सिर्फ हनुमान जी ही नहीं, रावण ने भी उठा लिया था पूरा कैलाश पर्वत, घबरा गईं थीं मां पार्वती!
लंकापति रावण शिवजी का परम भक्त था, लेकिन एक बार उसने ऐसा काम किया कि पार्वती जी घबरा गईं और शिव जी क्रोधित हो गए थे. इसके बाद शिव जी की स्तुति करने पर ही रावण को अभयदान मिला था.
दस सिर वाला रावण प्रकांड विद्वान, वेदों का ज्ञाता, महाशक्तिशाली और भगवान शिव का परम भक्त था. लेकिन अहंकार करने की बुराई के कारण उसका प्रभु राम के हाथों वध हुआ. हालांकि इसके पहले भी अहंकार के कारण रावण को मुंह की खानी पड़ी थी. इससे जुड़ी एक रोचक घटना है, जब उसने पूरा का पूरा कैलाश पर्वत उठा लिया था और फिर शिवजी ने उसका अहंकार तोड़ने के लिए लीला रची थी.
शिव जी को अर्पित किए 10 सिर
रावण ने भगवान शंकर को प्रसन्न करके मनचाहा वरदान पाने के लिए घोर तपस्या की. जब शिव जी प्रकट नहीं हुए तो उसने अपने शीश काट-काट कर उनके चरणों में अर्पित करने शुरू किए. हर बार वह शीश काटता तो उसके स्थान पर दूसरा सिर आ जाता. इस तरह उसने शिव जी को 9 शीश अर्पित किए और जब वह 10वां सिर काटने लगा तो शिव जी प्रकट हुए.
इसके बाद रावण ने शिव जी से सर्वशक्तिमान होने का वरदान मांगा कि वह ऐसा बलवान हो जाए कि उसकी किसी से तुलना ही न हो सके.
नारद जी ने बनाई योजना
रावण के अहंकार से सारे देवता परिचित थे, उस पर अब तो रावण शक्तिशाली भी हो गया था, ऐसे में उसका उत्पात मचाना तय था. तब देवताओं ने देवर्षि नारद से इस समस्या का समाधान पूछा. नारदजी ने उन्हें भरोसा दिलाया और इसका उपाय खोजने की बात कही.
इसके बाद नारद जी रावण के पास लंका पहुंचे और बोले, ''हे लंकापति! आपका यह अद्धभुत अट्टाहस साफ साफ यह बता रहा है कि आपको किसी मनवांछित वर की प्राप्ति हो गयी है.'' रावण ने गर्व से कहा, ''आपने सत्य कहा, देवर्षिः आज मैं बहुत प्रसन्न हूं, मैंने भगवान शिव से अतुल्य बल का वरदान प्राप्त किया है.''
इस पर नारदजी मुस्कुराते हुए बोले, ''राक्षसराज! आप इतने बुद्धिमान हैं फिर भी आप भांग खाकर हमेशा नशे में मस्त रहने वाले अघोरी की बातों में आ गए. उन्होंने नशे में वर दे दिया होगा और आप उसे सच मान बैठे. आप उस अघोरी के कहे पर यकीन ना करें और इस वरदान की सच्चाई जानने के लिए क्यों ना कैलाश को ही उठाकर देख लें…?''
रावण नारद जी की बातों में आ गया और उसने कैलाश पर्वत उठाने की सोची. वह कैलाश पर्वत के पास पहुंचा और उसे जमीन से उखाड़कर उठाने लगा. कैलाश को हिलते-डुलते देख मां पार्वती समेत वहां रहने वाले सभी जीव भयभीत हो गए. परंतु भगवान शिव सारी बात समझ गए. उन्होंने रावण को पर्वत उठाने दिया और इसके बाद उसे सबक सिखाने की सोची.
शिव जी अपने पैर के एक अगूंठे से कैलाश पर्वत को थोड़ा सा दबा दिया जिससे रावण कैलाश पर्वत के नीचे दबकर छटपटाने लगा. शिवजी के क्रोध से रावण डर गया और उनको शांत करने के लिए उनकी स्तुति करने लगा. इसके बाद शिव जी ने उसे अभयदान दिया.
(Disclaimer: यह लेख धार्मिक ग्रंथों और प्रचलित पौराणिक मान्यताओं में वर्णित कथा पर आधारित है. विभिन्न ग्रंथों और क्षेत्रीय परंपराओं में प्रसंगों के विवरण में अंतर हो सकता है.)