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देवांशी श्रीवास्तव का जन्म एक सामान्य और स्वस्थ बच्ची के तौर पर हुआ था. शुरुआत में परिवार को ऐसा कोई अंदाजा नहीं था कि आगे चलकर उनकी जिंदगी में इतनी चुनौतियां आने वाली हैं. धीरे-धीरे माता-पिता ने देखा कि वह दूसरे बच्चों की तुलना में देर से चल रही हैं और उनकी स्पीच भी साफ नहीं थी. परिवार ने सोचा कि शायद समय के साथ सब ठीक हो जाएगा.
लेकिन करीब ढाई साल की उम्र में देवांशी को तेज बुखार हुआ, जो 15 दिनों से ज्यादा चला. इसके दो-तीन महीने बाद उनकी बाईं आंख में Squint दिखाई देने लगा. इसके साथ ही उनके व्यवहार में भी बदलाव नजर आने लगे. वह बहुत जिद करतीं, एक जगह नहीं बैठतीं, दूसरे बच्चों को मार देतीं और लगातार इधर-उधर भागती रहतीं.
तीन साल की उम्र में जब देवांशी प्ले स्कूल जाने लगीं तो वहां से भी लगातार शिकायतें आने लगीं. टीचर्स कहते कि वह एक जगह बैठती नहीं हैं, दूसरे बच्चों को मारती हैं और पेंसिल तक ठीक से पकड़ नहीं पातीं. उन्हें रंगों की पहचान भी नहीं थी. अपनी बच्ची की इन व्यवहार संबंधी परेशानियों के बीच देवांशी के पैरेंट्स ने उनके कई असेसमेंट कराए. इसके बाद ADHD, ऑटिज्म और इंटेलेक्चुअल डिसेबिलिटी से जुड़ी स्थिति सामने आई. फिर परिवार ने क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट, स्पीच थेरेपिस्ट और डॉक्टरों से सलाह लेना शुरू किया.
देवांशी की मां के लिए सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर उनकी बेटी को पढ़ाई का सही माहौल कहां मिलेगा. परिवार ने उन्हें सामान्य स्कूलों में पढ़ाने की कोशिश की. करीब 10 साल की उम्र तक चार स्कूल बदले गए. माता-पिता को उम्मीद थी कि ऐसे स्कूलों में स्पेशल एजुकेटर और जरूरी सुविधाएं मिलेंगी, लेकिन हर जगह उनकी जरूरतों को सही तरह समझा नहीं गया. आखिरकार उन्हें एक स्पेशल इंक्लूसिव स्कूल के बारे में पता चला, जो घर से करीब 29 किलोमीटर दूर था. दूरी ज्यादा थी, लेकिन परिवार ने इसे परेशानी नहीं बनने दिया. एक वैन की सुविधा मिली और देवांशी को उस स्कूल में दाखिला कराया गया. आज वह वहीं पढ़ रही हैं. उन्होंने NIOS का C लेवल, जो आठवीं कक्षा के बराबर है, पूरा कर लिया है और अब नौवीं के स्तर पर पढ़ाई कर रही हैं.
प्यूबर्टी के आसपास देवांशी की हाइपरएक्टिविटी और बढ़ गई थी. वह कभी बिना वजह हंसतीं, रोतीं, सार्वजनिक जगहों पर जोर-जोर से चिल्लातीं और खुद को संभाल नहीं पाती थीं. ऐसे में साइकेट्रिस्ट से सलाह ली गई और दवाइयां शुरू हुईं. दवाइयों से हाइपरएक्टिविटी कम हुई, लेकिन उसका एक असर यह भी था कि उनकी रिफ्लेक्स और प्रतिक्रिया काफी धीमी हो गई. डॉक्टरों ने परिवार को सलाह दी कि देवांशी की एनर्जी को किसी ऐसे काम में लगाया जाए, जिसमें उन्हें खुद सुकून मिले. इसके बाद स्विमिंग, डांसिंग, सिंगिंग और ड्रॉइंग जैसी कई चीजें आजमाई गईं. इसी दौरान पेंटिंग क्लास की टीचर ने महसूस किया कि देवांशी को ड्रॉइंग से ज्यादा कलरिंग पसंद है.
