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सोचिए आप लाखों की चमचमाती स्पोर्ट्स कार खरीद लें, लेकिन सड़क पर चलाने के लिए पेट्रोल ही न मिले! सुनकर अजीब लगेगा ना? लेकिन इस वक्त दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियां जैसे Amazon, Microsoft और Google ठीक इसी सिचुएशन से गुजर रही हैं. AI का क्रेज इतना जबरदस्त है कि कंपनियां दिन-रात पानी की तरह पैसा बहा रही हैं. Nvidia के सबसे पावरफुल AI चिप्स की होड़ मची है. लेकिन अचानक से एक ऐसी प्रॉब्लम सामने आ गई है जिसने टेक जॉइंट्स के पसीने छुड़ा दिए हैं. दिक्कत यह नहीं है कि चिप्स कम पड़ गए हैं, बल्कि दिक्कत यह है कि इन सुपरचिप्स को चलाने के लिए बिजली ही नहीं बची है. इसी वजह से जन्म हुआ है एक नए टर्म का - Dark GPUs. समझते हैं कि आखिर यह पूरा माजरा क्या है और क्यों ये बंद पड़े चिप्स पूरे AI फ्यूचर को स्लो कर रहे हैं.

क्या होते हैं ये 'Dark GPUs'?
जब कोई कंपनी Nvidia या किसी अन्य ब्रैंड से बहुत महंगे GPUs (Graphics Processing Units) खरीद लेती है, लेकिन बिजली की कमी, अधूरे डेटा सेंटर्स या खराब सेटअप की वजह से उन्हें ऑन (Power On) ही नहीं कर पाती, तो उन बंद पड़े और बेकार बैठे चिप्स को टेक इंडस्ट्री में Dark GPUs कहा जाता है. आसान शब्दों में कहें तो - खरीदे गए पर बिजली के अभाव में डिब्बे में बंद पड़े AI चिप्स ही Dark GPUs हैं.
CPU और GPU में क्या फर्क है? और AI में इनकी इतनी डिमांड क्यों है?
आपके फोन या नॉर्मल लैपटॉप में CPU (Central Processing Unit) होता है. CPU का काम एक बार में एक या कुछ चुनिंदा काम संभालना होता है. यह ऑल-राउंडर तो है, लेकिन बहुत भारी डेटा एक साथ प्रोसेस नहीं कर सकता.
दूसरी तरफ GPU एक ऐसा स्पेशलाइज्ड चिप है जो एक ही टाइम पर करोड़ों कैलकुलेशन एक साथ कर सकता है. जब आप ChatGPT से कोई फोटो बनवाते हैं, किसी वीडियो का AI अवतार बनाते हैं या कोई बड़ा AI मॉडल ट्रेन करते हैं, तो वहां CPU काम नहीं आता. वहां हजारों GPUs मिलकर एक साथ काम करते हैं.
यही वजह है कि टेक कंपनियां डेटा सेंटर्स में सर्वर रैक्स (Server Racks) के अंदर हजारों GPUs को एक साथ जोड़कर लगाती हैं ताकि वे AI सर्विसेज को बिजली की स्पीड से चला सकें.

