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गूगल से कैनवा तक: AI की वो सुनामी जो अभी सिर्फ पहली लहर है

गूगल और कैनवा की ताजा सुर्खियां अलग-अलग लग सकती हैं, पर आंकड़े, इतिहास और आने वाले वर्षों का हिसाब-किताब मिलाकर देखें तो दोनों एक ही बड़ी कहानी की दो कड़ियां हैं.

Written By शशांक Edited By Bhoopendra Rai
Published: Nov 06, 2026, 10:09 PM IST | Updated: Nov 06, 2026, 11:47 PM IST
Image Credit: AI
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"गूगल-कैनवा जैसी कंपनियां ऑफर के साथ नौकरी छीन रही हैं," यह शिकायत अब सिर्फ धारणा नहीं, दस्तावेजों में दर्ज हकीकत है. फरवरी 2026 में Google ने अपने ग्लोबल बिजनेस डिवीजन के कर्मचारियों को एक और "वॉलंटरी एग्जिट प्रोग्राम" (VEP) का ऑफर दिया, जो आठ महीनों में तीसरा ऐसा राउंड था. कंपनी के चीफ बिजनेस ऑफिसर फिलिप शिंडलर ने कर्मचारियों से सीधा कहा कि या तो AI रणनीति में पूरी तरह उतरें, या सम्मानजनक विदाई का पैकेज लें.

जुलाई 2026 में Google के 4,500 कर्मचारियों ने सीईओ सुंदर पिचाई को याचिका सौंपी, जिसमें बेहतर मुआवजे और पक्की वॉलंटरी एग्जिट स्कीम की मांग की गई. उधर ऑस्ट्रेलियाई डिजाइन कंपनी Canva ने मार्च 2026 में अपनी स्थापना के बाद पहली बार छंटनी की, जिसमें 12 में से 10 टेक्निकल राइटर्स की नौकरी गई, वह भी उन्हीं कर्मचारियों की जिन्हें कंपनी पहले भरोसा दिला चुकी थी कि AI से किसी की नौकरी नहीं जाएगी. ये दोनों उदाहरण अकेले नहीं हैं. ये एक बहुत बड़े, वैश्विक और भारत तक फैले बदलाव की बानगी भर हैं, जिसे आंकड़ों, इतिहास और आगे के संभावित रास्तों से समझना जरूरी है.

आंकड़े इस डर को बेबुनियाद नहीं ठहराते, बल्कि उसकी सीमा और दायरा साफ करते हैं

क्रंचबेस की रिपोर्ट के अनुसार 2026 में छंटनी की घटनाओं में AI का हवाला 33 प्रतिशत मामलों में दिया गया, जबकि 2024 में यह आंकड़ा सिर्फ 1 प्रतिशत था. हेडकाउंट के लिहाज से Layoffs.fyi के अनुसार टेक इंडस्ट्री में 2026 की कुल वैश्विक छंटनी के 72 प्रतिशत हिस्से का कारण AI को बताया गया.

चैलेंजर ग्रे की रिपोर्ट के अनुसार मई 2026 में अमेरिका में AI को 38,579 छंटनी का कारण बताया गया, जो उस महीने की कुल छंटनी का 40 प्रतिशत और ट्रैकिंग शुरू होने के बाद का सबसे ऊंचा मासिक आंकड़ा था. लेकिन अगस्त 2026 तक यह रफ्तार घटकर दिसंबर 2025 के बाद के सबसे निचले स्तर पर आ गई, जो बताता है कि यह लहर लगातार एक-सी नहीं, बल्कि उतार-चढ़ाव भरी है.