तीन से छह साल की उम्र के बीच देवांशी को बेसिक रंगों की भी सही पहचान नहीं थी. परिवार ने क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट की सलाह पर 'कलर वीक' जैसी प्रैक्टिस शुरू की. एक सप्ताह सिर्फ लाल रंग पर फोकस होता. कपड़े, लंच बॉक्स, पानी की बोतल जैसी चीजें भी लाल रंग की रखी जातीं. धीरे-धीरे वह रंगों को पहचानने लगीं. शुरुआत में जब उन्हें कलरिंग बुक दी गई तो वह बिना किसी पैटर्न के रंग भरती थीं. लाइन से बाहर रंग निकल जाता था और डिजाइन की समझ भी नहीं थी. लेकिन एक चीज खास थी- वह काफी देर तक बैठकर कलरिंग करती थीं. यही छोटी सी बात परिवार के लिए बड़ी उम्मीद बन गई.
बाद में देवांशी को बड़े-बड़े डिजाइन वाली थीम बेस्ड कलरिंग बुक्स दी गईं. इनमें मंडला डिजाइन भी शामिल थे. यहीं से उनकी जिंदगी में एक नया मोड़ आया. वह स्टेडलर पेंसिल कलर्स से बारीक मंडला डिजाइन को बहुत धैर्य के साथ रंगने लगीं. जिस बच्ची के लिए कुछ देर एक जगह बैठना मुश्किल था, वही घंटों एक डिजाइन पर ध्यान लगाने लगी. कलरिंग ने उनकी एनर्जी को एक दिशा दी. परिवार के मुताबिक इससे उनकी कॉन्सन्ट्रेशन और कॉग्निटिव स्किल्स पर भी सकारात्मक असर पड़ा. सबसे अहम बदलाव उनके आत्मविश्वास में दिखाई दिया.
देवांशी के लिए सामाजिक जीवन आसान नहीं रहा. उनकी व्यवहार संबंधी चुनौतियों और इंटेलेक्चुअल डिसेबिलिटी की वजह से उनके हमउम्र बच्चों से दोस्ती नहीं हो पाई. परिवार के कार्यक्रमों में भी उनकी उम्र के कजिन्स को कई बार समझाना पड़ता कि देवांशी को भी अपने गेम में शामिल करें. बैडमिंटन खेलते समय वह कई बार शटल मिस कर देती हैं. सामने वाले बच्चे को बार-बार शटल उठानी पड़ती है. ऐसी छोटी-छोटी बातों में समाज की संवेदनशीलता की कमी साफ नजर आती है. फिर भी देवांशी ने लोगों से दूरी नहीं बनाई. वह अपनी सोसायटी में साइकिल चलाती हैं और रास्ते में मिलने वाले लोगों को अपनी प्यारी मुस्कान के साथ 'नमस्ते' करती हैं. छोटे बच्चों और अपने स्कूल के दोस्तों की कंपनी उन्हें खास तौर पर पसंद है.
उम्र बढ़ने के साथ चुनौतियां भी खत्म नहीं हुईं. देवांश्री अपनी पसंद-नापसंद और भावनाएं आसानी से शब्दों में नहीं बता पातीं. कपड़े, फैशन और रोजमर्रा की कई चीजों में फैसले लेने के लिए उन्हें परिवार की मदद की जरूरत पड़ती है. पैसों की समझ भी उनके लिए मुश्किल है. माता-पिता धीरे-धीरे उन्हें इन चीजों को समझाने की कोशिश कर रहे हैं. फिलहाल मूड स्विंग, एंग्जायटी और कभी-कभी डिप्रेशन जैसी स्थितियां भी देखने को मिलती हैं. ऐसे दिनों में वह कलरिंग नहीं करना चाहतीं. लेकिन जब मूड अच्छा होता है तो अपनी पसंद का पैटर्न खुद चुनती हैं और रंग भरने बैठ जाती हैं. परिवार के लिए यह छोटी सी बात भी बहुत बड़ी खुशी है.
