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साल 2026 में सिर्फ 10 लाख रुपये से शुरुआत करने वाली फिल्म 'हनुमान अंश' ने जब बॉक्स ऑफिस पर 50 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार किया, तो हर कोई हैरान रह गया. यह फिल्म सिर्फ एक सिनेमाई सफलता नहीं है, बल्कि उस दिव्य शक्ति का प्रमाण है जिसने दुनिया के सबसे बड़े टेक दिग्गजों को भी अपने आगे झुका दिया. स्टीव जॉब्स से लेकर मार्क जुकरबर्ग तक, जब-जब सिलिकॉन वैली के दिग्गज दिशाहीन हुए, तब-तब उन्हें उत्तराखंड के कैंची धाम में स्थित नीम करोली बाबा के आश्रम से ही नई राह मिली. आखिर एक भारतीय संत का अमेरिका के अरबपतियों और टेक क्रांति से क्या संबंध है? आइए इस पूरी कहानी को आसान भाषा में समझते हैं.
बॉक्स ऑफिस पर 'हनुमान अंश' की बड़ी सफलता
विशाल चतुर्वेदी के निर्देशन में बनी फिल्म 'हनुमान अंश' ने साल 2026 में बॉक्स ऑफिस पर एक नया इतिहास रच दिया है. यह फिल्म नीम करोली बाबा के जीवन और उनकी कृपा पर आधारित है. फिल्म ने रिलीज के पहले दिन सिर्फ 10 लाख रुपये की कमाई की थी. लेकिन लोगों की तारीफ और बेहतरीन प्रतिक्रिया के कारण इस फिल्म ने भारत में 50 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार कर लिया है. इस फिल्म की अपार सफलता ने एक बार फिर लोगों का ध्यान नीम करोली बाबा और उनके धाम की ओर आकर्षित कर दिया है.
अमेरिका में बाबा के विचारों को फैलाने वाले रामदास
सिलिकॉन वैली के दिग्गजों के कैंची धाम पहुंचने से बहुत पहले ही अमेरिका में बाबा का प्रभाव शुरू हो चुका था. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक रिचर्ड अल्बर्ट 1967 में भारत आए थे. वे बाबा नीम करोली से मिले और इस मुलाकात ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी. बाबा ने उन्हें 'रामदास' नाम दिया. इसके बाद 1971 में रामदास ने 'बी हियर नाउ' (Be Here Now) नामक एक प्रसिद्ध किताब लिखी. इस किताब ने लाखों अमेरिकियों को ध्यान, योग और हिंदू आध्यात्मिकता से परिचित कराया.
स्टीव जॉब्स की भारत यात्रा और अधूरा सपना
एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स 1974 में 19 साल की उम्र में अपने दोस्त के साथ भारत आए थे. वे बाबा नीम करोली से मिलना चाहते थे. लेकिन जब वे कैंची धाम पहुंचे, तो उन्हें पता चला कि बाबा का सितंबर 1973 में ही देहांत हो चुका था. हालांकि जॉब्स बाबा से मिल नहीं सके, लेकिन भारत यात्रा के दौरान उन्हें 'ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी' किताब मिली. इस किताब ने जॉब्स के सोचने के तरीके को बदल दिया. जॉब्स ने माना कि भारतीय संस्कृति की अंतर्ज्ञान शक्ति (Intuition) बहुत मजबूत है.
गूगल और चेचक उन्मूलन में लैरी ब्रिलियंट का योगदान
लैरी ब्रिलियंट नीम करोली बाबा के बहुत बड़े भक्त थे. वे आश्रम में लगभग 3 साल तक रहे. बाबा ने उन्हें चेचक (Smallpox) की बीमारी को खत्म करने के लिए काम करने की सलाह दी. बाबा के कहने पर लैरी ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के साथ काम किया और दुनिया से चेचक को मिटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. बाद में लैरी ब्रिलियंट गूगल के परोपकारी अंग 'Google.org' के पहले कार्यकारी निदेशक बने. उन्होंने ही अन्य टेक दिग्गजों को भी कैंची धाम के बारे में बताया.
फेसबुक, गूगल और ईबे के फाउंडर्स का कनेक्शन
लैरी पेज (गूगल के सह-संस्थापक), मार्क जुकरबर्ग (फेसबुक के संस्थापक) और जेफरी स्कॉल (ईबे के सह-संस्थापक) भी कैंची धाम की यात्रा कर चुके हैं. मार्क जुकरबर्ग जब फेसबुक के शुरुआती दिनों में कठिन दौर से गुजर रहे थे, तब स्टीव जॉब्स ने ही उन्हें कैंची धाम जाने की सलाह दी थी. वहां जाकर जुकरबर्ग को अपने काम का सही मकसद समझ में आया.
कोई बिजनेस मंत्र नहीं, सिर्फ सेवा और भक्ति का संदेश
नीम करोली बाबा ने कभी किसी को व्यापार या स्टार्टअप चलाने के तरीके नहीं सिखाए. उन्होंने हमेशा बहुत सरल बातें बताईं. वे अपने भक्तों को 'सीता-राम' का नाम जपने, हनुमान चालीसा का पाठ करने और निस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करने की सीख देते थे. कैंची धाम से शुरू हुई यह आध्यात्मिक ऊर्जा आज भी दुनिया भर के लोगों का मार्गदर्शन कर रही है.