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अगर आपके घर में भी स्मार्ट टीवी है और आप बिना डीटीएच का केबल लगाए सीधा ऐप्स के जरिए लाइव टीवी, न्यूज चैनल्स या फास्ट (फ्री एड-सपोर्टेड स्ट्रीमिंग टीवी) चैनल्स देखने के शौकीन हैं, तो यह खबर सीधे आपसे जुड़ी है. हाल ही में टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) ने इंटरनेट-बेस्ड टीवी सर्विसेज के लिए कुछ बहुत बड़े सुझाव दिए हैं. 26 अक्टूबर को आई ट्राई की सिफारिशों के बाद से ही टेक वर्ल्ड में चर्चा छिड़ गई है कि क्या सरकार अब आपके स्मार्ट टीवी में मिलने वाले ऐप्स को कंट्रोल करने जा रही है? क्या स्मार्ट टीवी बनाने वाली कंपनियां जैसे एलजी, सैमसंग, शाओमी या एंड्रॉइड ओएस देने वाले प्लेटफॉर्म्स अब अपनी मर्जी से कोई भी ऐप आपको नहीं दे पाएंगे?

आखिर मामला क्या है?
ट्राई ने सरकार से सिफारिश की है कि इंटरनेट के जरिए लाइव शेड्यूल्ड टीवी चैनल्स दिखाने वाले ऐप्स को एक नए लाइसेंस या ऑथराइजेशन की जरूरत होगी. इसे नाम दिया गया है एएलटीडी (एप्लीकेशन-बेस्ड लीनियर टेलीविजन डिस्ट्रीब्यूशन).
इतना ही नहीं, इस पूरे मामले में सबसे बड़ा ट्विस्ट यह है कि ट्राई ने सिर्फ ऐप बनाने वालों को ही नहीं घेरा है, बल्कि स्मार्ट टीवी बनाने वाली कंपनियों (हार्डवेयर वेंडर्स) और उनका ऑपरेटिंग सिस्टम (जैसे एंड्रॉइड टीवी, वेबओएस, टाइजन) चलाने वाले प्लेटफॉर्म्स की भी जिम्मेदारी तय करने का सुझाव दिया है.
सरल शब्दों में कहें तो, अब टीवी कंपनियां अपने ऐप स्टोर में केवल उन्हीं ऐप्स को जगह दे पाएंगी जिन्हें मिनिस्ट्री ऑफ इंफॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग (एमआईबी) से मंजूरी मिली होगी. इसके लिए सरकार एक सेंट्रल रिपोजिटरी यानी मास्टर एएलटीडी ऐप रिपोजिटरी बनाएगी.
यह एएलटीडी ऐप्स क्या होते हैं और आप इन्हें रोज कैसे देखते हैं?
इसे समझना बहुत आसान है. ओटीटी और वीडियो स्ट्रीमिंग मुख्य रूप से दो कैटेगरी में बंटे होते हैं:
ऑन-डिमांड स्ट्रीमिंग: जैसे नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम वीडियो या हॉटस्टार पर अपनी पसंद की फिल्म या वेब सीरीज खुद प्ले करना. इसमें जब आप वीडियो चालू करते हैं, वह शुरुआत से चलता है.
लीनियर टेलीविजन: यह ठीक पारंपरिक केबल टीवी या डीटीएच जैसा होता है. इसमें एक फिक्स्ड शेड्यूल चलता है. अगर आप 8 बजे टीवी चालू करते हैं, तो जो शो उस समय टेलीकास्ट हो रहा होगा, आप उसे वहीं से देख पाएंगे.
जब कोई ऐप इंटरनेट का इस्तेमाल करके इसी तरह के शेड्यूल्ड चैनल्स या लाइव टीवी शो दिखाता है, तो उसे एएलटीडी ऐप कहा जाएगा.
इसमें आजकल बहुत पॉपुलर हो रहे फास्ट सर्विसेज (फ्री एड-सपोर्टेड स्ट्रीमिंग टेलीविजन) भी शामिल हैं. ये वो सर्विस होती हैं जहां आपको बिना कोई मासिक सब्सक्रिप्शन दिए सिर्फ विज्ञापन देखकर 24x7 चलने वाले स्पेशल न्यूज़, मूवी या कॉमेडी चैनल्स फ्री में मिल जाते हैं.

कौन से ऐप्स इस नए नियम के दायरे में आएंगे और कौन से बाहर?
ट्राई ने अपने सुझाव में बहुत साफ लाइन खींची है ताकि आम दर्शकों और डेवलपर्स को कंफ्यूजन न हो.
ये ऐप्स दायरे में आएंगे (कवर्ड अंडर एएलटीडी फ्रेमवर्क):
ये ऐप्स इस नियम से बाहर रहेंगे (एक्सक्लूडेड फ्रॉम फ्रेमवर्क):

