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दिखते हैं अफ्रीकी, बोलते हैं फर्राटेदार गुजराती: इस गांव में 1000 साल से रह रहे हैं अफ्रीकी मूल के लोग; VIDEO देख रह जाएंगे हैरान

गुजरात के गिर सोमनाथ जिले में बसा जाम्बुर गांव अपनी अनोखी पहचान के लिए जाना जाता है. यहां रहने वाले सिद्दी समुदाय के लोगों की शारीरिक बनावट अफ्रीकी मूल के लोगों जैसी है, लेकिन उनकी बोली, रहन-सहन और खानपान में गुजराती संस्कृति की झलक मिलती है. सदियों पहले अफ्रीका से भारत पहुंचे इस समुदाय ने यहीं अपनी दुनिया बसा ली. इसके कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते रहते हैं.

Written By Santosh Kumar Mishra
Published: Oct 24, 2026, 11:41 AM IST | Updated: Oct 24, 2026, 12:00 PM IST
Image Credit: @justwravel | गुजरात के इस गांव में रहते हैं अफ्रीकी मूल के लोग!
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गुजरात के किसी गांव में पहुंचकर अगर आपको ऐसे लोग मिलें जिनकी शक्ल-सूरत अफ्रीकी मूल के लोगों जैसी हो, लेकिन वे आपसे फर्राटेदार गुजराती में बात करने लगें, तो हैरानी होना लाजिमी है. जाम्बुर गांव की पहचान कुछ ऐसी ही है. गिर सोमनाथ जिले में बसे इस गांव में सिद्दी समुदाय के लोग रहते हैं. इनकी जड़ें अफ्रीका से जुड़ी हैं, लेकिन कई पीढ़ियों से भारत में रहने के कारण यहां की भाषा और संस्कृति इनके जीवन का हिस्सा बन चुकी है.

यहां के लोग रोजमर्रा की बातचीत में गुजराती का इस्तेमाल करते हैं. स्थानीय माहौल में पले-बढ़े बच्चों के लिए भी यह उनकी अपनी भाषा है. इनके लिए भारत कोई नया ठिकाना नहीं, बल्कि वह घर है, जहां इनके परिवारों की कई पीढ़ियां गुजर चुकी हैं. इस समुदाय का इतिहास करीब 1000 साल पुराना बताया जाता है. माना जाता है कि उनके पूर्वज सदियों पहले अफ्रीका से भारत आए थे. अब इस समुदाय के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं.

कहां से आए थे सिद्दी समुदाय के लोग?

सिद्दी समुदाय का इतिहास हिंद महासागर के रास्ते अफ्रीका और भारत के बीच हुए पुराने संपर्कों से जुड़ा है. इतिहासकारों के मुताबिक, इस समुदाय के पूर्वजों का संबंध मुख्य रूप से अफ्रीका के बांटू भाषी इलाकों से रहा है. अलग-अलग दौर में अफ्रीकी मूल के लोग व्यापार, समुद्री यात्राओं, सैनिक सेवाओं और मजदूरी के सिलसिले में भारतीय उपमहाद्वीप पहुंचे. इनमें कुछ लोग अपनी मर्जी से आए, जबकि कई लोगों को गुलाम बनाकर या बंधुआ मजदूर के रूप में लाया गया था. गुजरात में सिद्दी समुदाय के बसने को लेकर स्थानीय स्तर पर अलग-अलग कहानियां भी सुनाई जाती हैं. कुछ मान्यताओं के अनुसार, उनके पूर्वजों को पुराने शासक अफ्रीका से लाए थे और बाद में उन्हें यहीं बसने की जगह मिली. हालांकि, जाम्बुर में रहने वाले सभी परिवारों के भारत पहुंचने की एक ही कहानी रही हो, यह कहना सही नहीं होगा.

पुर्तगालियों के दौर से भी जुड़ा है इतिहास

सिद्दी समुदाय की कहानी समझने के लिए उस दौर को भी देखना जरूरी है, जब पुर्तगाली और दूसरे यूरोपीय व्यापारी हिंद महासागर के रास्ते भारत आते थे. उस समय अफ्रीका से लोगों को समुद्री रास्तों के जरिए अलग-अलग इलाकों में लाया जाता था. इनमें से कुछ लोग सैनिक बने, कुछ ने शासकों के यहां काम किया और कई परिवार धीरे-धीरे स्थानीय समाज का हिस्सा बन गए. समय के साथ उनकी पुरानी भाषाओं की जगह उन इलाकों की भाषाओं ने ले ली, जहां वे रहने लगे. इसी बदलाव की झलक गुजरात के सिद्दी समुदाय में भी दिखाई देती है. उनकी पहचान में अफ्रीकी विरासत आज भी मौजूद है, लेकिन गुजराती भाषा और स्थानीय रीति-रिवाजों ने उनकी जिंदगी को एक अलग रंग दिया है.

 

 

छत्रपति शिवाजी महाराज और समुद्री ताकत का कनेक्शन

कुछ लोग सिद्दी समुदाय का इतिहास महाराष्ट्र के समुद्री इलाकों से भी जोड़ते हैं. पश्चिमी तट पर अलग-अलग दौर में सिद्दी समुदाय के लोगों ने समुद्री गतिविधियों, जहाजों और तटीय सुरक्षा से जुड़ी भूमिकाएं निभाईं. उनमें कुछ लोग अपनी समुद्री जानकारी और लड़ने की क्षमता के लिए भी पहचाने जाते थे. इतिहासकारों का मानना है कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने समुद्र के महत्व को समझते हुए मजबूत नौसेना तैयार करने पर जोर दिया था. उस दौर में कोंकण तट और आसपास के समुद्री इलाकों पर नियंत्रण के लिए कई ताकतों के बीच संघर्ष होता था. तब छत्रपति शिवाजी महाराज ने सिद्दी समुदाय के कुछ समूहों को इस क्षेत्र में तैयार किया था.

