सहारनपुर मस्जिद प्रकरण में AIMIM प्रवक्ता का बड़ा सवाल: शादाब चौहान बोले- DM के आदेश में ध्वस्तीकरण का जिक्र नहीं था
Saharanpur Court Mosque Demolition: सहारनपुर कलेक्ट्रेट स्थित मस्जिद पर हुई डिमोलिशन कार्रवाई के खिलाफ AIMIM ने कमिश्नर को ज्ञापन सौंपा. AIMIM प्रवक्ता शादाब चौहान ने इसे प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन बताते हुए कहा कि नोटिस और कानूनी विकल्प का समय नहीं दिया गया. उन्होंने 1991 के 'प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट' का हवाला देते हुए इसे राजनीति से प्रेरित बताया और कानूनी लड़ाई जारी रखने का ऐलान किया.
Saharanpur Masjid Controversy: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद पर हुई कार्रवाई को लेकर सियासी और कानूनी बहस तेज हो गई है. गुरुवार को ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नेताओं और अधिवक्ताओं का एक प्रतिनिधिमंडल सहारनपुर पहुंचे. डेलिगेशन ने कमिश्नर से मुलाकात कर मस्जिद पर हुई कार्रवाई के विरोध में ज्ञापन सौंपा. AIMIM के प्रवक्ता और अधिवक्ता शादाब चौहान ने कार्रवाई को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए इसकी प्रक्रिया और कानूनी आधार पर कई सवाल खड़े किए.
शादाब चौहान बोले- प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन
शादाब चौहान ने आरोप लगाया कि मस्जिद गिराने की कार्रवाई में तय कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया. उन्होंने कहा कि जिस आदेश का हवाला दिया जा रहा है, उसमें कहीं भी मस्जिद के डिमोलिशन का स्पष्ट उल्लेख नहीं था. उनका दावा है कि किसी भी कार्रवाई से पहले संबंधित पक्ष को पर्याप्त समय और कानूनी उपाय अपनाने का मौका दिया जाना चाहिए था.
उन्होंने कहा कि कानून में कई मामलों में नोटिस और कार्रवाई के बीच पर्याप्त समय देने की प्रक्रिया होती है. इसके अलावा अंतिम कानूनी उपाय अपनाने का अवसर भी मिलना चाहिए. शादाब चौहान ने इसे ‘Principles of Natural Justice’ यानी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से जोड़ते हुए कहा कि संबंधित पक्ष को अपनी बात रखने और अदालत का दरवाजा खटखटाने का पूरा अवसर मिलना चाहिए था.
Places of Worship Act का भी दिया हवाला
AIMIM प्रवक्ता ने Places of Worship Act, 1991 का भी हवाला दिया. उन्होंने कहा कि इस कानून के प्रावधानों को भी इस मामले में देखा जाना चाहिए. शादाब चौहान ने दावा किया कि वर्ष 1960 में यूनियन की ओर से मस्जिद के संबंध में लीज की गई थी. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर लीज मालिकाना हक रखने वाले व्यक्ति से हुई थी तो बाद में जमीन के मालिकाना हक पर सवाल कैसे खड़ा हो रहा है.
उन्होंने पुराने राजस्व रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि 1329 फसली के रिकॉर्ड में जमीन दर्ज होने की बात सामने आती है. उनका आरोप है कि सरकार के पास जमीन को अधिग्रहित करने या अपने अधीन लेने का स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं है और न ही इसके लिए भुगतान किए जाने का कोई प्रमाण बताया गया है.
करीब 100 साल पुरानी मस्जिद गिराने की इतनी जल्दबाजी क्यों?
शादाब चौहान ने मस्जिद की उम्र का जिक्र करते हुए सवाल किया कि करीब 100 साल पुरानी मस्जिद को गिराने में इतनी जल्दबाजी क्यों की गई. उन्होंने आरोप लगाया कि यह कार्रवाई दुर्भावना से प्रेरित प्रतीत होती है. साथ ही उन्होंने सरकार पर कानून के कथित दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि AIMIM इस मामले में कानूनी लड़ाई को आखिरी स्तर तक ले जाएगी.
उन्होंने डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचार का हवाला देते हुए कहा कि कानून कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर उसे लागू करने वाले सही तरीके से काम न करें तो उसका परिणाम खराब हो सकता है.
कुएं के दावे पर भी AIMIM ने उठाए सवाल
मस्जिद परिसर में पुराने कुएं को लेकर उठ रहे सवालों पर भी शादाब चौहान ने प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि पुराने धार्मिक या आवासीय ढांचे के आसपास कुआं होना असामान्य बात नहीं है. उन्होंने सवाल किया कि अगर कोई व्यक्ति कुएं पर दावा करता भी है, तो सिर्फ इस आधार पर वहां बने पूरे ढांचे को वैध या अवैध कैसे माना जा सकता है.
उन्होंने प्रशासन से मांग की कि अगर धार्मिक स्थलों की वैधता का सवाल उठाया जा रहा है तो सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि कौन-कौन से धर्मस्थल वैध हैं और कौन से अवैध.
आखिरी कानूनी रास्ते तक जाएंगे
शादाब चौहान ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में अलग-अलग जगहों पर मस्जिदों को निशाना बनाया जा रहा है और इसे राजनीतिक लाभ से जोड़कर देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि AIMIM के पास वर्तमान में सांसद या विधायक नहीं हैं, लेकिन पार्टी कानूनी लड़ाई से पीछे नहीं हटेगी. उनके मुताबिक, ओवैसी के आदेश और शौकत साहब के निर्देश पर अधिवक्ता पूरे मामले को कानूनी तौर पर ब्रीफ करेंगे और उपलब्ध सभी कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल किया जाएगा. उन्होंने साफ कहा कि इस मामले में भी लड़ाई ‘कानून के आखिरी रास्ते’ तक जारी रहेगी.