जब चिप्स आ गए, तो बिजली क्यों नहीं मिल रही?
यह सवाल दिमाग में आना लाजमी है कि इतनी बड़ी कंपनियां बिना बिजली का इंतजाम किए सामान क्यों खरीद रही हैं? इसके पीछे कुछ बड़े रीजन्स हैं:
AI डेटा सेंटर्स की भूख: एक AI डेटा सेंटर को चलाने के लिए साधारण बिजली की जरूरत नहीं होती. वहां हजारों हाई-पावर चिप्स 24 घंटे लगातार चलते हैं. उन्हें ठंडा रखने के लिए विशाल कूलिंग सिस्टम और आपस में कनेक्ट करने के लिए भारी-भरकम नेटवर्किंग गियर चाहिए होता है.
बिजली कनेक्शन मिलने में बरसों की देरी: चिप्स का ऑर्डर दो तो वो कुछ महीनों में डिलीवर हो जाते हैं. लेकिन नए पावर ग्रिड बनाना, बिजली विभाग से परमिशन लेना, ट्रांसमिशन लाइनें बिछाना और एनवायरनमेंटल क्लियरेंस पाना... इस पूरे प्रोसेस में सालों का वक्त लग जाता है.
GPUs की कुल खपत: एक रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन Epoch AI के मुताबिक, किसी भी फ्रंटियर AI डेटा सेंटर में उसकी कुल बिजली का लगभग 40% हिस्सा सिर्फ GPUs ही खींच लेते हैं. बाकी बचा 60% हिस्सा कूलिंग और नेटवर्किंग में चला जाता है.
यानी हार्डवेयर की सप्लाई तो फास्ट है, पर पावर इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत स्लो है. इसी मिसमैच की वजह से चिप्स सीधे डिलीवरी से निकलकर गोदामों में रखे जा रहे हैं.
Amazon का $5 Billion वाला बड़ा झटका
बिजनेस इंसाइडर की एक रिपोर्ट ने पूरी टेक दुनिया में खलबली मचा दी. रिपोर्ट के मुताबिक, Amazon वेब सर्विसेज (AWS) ने 'Early Rack Receipt' प्रोग्राम के तहत Nvidia के साथ एक डील की. इस डील के तहत Amazon को अगस्त में करीब $5 बिलियन (लगभग 41,000 करोड़ रुपये) के Nvidia GB300 सर्वर रैक्स मिलने थे, और उसके बाद हर महीने $3 बिलियन के रैक्स आने थे.
Amazon ने हार्डवेयर तो सिक्योर कर लिया ताकि मार्केट में कोई और इसे न झपट ले. लेकिन सच यह निकला कि कई डेटा सेंटर्स के पास इतने हाई-वोल्टेज सेटअप को चलाने के लिए बिजली ही नहीं थी. नतीजा? अरबों डॉलर के Nvidia racks अब गोदामों में सिर्फ धूल खा रहे हैं और अपने चालू होने का इंतजार कर रहे हैं.

Dark GPUs से टेक दुनिया को क्या-क्या नुकसान हो रहा है?
अगर आपको लगता है कि यह सिर्फ कंपनियों के सिरदर्द की बात है, तो ऐसा नहीं है. इसका असर पूरे टेक इकोसिस्टम पर पड़ रहा है:
अरबों डॉलर फंसे पड़े हैं
GPUs बहुत ज्यादा महंगे होते हैं. कंपनियां जब भारी-भरकम कैश देकर ये चिप्स खरीद लेती हैं और वे इस्तेमाल नहीं होते, तो उस पैसे से तुरंत कोई कमाई (Revenue) नहीं होती. पैसा पूरी तरह लॉक हो जाता है.
फाइनेंशियल प्रेशर और निगेटिव कैश फ्लो
सिर्फ चिप्स खरीदना ही नहीं, उन्हें गोदामों में सेफ रखना, उनकी देखभाल करना और बाद में इंस्टॉल करने का खर्च भी अलग से आता है. Amazon के हालिया नतीजे बताते हैं कि पिछले 12 महीनों में उसका फ्री कैश फ्लो माइनस $42.4 Billion हो गया. कंपनी ने साफ कहा कि यह गिरावट AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर पानी की तरह बहाए गए पैसे की वजह से आई है.
नए AI टूल्स और क्लाउड सर्विसेज में देरी
जब खरीदे गए कंप्यूटिंग रिसोर्सेस ही चालू नहीं होंगे, तो AI डेवलपर्स और आम यूजर्स को नए फीचर्स, तेज सर्वर और एडवांस AI टूल्स टाइम पर नहीं मिल पाएंगे. क्लाउड कंप्यूटिंग की कैपेसिटी रुक जाएगी.
पूरी सप्लाई चेन पर असर
यह मामला सिर्फ बिजली का नहीं है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2028 तक अमेरिकी डेटा सेंटर डेवलपर्स को लगभग 34% (यानी 32 गीगावाट) बिजली की भारी कमी का सामना करना पड़ सकता है. अगर डेटा सेंटर ही नहीं बनेंगे, तो मेमोरी चिप्स, ऑप्टिकल केबल्स और बाकी पार्ट्स बनाने वाली कंपनियों की डिमांड पर भी बुरा असर पड़ेगा.
क्या आने वाले समय में यह प्रॉब्लम और बढ़ेगी?
फिलहाल देखकर तो यही लगता है कि यह क्राइसिस इतनी जल्दी खत्म नहीं होने वाला. Amazon के CEO एंडी जेसी (Andy Jassy) ने हाल ही में साफ किया कि कंपनी 2026 में करीब $220 बिलियन का कैपिटल एक्सपेंडिचर (CapEx) करने वाली है और 2027 में तो इससे भी ज्यादा खर्च होगा.