लभ माना जा रहा है. उत्तर भारत की मान्यता के अनुसार, कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की महानिशा में ही हनुमान जी का प्राकट्य हुआ था. इसलिए इस दिन को हनुमान जयंती के रूप में भी मनाया जाता है.
वाराणसी के प्रसिद्ध संकट मोचन मंदिर में इस दिन सुबह से ही भक्तों की भीड़ रहेगी.
सुबह 5 बजे मंगला आरती
दिनभर सुंदरकांड का पाठ
शाम को 56 भोग और हनुमान जी को सिंदूर-चमेली के तेल का लेप
रात को भंडारा
पंडितों का कहना है -इस बार नरक चौदस + हनुमान जयंती का संयोग होने से यम दीपदान का फल दोगुना मिलेगा. हनुमान जी संकट मोचन हैं, वो यम के भय से भी मुक्ति दिलाते हैं.
वाराणसी के पुराने मोहल्लों -बंगाली टोला, चौक, गोदौलिया, लक्सा में आज भी एक पुरानी परंपरा जिंदा है।रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दीया जलाकर पूरे घर में घुमाता है. फिर उसे घर से दूर चौराहे पर रखकर आता है। घर के बाकी लोग उस दीये को नहीं देखते. इसे "यम का दीया निकालना" कहते हैं. मान्यता है कि इससे घर की सारी नकारात्मकता, बीमारी और बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं.
सुबह: सूर्योदय से पहले तिल के तेल से मालिश + अपामार्ग (चिचड़ी) के पत्ते वाले पानी से अभ्यंग स्नान
दोपहर: काशी विश्वनाथ + काल भैरव दर्शन
शाम 5:31 बजे: घर के बाहर दक्षिण दिशा में 4 बत्तियों वाला यम दीपक
शाम 6:30 बजे: दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती + 14 दीप प्रवाहित करें
रात: संकट मोचन मंदिर में हनुमान जयंती दर्शनदान: जरूरतमंद को भोजन, तेल, दीया दान करें.