इतिहास

AI से पहले भी तकनीक ने यही डर कई बार पैदा किया है और इतिहास का जवाब दिखने से कहीं ज्यादा पेचीदा है. सबसे लोकप्रिय उदाहरण एटीएम और बैंक टेलर का है. 1970-80 के दशक में जब एटीएम आए, तो अनुमान था कि टेलर की नौकरियां खत्म हो जाएंगी. अर्थशास्त्री जेम्स बेसेन के शोध के अनुसार हुआ उलटा, 1980 से 2010 के बीच अमेरिका में टेलर की संख्या करीब 5 लाख से बढ़कर लगभग 6 लाख हो गई. पूरी कहानी इतनी सीधी नहीं है. एटीएम से बैंकों के लिए नई शाखाएं खोलना सस्ता हो गया, इसलिए टेलर की कुल संख्या बढ़ती रही, भले ही हर शाखा में जरूरत घटती गई.

असली गिरावट तब आई जब 2010 के बाद मोबाइल बैंकिंग और स्मार्टफोन आम हुए, अमेरिका में फुल-टाइम टेलर की संख्या 2010 के 3.3 लाख से घटकर 2022 में करीब 1.6 लाख रह गई. सबक साफ है, तकनीक नौकरी को तुरंत खत्म नहीं करती, बल्कि उसे बदलती है और असली झटका अक्सर दूसरी लहर में, देर से आता है.

कृषि क्षेत्र का उदाहरण और बड़ा है. अमेरिकी जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 1870 में अमेरिका की आधी से ज्यादा श्रमशक्ति खेती में लगी थी, 1900 तक यह आंकड़ा घटकर करीब 37 प्रतिशत रह गया, और आज अमेरिका में सिर्फ लगभग 2 प्रतिशत कामगार खेती से जुड़े हैं. ट्रैक्टर और मशीनीकरण ने लाखों खेतिहर मजदूरों को विस्थापित किया, लेकिन अर्थव्यवस्था ने दशकों में उन्हें उद्योग और सेवा क्षेत्र में खपा लिया. यह इतिहास दो बातें एक साथ सिखाता है, कुल मिलाकर रोजगार खत्म नहीं होता बल्कि दोबारा बंटता है, लेकिन यह दोबारा बंटना अक्सर दशकों में होता है और इस बीच की पीढ़ी असली कीमत चुकाती है.

परिदृश्य एक: संकट

अगर यह बदलाव बिना तैयारी के हुआ, तो सबसे गहरी चोट एंट्री-लेवल और रूटीन नौकरियों पर पड़ेगी, और भारत में इसके संकेत पहले से दिख रहे हैं. भारत की टॉप पांच आईटी कंपनियों, टीसीएस, इन्फोसिस, विप्रो, एचसीएलटेक और टेक महिंद्रा का कुल हेडकाउंट वित्त वर्ष 2026 में करीब 7,000 घटा, जबकि पिछले साल इसमें करीब 12,700 की बढ़ोत्तरी हुई थी. स्टाफिंग फर्म एक्सफेनो के अनुसार एंट्री-लेवल नौकरियों के ऑफर सालाना आधार पर करीब 44 प्रतिशत घट गए, जबकि सीनियर पदों में यह गिरावट 67 प्रतिशत तक रही.

स्टैनफोर्ड और नोमुरा के विश्लेषण बताते हैं कि भारत की 55 प्रतिशत आईटी कंपनियों ने फ्रेशर हायरिंग घटाई, जबकि सीनियर पदों में यह आंकड़ा सिर्फ 14 प्रतिशत था. AI के असर वाले क्षेत्रों में 22 से 25 साल के युवाओं के लिए नौकरियां करीब 13 प्रतिशत घट गई हैं, और इन्फोसिस में 30 साल से कम उम्र के कर्मचारियों की हिस्सेदारी कुछ ही सालों में करीब 60 प्रतिशत से घटकर 51 प्रतिशत रह गई है.

