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मौत की सजा मिलने के बाद अब आगे क्या? जानिए मुस्कान और साहिल के पास बचे कानूनी विकल्प और फांसी की पूरी प्रक्रिया

मेरठ के चर्चित 'नीला ड्रम हत्याकांड' में अदालत ने मुख्य आरोपी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड (फांसी) की सजा सुनाई है. हालांकि, सेशन कोर्ट से मृत्युदंड मिलने के बाद भी भारतीय न्यायिक प्रक्रिया के तहत दोषियों के पास कानूनन कई विकल्प मौजूद रहते हैं। आइए समझते हैं कि सेशन कोर्ट के इस फैसले के बाद यह मामला कानूनी रूप से आगे कैसे बढ़ता है और दोषियों के पास राहत के क्या-क्या रास्ते बचते हैं

मौत की सजा मिलने के बाद अब आगे क्या? जानिए मुस्कान और साहिल के पास बचे कानूनी विकल्प और फांसी की पूरी प्रक्रिया
Image Credit: Meerut Blue Drum Murder Case

Meerut Blue Drum Murder Case: मेरठ के बहुचर्चित 'नीला ड्रम हत्याकांड' में अदालत द्वारा मुख्य आरोपी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड (फांसी की सजा) सुनाए जाने के बाद, भारतीय कानूनी प्रक्रिया के तहत दोषियों के पास कई चरण और कानूनी विकल्प बचे हुए हैं.  सेशन कोर्टसे सजा मिलने के बाद मामला किस तरह आगे बढ़ता है और क्या-क्या विकल्प होते हैं, आइए इसे समझते है.

1. सेशन कोर्ट से मृत्युदंड मिलने के बाद आगे की प्रक्रिया 
भारतीय न्याय संहिता (BNS) और आपराधिक प्रक्रिया कानून के अनुसार, सेशन कोर्ट द्वारा दी गई मौत की सजा स्वचालित रूप से अंतिम नहीं होती और न ही इसे तुरंत लागू किया जा सकता है.

सेशन कोर्ट से सजा मिलते ही फांसी नहीं होती,हाईकोर्ट की मुहर अनिवार्य
सेशन कोर्ट जब भी Death Sentence देता है, तो CrPC की धारा 366 के तहत उस सजा को हाईकोर्ट से कन्फर्म करवाना अनिवार्य होता है. जब तक हाईकोर्ट कन्फर्म नहीं करता, सजा पर अमल नहीं हो सकता।जेल प्रशासन खुद ही सारे कागज हाईकोर्ट भेजता है. इसे Death Reference कहते हैं.

कानून के मुताबिक, यदि कोई निचली अदालत किसी को मृत्युदंड सुनाती है, तो उस फैसले और केस की पूरी फाइल को अनिवार्य रूप से उच्च न्यायालय (High Court) में भेजा जाता है जिसे 'डेथ सेंटेंस कन्फर्मेशन रेफरेंस' कहा जाता है. जब तक हाईकोर्ट इस सजा की पुष्टि (Confirm) नहीं करता, तब तक फांसी की सजा पर अमल नहीं किया जा सकता.

2. हाईकोर्ट की भूमिका और दोषियों के पास अपील के विकल्प
हाईकोर्ट इस मामले में बेहद व्यापक स्तर पर सुनवाई करता है. हाईकोर्ट केवल निचली अदालत के फैसले की जांच नहीं करता, बल्कि वह रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों, गवाहों और सबूतों की नए सिरे से स्वतंत्र समीक्षा करता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि फैसला हर शक से परे सही है या नहीं. दोषियों (मुस्कान और साहिल) के पास यह कानूनी अधिकार होता है कि वे सेशन कोर्ट के फैसले और सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में आपीलीय याचिका (Criminal Appeal) दाखिल करें. वे अपनी दोषमुक्ति या सजा कम करने की गुहार लगा सकते हैं.

हाईकोर्ट के पास क्या अधिकार हैं? सुनवाई के बाद हाईकोर्ट के पास चार मुख्य विकल्प होते हैं.
सेशन कोर्ट के मृत्युदंड के फैसले को बहाल (Confirm) कर सकता है.
सजा को बदलकर उम्रकैद में बदल सकता है.
दोषियों को बरी कर सकता है.
मामले में दोबारा जांच या नए सिरे से ट्रायल का आदेश दे सकता है.

3. सुप्रीम कोर्ट में अपील
यदि हाईकोर्ट भी सत्र न्यायालय के मृत्युदंड के फैसले को बरकरार रखता है (यानी सजा की पुष्टि कर देता है), तो भी कानूनी रास्ते बंद नहीं होते. दोषी इसके बाद देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में अपील (Special Leave Petition - SLP) दाखिल कर सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट में भी मामले के कानूनी पहलुओं,Rarest of Rare सिद्धांत और ट्रायल में किसी प्रक्रियागत त्रुटि पर लंबी बहस होती है. यदि सुप्रीम कोर्ट भी सजा को बरकरार रखता है, तो दोषियों के पास सुप्रीम कोर्ट में ही क्यूरेटिव पिटिशन (Curative Petition) दाखिल करने का अंतिम न्यायिक विकल्प बचता है.

आखिरी विकल्प: दया याचिका (Mercy Petition)
जब अदालतों के सारे न्यायिक दरवाजे (सेशन कोर्ट -> हाईकोर्ट -> सुप्रीम कोर्ट) बंद हो जाते हैं और मृत्युदंड अंतिम हो जाता है, तब संविधान के तहत कार्यकारी (Executive) स्तर पर आखिरी विकल्प बचता है.

4- दया याचिका
दोषी भारत के राष्ट्रपति के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत दया याचिका (Mercy Petition) दाखिल कर सकते हैं.राष्ट्रपति, केंद्रीय गृह मंत्रालय की सलाह पर दया याचिका पर फैसला लेते हैं. यदि राष्ट्रपति दया याचिका खारिज कर देते हैं, तब फांसी की सजा तय प्रक्रिया के तहत मुकर्रर की जाती है.

क्या सजा बदल सकती है?
क्या सजा बदल सकती है? हाँ। भारतीय न्याय प्रणाली में डेथ पेनल्टी को 'रेयरार से परे दुर्लभतम मामलों' के लिए ही रिजर्व माना गया है. हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के दौरान दोषियों की परिस्थितियों (जैसे उम्र, महिलाओं के मामले में अन्य सामाजिक या पारिवारिक पहलू आदि) को ध्यान में रखते हुए मौत की सजा को उम्रकैद में बदल भी सकते हैं.

फांसी कब होगी? 
उपर्युक्त सभी कानूनी प्रक्रियाएं (हाईकोर्ट की पुष्टि, सुप्रीम कोर्ट में अपील और दया याचिका का निस्तारण) पूरी होने में लंबा वक्त लगता है. जब तक ये सभी कानूनी चरण और अपीलें पूरी नहीं हो जातीं, तब तक दोषियों को फांसी नहीं दी जा सकती.

सीधे शब्दों में कहें तो सेशन कोर्ट का फैसला सिर्फ पहला कदम है. मुस्कान और साहिल के पास अभी हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति तक अपील के कम से कम 4-5 मौके बाकी हैं. इसलिए अभी फांसी का सवाल बहुत दूर का है.

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About the Author

Preeti Chauhan

Preeti Chauhan

प्रीति चौहान जीन्यूज में पत्रकार हैं, उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड डिजीटल टीम में  ब्रेकिंग, हाइपरलोकल, क्राइम, और अन्य मुद्दों को लेकर खबरें लिखती हैं. 
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