देवांशी जब मंडला आर्ट में लगातार बेहतर होने लगीं तो परिवार ने सोचा कि उनकी कला को एक नाम मिलना चाहिए. इसी सोच से 'आत्म रंग' नाम सामने आया, जिसका मतलब उनकी आत्मा से निकले रंग. उनकी पहली बड़ी सार्वजनिक पहचान तब बनी, जब उनका एक आर्टवर्क 'द हाट ऑफ आर्ट' नाम की आर्ट एग्जिबिशन में भारत मंडपम में प्रदर्शित किया गया. इस आर्टवर्क की कीमत 500 रुपये रखी गई थी. यही देवांश्री की पहली मौद्रिक सराहना थी. उस 500 रुपये की कीमत से कहीं ज्यादा अहम यह था कि पहली बार उनकी कला को किसी ने सिर्फ उनकी कला के लिए महत्व दिया था.
पिछले करीब दो साल में देवांशी के आर्टवर्क को नया रूप देने की कोशिश की गई. उनके बनाए डिजाइन अब इको-सस्टेनेबल वुडन प्रोडक्ट्स पर इस्तेमाल किए जा रहे हैं. सर्विंग ट्रे, कप कोस्टर, साइड टेबल, ट्रिवेट, फोटो फ्रेम, मोबाइल स्टैंड और बाउल जैसे प्रोडक्ट्स पर उनकी कला दिखाई देती है. 'आत्म रंग- कलर्स ऑफ करेज' अब सिर्फ एक आर्टवर्क का नाम नहीं, बल्कि देवांशी की पहचान बनता जा रहा है. दिल्ली और NCR की कई एग्जिबिशन में वह अपना काम दिखा चुकी हैं. लोगों से मिली तारीफ ने उनके कॉन्फिडेंस को और मजबूत किया है.
देवांशी के माता-पिता के सामने भविष्य का सबसे बड़ा सवाल यही है कि उनके बाद बेटी और उनके ब्रांड की जिम्मेदारी कौन संभालेगा. फिलहाल 'आत्म रंग' को चलाने में उनकी लगातार भागीदारी जरूरी है. इसी चिंता को ध्यान में रखते हुए परिवार ने 'आत्म रंग ट्रस्ट' बनाया है. देवांशी इसकी प्रोपराइटर हैं और माता-पिता इसके सदस्य हैं. उनकी मौसी भी इस व्यवस्था से जुड़ी हैं. इसका मकसद भविष्य में देवांशी की देखभाल और 'आत्म रंग' को आगे बढ़ाने के लिए एक स्थायी व्यवस्था तैयार करना है.
देवांशी के माता-पिता के लिए सबसे भावुक पल वह होता है, जब कोई व्यक्ति उनके प्रोडक्ट को सिर्फ इसलिए नहीं खरीदता कि वह एक स्पेशल जरूरत वाली लड़की ने बनाया है, बल्कि इसलिए खरीदता है क्योंकि उसे सच में उनकी कला खूबसूरत लगती है. देवांशी के लिए ऐसी तारीफ कॉन्फिडेंस और खुशी लेकर आती है. माता-पिता के लिए यह गर्व का पल होता है. देवांशी की कहानी बताती है कि हर बच्चे की अपनी रफ्तार और अपनी ताकत होती है. जिस रंग को पहचानने में कभी उन्हें मुश्किल होती थी, उन्हीं रंगों ने आगे चलकर उन्हें अपनी पहचान बनाने का रास्ता दिया. आज उनके लिए मंडला आर्ट सिर्फ कलरिंग नहीं है. यह उनकी आवाज है, उनका आत्मविश्वास है और आने वाले कल की उम्मीद भी. 'आत्म रंग' इसी उम्मीद का नाम है- ऐसी उम्मीद, जो कहती है कि अलग होना कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी एक अलग खूबसूरती हो सकती है.