यह सिर्फ आईटी तक सीमित नहीं है. क्रंचबेस की रिपोर्ट के अनुसार 2026 में छंटनी की घटनाओं में AI का हवाला 33 प्रतिशत मामलों में दिया गया, जबकि 2024 में यह आंकड़ा सिर्फ 1 प्रतिशत था. layoffs.fyi के आंकड़ों के अनुसार सितंबर 2026 तक ही दुनियाभर में 1.28 लाख से ज्यादा टेक कर्मचारी निकाले जा चुके थे, जो 2025 के पूरे साल के आंकड़े से भी ज्यादा है.

नीति आयोग की रिपोर्ट ने भी चेताया है कि भारत में AI पेशेवरों की शुद्ध प्रतिभा पलायन दर नकारात्मक है और स्वीकृत AI पेटेंट में भारत की हिस्सेदारी 2010 के 8-10 प्रतिशत से घटकर 2023 में 5 प्रतिशत से भी कम रह गई है. खतरा सिर्फ नौकरी जाने का नहीं, बल्कि इस बात का भी है कि अगर कुशल युवाओं की बड़ी तादाद के पास ठीक मौके की कमी बनी रही, तो यही सामाजिक तनाव और राजनीतिक दबाव की जड़ बन सकता है.

परिदृश्य दो: अवसर

दूसरी तरफ की तस्वीर भी उतनी ही ठोस आंकड़ों पर टिकी है, और उतनी निराशाजनक नहीं.
विश्व आर्थिक मंच की फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट 2025 के अनुसार 2030 तक दुनियाभर में 17 करोड़ नई नौकरियां बनेंगी, जबकि 9.2 करोड़ नौकरियां खत्म होंगी, यानी शुद्ध रूप से करीब 7.8 करोड़ नई नौकरियों का इजाफा होगा. यह रिपोर्ट 1,000 से ज्यादा बड़ी वैश्विक कंपनियों के सर्वे पर आधारित है, जो 14 करोड़ से ज्यादा कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करती है.

आर्थिक पैमाने पर भी अनुमान बड़े हैं. मैकिंजी के अनुसार जेनरेटिव AI हर साल वैश्विक अर्थव्यवस्था में 2.6 से 4.4 ट्रिलियन डॉलर जोड़ सकता है. गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि AI अगले दस साल में वैश्विक जीडीपी में करीब 7 प्रतिशत यानी लगभग 7 ट्रिलियन डॉलर की बढ़ोत्तरी ला सकता है, हालांकि अर्थशास्त्री डैरन एसमोग्लू जैसे आलोचक इसे ज्यादा आशावादी मानते हुए कहीं कम, करीब 1 प्रतिशत जीडीपी बढ़त का अनुमान देते हैं.

कैनवा का ही उदाहरण दिखाता है कि यह रास्ता तय नहीं है. जब कंपनी ने AI स्टार्टअप Leonardo.AI को जोड़ा, तो मीडिया में छंटनी की आशंका जताई गई, लेकिन कैनवा ने उन कर्मचारियों की नौकरी बचाते हुए उन्हें दूसरी टीमों में समायोजित किया.

भारत की तस्वीर भी पूरी तरह अंधकारमय नहीं है. इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2026 के अनुसार देश की रोजगारयोग्यता दर 2022 के 46.2 प्रतिशत से बढ़कर 2026 में 56.35 प्रतिशत हो गई है, और भारत के पास वैश्विक AI प्रतिभा का करीब 16 प्रतिशत हिस्सा है, जो 2027 तक बढ़कर 12.5 लाख विशेषज्ञों तक पहुंच सकता है. इसके अलावा बड़ी वैश्विक कंपनियों के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) भारत में लगातार तीसरे साल नई नौकरियां जोड़ रहे हैं, जिसकी वजह से आईटी कंपनियों में छंटनी के बावजूद देश का कुल आईटी रोजगार मामूली रूप से बढ़ा है.