ट्राई को इन ऐप्स को रेगुलेट करने की जरूरत क्यों पड़ी?
आप सोच रहे होंगे कि जब सब कुछ सही चल रहा था, तो अचानक यह नया झमेला क्यों? इसके पीछे एक बड़ी वजह है रेगुलेटरी पैरिटी (बराबरी का नियम).
केबल और डीटीएच ऑपरेटरों की शिकायत: पारंपरिक केबल टीवी और टाटा प्ले, डिश टीवी जैसे डीटीएच ऑपरेटरों को सरकार के बहुत सख्त नियमों, फीस, लाइसेंस और प्राइसिंग रूल्स का पालन करना पड़ता है. जबकि दूसरी तरफ, स्मार्ट टीवी ऐप्स वही टीवी चैनल्स बिना किसी लाइसेंस फीस के फ्री में या इंटरनेट के जरिए आसानी से स्ट्रीम कर रहे थे.
प्राइसिंग का अंतर: डीटीएच पर जिस चैनल के पैसे देने पड़ते थे, कई बार वही चैनल स्मार्ट टीवी ऐप पर फ्री उपलब्ध हो जाता था. इससे पुराने केबल नेटवर्क को बहुत नुकसान हो रहा था.
कस्टमर कंप्लेंट और जवाबदेही: अगर केबल टीवी में कोई खराबी आए तो शिकायत की जगह होती है, लेकिन इंटरनेट पर चलने वाले कई थर्ड-पार्टी ऐप्स के लिए कोई निश्चित ग्रिवेंस रिड्रेसल मैकेनिज्म नहीं था.
इसी अंतर को खत्म करने के लिए ट्राई ने टेलीकम्यूनिकेशन एक्ट, 2023 के तहत एएलटीडी के लिए एक हल्का लेकिन स्पष्ट (लाइट-टच) फ्रेमवर्क तैयार करने की सलाह दी है.
स्मार्ट टीवी बनाने वाली कंपनियों पर क्या असर पड़ेगा?
अब तक स्मार्ट टीवी बनाने वाली कंपनियां अपने ऐप स्टोर में किसी भी तीसरे ऐप को लिस्ट कर लेती थीं. लेकिन ट्राई की सिफारिशों के लागू होने के बाद खेल बदल जाएगा.
मास्टर रिपोजिटरी चेकिंग: MIB एक मास्टर लिस्ट बनाएगा. टीवी कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके ऐप स्टोर पर सिर्फ वही ऐप्स दिखें जो उस लिस्ट में रजिस्टर्ड हैं.
एनुअल कम्प्लायंस रिपोर्ट्स: टीवी मेकर्स और ओएस प्रोवाइडर्स को हर साल सरकार को रिपोर्ट भेजनी होगी कि उन्होंने नियमों का पालन किया है.
अन-ऑथराइज्ड ऐप्स पर रोक: अगर किसी ऐप के पास वैलिड ऑथराइजेशन नहीं होगा, तो स्मार्ट टीवी कंपनियां उसे अपने प्लेटफॉर्म से हटा देंगी या इंस्टॉल नहीं होने देंगी.
ध्यान दें: इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सरकार आपके टीवी पर सेंसरशिप लगा रही है या आप क्या देख रहे हैं उस पर नजर रख रही है. यह सिर्फ इस बात की चेकिंग है कि जो ऐप आपको सर्विस दे रहा है, वह कानूनी तौर पर रजिस्टर्ड है या नहीं.
ऐप्स कंपनियों को ऑथराइजेशन के लिए क्या करना होगा?
20 साल का लाइसेंस: ऑथराइजेशन की वैलिडिटी 20 साल की होगी, जिसे बाद में 10-10 साल के लिए बढ़ाया जा सकेगा.
मामूली फीस: प्रोसेसिंग फीस केवल 10,000 रुपये और वन-टाइम एंट्री फीस 1 लाख रुपये रखी गई है. ट्राई ने कोई बड़ा बैंक गारंटी या भारी फीस का बोझ नहीं डाला है.
सिंगल ऑनलाइन पोर्टल: रजिस्ट्रेशन और चैनल चेकिंग के लिए एक ऑनलाइन सिंगल-विंडो पोर्टल बनाने की सिफारिश की गई है.

एक दर्शक के तौर पर आपके लिए क्या बदलेगा?
अगर आप सोच रहे हैं कि इस फैसले से कल ही आपका टीवी चलना बंद हो जाएगा, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है. आइए जानते हैं फायदे और बदलाव:
कस्टमर सपोर्ट: अब एएलटीडी ऐप प्रोवाइडर्स को कस्टमर कंप्लेंट के लिए एक प्रॉपर सिस्टम बनाना होगा. अगर सर्विस रुकती है या कोई दिक्कत आती है, तो आपकी बात सुनी जाएगी.
सुरक्षित और वेरिफाइड ऐप्स: आपके स्मार्ट टीवी के ऐप स्टोर पर फर्जी या असुरक्षित ऐप्स के आने का खतरा खत्म हो जाएगा.
टीआरपी और व्यूअरशिप डेटा: अब एएलटीडी ऐप्स की व्यूअरशिप भी टीवी रेटिंग्स सिस्टम में गिनी जाएगी. इससे ब्रॉडकास्टर्स को सही आंकड़े मिलेंगे.
क्या प्लान्स महंगे होंगे? ट्राई की सिफारिशों में यह कहीं नहीं लिखा है कि ऐप्स महंगे होंगे या फ्री चैनल्स बंद हो जाएंगे. यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां अपने बिजनेस मॉडल को कैसे आगे बढ़ाती हैं.
क्या ये नियम आज से ही लागू हो गए हैं?
नहीं! यह जानना बहुत जरूरी है कि यह अभी सिर्फ ट्राई की रिकमेंडेशन्स (सिफारिशें) हैं, कोई अंतिम कानून या नियम नहीं.
इसकी पूरी टाइमलाइन कुछ ऐसी रही है:
दिसंबर 2025: एमआईबी ने ट्राई से फास्ट और इंटरनेट टीवी के लिए नियम बनाने पर राय मांगी.
अप्रैल 2026: ट्राई ने कंसल्टेशन पेपर जारी किया.
जून 2026: इंडस्ट्री के लोगों के साथ ओपन हाउस डिस्कशन हुआ.
26 अक्टूबर 2026: ट्राई ने अपनी फाइनल सिफारिशें सरकार को सौंपी हैं.
अब गेंद सरकार (मिनिस्ट्री ऑफ इंफॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग) के पाले में है. सरकार इन सिफारिशों की समीक्षा करेगी, जिसके बाद ही अंतिम नियम नोटिफाई किए जाएंगे.