गुजरात से कर्नाटक तक फैला समुदाय

भारत में सिद्दी समुदाय के लोग मुख्य रूप से गुजरात, कर्नाटक और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में रहते हैं. हालांकि, अलग-अलग राज्यों में उनकी भाषा, धार्मिक परंपराओं और रहन-सहन में अंतर देखने को मिलता है. गुजरात में समुदाय के कई लोग मुस्लिम हैं, जबकि कर्नाटक में सिद्दी परिवारों के बीच हिंदू, मुस्लिम और ईसाई परंपराएं भी देखने को मिलती हैं. यानी अफ्रीकी मूल से जुड़ी पहचान के बावजूद सभी सिद्दियों की धार्मिक और सांस्कृतिक जिंदगी एक जैसी नहीं है. गुजरात के जूनागढ़ और आसपास के इलाकों में इस समुदाय की अच्छी-खासी मौजूदगी है. जाम्बुर भी इसी सांस्कृतिक पहचान के कारण लोगों का ध्यान खींचता है. यहां गुजराती भाषा और स्थानीय खानपान के बीच समुदाय ने अपनी कुछ पुरानी परंपराओं को भी बचाकर रखा है.

बाजरे की रोटी से लेकर गुजराती खानपान तक

जाम्बुर के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी आसपास के दूसरे गांवों से बहुत अलग नहीं है. यहां भी घरों में स्थानीय पसंद के मुताबिक खाना बनता है. बाजरे की रोटी और सब्जियां जैसे व्यंजन उनके खानपान का हिस्सा हैं. पहनावे और रहन-सहन में भी गुजराती संस्कृति का असर दिखाई देता है. महिलाएं स्थानीय परंपराओं के मुताबिक कपड़े और गहने पहनती हैं. गांव के बाजार, घरों की दिनचर्या और लोगों की बातचीत में भी आसपास के इलाके की जीवनशैली की झलक मिलती है. लेकिन जब त्योहार या खास मौके आते हैं, तब सिद्दी समुदाय की एक दूसरी पहचान सामने आती है. यह पहचान है उनका पारंपरिक धमाल नृत्य और संगीत, जिसमें अफ्रीकी विरासत की झलक देखने को मिलती है.

धमाल नृत्य में आज भी जिंदा है अफ्रीकी विरासत

धमाल सिद्दी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है. इसमें तेज लय, ट्रेडिशनल वाद्ययंत्रों और खास तरह की शारीरिक गतिविधियों के जरिए लोग अपनी खुशी जाहिर करते हैं. सामूहिक नृत्य के दौरान समुदाय के लोग एक साथ शामिल होते हैं और अपनी परंपरा को आगे बढ़ाते हैं. इस नृत्य को सिर्फ मनोरंजन के तौर पर देखना इसकी पूरी अहमियत को समझना नहीं होगा. यह उस इतिहास की याद भी दिलाता है, जो पीढ़ियों पहले अफ्रीका से शुरू हुआ और भारत में आकर नई सांस्कृतिक पहचान के साथ आगे बढ़ा. समय बदलने के बावजूद ऐसी परंपराएं समुदाय को अपनी जड़ों से जोड़े रखने में मदद करती हैं. यही वजह है कि सिद्दी समुदाय की चर्चा होने पर धमाल नृत्य का जिक्र अक्सर किया जाता है.

 

 

अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने से खुलीं नई राहें

गुजरात में सिद्दी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा मिलने के बाद शिक्षा और सरकारी योजनाओं तक पहुंच के लिहाज से नए अवसर बने. इस तरह के दर्जे का उद्देश्य उन समुदायों तक सरकारी सहायता पहुंचाना है, जिन्हें सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. हालांकि, किसी समुदाय की तरक्की को सिर्फ सरकारी दर्जे से नहीं मापा जा सकता. बच्चों की शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाएं और परिवारों की आर्थिक स्थिति भी उतनी ही जरूरी हैं. गांवों में इन सुविधाओं की उपलब्धता का असर आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर पड़ता है. जाम्बुर की पहचान भी इसी बदलाव और अपनी सांस्कृतिक विरासत को संभालकर रखने की कोशिश के बीच बनी हुई है.

(Disclaimer: प्रिय पाठक, हमारी यह खबर पढ़ने के लिए शुक्रिया. यह खबर इंटरनेट पर मौजूद डिटेल्स को एकत्रित करके बनाई गई है. Zee News इसके प्रमाणिकता, दावों और सत्यता की पुष्टि नहीं करता है.)

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संतोष मिश्रा जी न्यूज में सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. वह पिछले 4.5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं. ट्रैवल, फीचर, ऑफबीट, ट्रेंडिंग और वायरल खबरों के साथ-साथ टेक और साइंस से जुड़ी खबरों में भी उनकी विशेष विशेषज्ञता है. उनकी खबरें अपनी विश्वसनीयता और सटीक जानकारी के लिए जानी जाती हैं. आसान और सहज भाषा में लिखे गए उनके कंटेंट को पाठक काफी पसंद करते हैं. सोशल मीडिया की दुनिया (Instagram, X, Reddit, Threads और Facebook) पर उनकी अच्छी पकड़ है. वह ट्रेंडिंग विषयों पर लगातार नजर रखते हैं और फ्रेश व यूनिक खबरें पाठकों तक पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं. संतोष मिश्रा इससे पहले News Nation और India Ahead जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में भी काम कर चुके हैं. उन्होंने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) किया है.
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