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UP Politics: उत्तर प्रदेश में एनडीए की सहयोगी आरएलडी नई सोशल इंजीनियरिंग तैयार करने में जुटी है. आरएलडी सामाजिक रूप से एक दूसरे से दूर रहने वाली जातियों जाट और गुर्जर को एक मंच पर लाने के प्रयास में है. इसके साथ दलित और मुस्लिम को भी जोड़ने की कोशिश है. यानी आरएलडी जाट, गुर्जर, दलित, मुस्लिम यानी 'JGDM कॉम्बिनेशन' बनाने में जुटी है.
क्या है रालोद का JGDM फार्मूला?
2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी गोटियां बिछानी शुरू कर दी है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए रालोद अब सिर्फ जाटों तक सीमित न रहकर एक बड़े सोशल इंजीनियरिंग पर काम कर रही है. इसे रालोद का JGDM (जाट, गुर्जर, दलित, मुस्लिम) फॉर्मूला कहा जा रहा है. माना जा रहा है कि अगर जयंत चौधरी का यह दांव चल गया तो आगामी विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा नुकसान अखिलेश यादव की अगुवाई वाले समाजवादी पार्टी को होना तय माना जा रहा है.
JGDM फॉर्मूला का मकसद
रालोद जाट, गुर्जर, दलित और मुस्लिम समुदायों को एक साथ लाकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी के राजनीतिक और सामाजिक जनाधार को बड़ा बनाना चाह रही है. RLD ने इसके लिए विशेष तौर पर पश्चिम यूपी में गांव-गांव में 10-10 सदस्यों की विशेष टीम गठित की है, जो सीधे जमीन पर काम करके अपनी रिपोर्ट शीर्ष नेतृत्व को सौंपेगी.
35 से 40 सीटों की मांग
2022 के विधानसभा चुनाव में रालोद ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर 33 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. इस बार कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि पार्टी को 35 से 40 सीटें मिलनी चाहिए, ताकि हर समाज (जाट, गुर्जर, ब्राह्मण, मुस्लिम, दलित) को उचित प्रतिनिधित्व दिया जा सके.
आपसी रिश्ते और भाईचारा मजबूत करने में जोर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और गुर्जर समाज बड़ी तादाद में हैं, इसलिए उनका समन्वय पर रालोद फोकस कर रहा है. चौधरी चरण सिंह से लेकर चौधरी अजीत सिंह और अब जयंत चौधरी ने हमेशा किसानों के हक की लड़ाई लड़ी है. कोरोना काल और किसान आंदोलन के समय जयंत चौधरी ने दर्जनों सभाएं करके माहौल बनाया था. अब रालोद का प्रयास है कि किसान जातियों (जाट और गुर्जर) और मुस्लिम, दलित के बीच ऐसा सामाजिक सामंजस्य बने, जिससे न केवल राजनीतिक लाभ मिले बल्कि आपसी रिश्ते और भाईचारा भी मजबूत हो.