भारत पर असर

भारत के लिए यह सिर्फ वैश्विक बहस नहीं, बल्कि सीधे घरेलू अर्थव्यवस्था और डेमोग्राफिक डिविडेंड का सवाल है. देश का आईटी सेक्टर 2024 में करीब 72 लाख लोगों को रोजगार देता था, और दशकों से मध्यम वर्ग की आर्थिक महत्वाकांक्षा की सीढ़ी रहा है. टीसीएस ने वित्त वर्ष 2027 के लिए 25,000 फ्रेशर का लक्ष्य रखा है, जो पिछले सालों के 40,000-42,000 के औसत से काफी कम है, जबकि कंपनी ने उसी साल करीब 12,000 मिड-सीनियर कर्मचारियों की छंटनी भी की.

सरकार ने भी इस चुनौती को स्वीकार किया है. बजट 2026-27 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने AI के रोजगार पर असर आंकने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाने का एलान किया. नीति आयोग पहले ही दो रिपोर्टें जारी कर चुका है, जिनमें भारत को वैश्विक AI वर्कफोर्स कैपिटल बनाने की रणनीति के साथ-साथ प्रतिभा पलायन और घटते पेटेंट हिस्से जैसे ढांचागत जोखिम भी गिनाए गए हैं.

असली चुनौती रफ्तार की है. भारत हर साल लाखों युवाओं को कार्यबल में जोड़ता है, लेकिन पारंपरिक एंट्री-लेवल कोडिंग और टेस्टिंग जैसी नौकरियां ठीक उसी रफ्तार से सिकुड़ रही हैं. अगर कौशल विकास और AI, डेटा व साइबर सुरक्षा जैसी नई तरह की नौकरियां इस खाली जगह को तेजी से नहीं भरतीं, तो भारत की जनसंख्या बढ़त, जिसे अब तक आर्थिक ताकत माना जाता रहा है, बोझ में बदलने का जोखिम है.

निष्कर्ष

तो क्या गूगल और कैनवा के ऑफर लेटर असल में भेष बदलकर आई पिंक स्लिप हैं? जवाब है, कुछ हद तक हां, और कुछ हद तक यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अगले कुछ साल कैसे संभाले जाते हैं.

इतिहास, चाहे वह एटीएम का हो या खेती का, यही बताता है कि तकनीक कुल मिलाकर रोजगार खत्म नहीं करती, बल्कि उसे फिर से गढ़ती है. लेकिन वही इतिहास यह भी चेताता है कि असली झटका अक्सर देर से, दूसरी लहर में आता है, और तब तक एक पूरी पीढ़ी अनिश्चितता से गुजर चुकी होती है.

फिलहाल दुनिया और भारत दोनों उसी पहली लहर में हैं, वॉलंटरी एग्जिट, घटती फ्रेशर हायरिंग और बढ़ते दावों के बीच. आंकड़े बताते हैं कि रूटीन, एंट्री-लेवल और नियम-आधारित काम सबसे पहले प्रभावित हो रहे हैं, जबकि जजमेंट, रिश्तों और जटिल समस्या-समाधान वाली भूमिकाएं फिलहाल टिकी हुई हैं और कई जगह बढ़ भी रही हैं.

असल फैसला तकनीक नहीं, नीति करेगी. कितनी तेजी से नया कौशल सिखाया जाता है, सामाजिक सुरक्षा का कैसा जाल बुना जाता है, और भारत जैसे देश अपने GCC और AI-कौशल वाले फायदे को कितनी तेजी से भुनाते हैं, यही तय करेगा कि यह बदलाव संकट बनकर टूटता है या अवसर बनकर संवरता है.

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About the Author

लेखक एक राजनीतिक विश्लेषक और रणनीतिकार हैं, जिन्होंने भारत का पहला एआई-आधारित चुनावी भविष्यवाणी मॉडल विकसित किया है. वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और प्रौद्योगिकी जैसे विषयों पर नेताओं और थिंक टैंकों को सलाह देते हैं. साथ ही, वे जमीनी स्तर पर शिक्षा को बढ़ावा देने वाली पहलों के समर्थक हैं.
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