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Jitiya Vrat Nahay Khay 2026: कल है जितिया का नहाय-खाय, जान लें क्या खाएं और कैसे करें निर्जला व्रत शुरू

Jitiya Vrat Nahay Khay 2026: हर साल आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि पर जितिया व्रत रखने का विधान है. इस व्रत की शुरुआत नहाय-खाय से होती है और फिर निर्जला व्रत रखकर माताएं पारण करती हैं.

Written By Padma Shree Shubham
Published: Oct 01, 2026, 03:25 PM IST | Updated: Oct 01, 2026, 03:30 PM IST
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Jitiya Nahay Khay 2026: हर साल आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि पर जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत का संकल्प किया जाता है. इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और उत्तम स्वास्थ्य की कामना के साथ निर्जला व्रत रखती है. यह तीन दिन का व्रत होता है जिसमें नहाय-खाय, व्रत और पारण का विधान है. जबकि जितिया व्रत 3 अक्टूबर को रखा जाएगा तो इस आधार पर कल यानी 2 अक्टूबर को माताएं नहाय-खाय और ओठगन की रस्म करेंगी. इसके बाद अगले दिन व्रत रखकर विधि विधान से पूजा कर करेंगी और संतान के सुख-संपन्नता के लिए भगवान से प्रार्थना करती है. आइए जानें नहाय-खाय से जुड़ी जानकारियां.

जितिया व्रत 2026 की तिथियां

जितिया का पर्व तीन दिनों का होता है जो इसमें पहले दिन नहाय खाय, दूसरे दिन जितिया का निर्जजला व्रत रखा जाता है और तीसरे दिन पारण कर व्रत को पूर्ण किया जाता है.

नहाय खाय- 2 अक्टूबर 2026, शुक्रवार
निर्जला व्रत- 3 अक्टूबर 2026, शनिवार
जितिया व्रत का पारण- 4 अक्टूबर 2026, रविवार

2 अक्टूबर 2026 को जितिया का नहाय-खाय

जितिया का व्रत रखने वाली माताएं नहाय-खान के दिन सुबह उठती हैं और स्नान आदि करती हैं. अब नियमित पूजा करने के बाद भोजन ग्रहण करती हैं. नहाय-खाय वाले दिन झिंगनी (तोरी), नोनी साग, मडुआ की रोटी खाने का परंपरा है. नहाय खाय की रात को ब्रह्म मुहूर्त से पहले व्रत रखने वाली माताएं विधि-विधान से ओठगन करती हैं. जिसके बाद जितिया का निर्जला व्रत प्रारंभ हो जाता है.

ओठगन का महत्व

जिउतिया पर्व बिना ओंठगन की रस्म के व्रत शुरू नहीं हो सकता है. यह सरगी की तरह ही होता है. इसमें नहाय-खाय की रात यानी सप्तमी तिथि की रात को या उसके अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त में सुबह के लगभग 3 से 4 बजे तक माताएं उठ जाती हैं और ओठगन करती हैं यानी सरगी करती हैं. इसमें हल्के भोजन और जल ग्रहण करने का विधान है. इसके बाद अगले दिन निर्जला व्रत शुरू हो जाता है. सप्तमी की रात को कई जगह पर एक जरूरी रस्म निभाया जाता है. घर के आंगन में झिंगुनी यानी तोरई के पत्ते पर माताएं दही-चूरा और मिठाई चढ़ाती हैं. पत्ते की संख्या व्रती महिला की संतान की संख्या से एक ज्यादा रखे जाते हैं. यह एक ज्यादा पत्ता पूर्वजों और पितरों का भाग होता है. जल से अर्घ्य दिया जाता है और झिंगुनी के पत्तों पर चढ़े प्रसाद संतानों को खिलाया जाता है. हालांकि ओठगल की कई और विधिया भी जगह के अनुसार पूरी की जाती हैं.

(डिस्क्लेमर- यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार व्रत-त्योहारों की तिथि, पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर संभव है. पाठक इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के रूप में देखें.)

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About the Author

पद्मा श्री शुभम् को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव. मॉस कम्‍युनिकेशन ग्रेजुएट और हिंदी लिटरेचर से पोस्‍ट ग्रेजुएट. मीडिया में डिजिटल प्लेटफॉर्म से करियर शुरू करने के बाद कई संस्थाओं में काम किया. Nedrick News, TFI Post जैसी संस्थाओं में कार्यरत रहीं. इसके बाद Zee News जॉइन किया. समाचार और वर्तमान घटनाओं पर लिखने पढ़ने में रुचि. धर्म और ज्योतिष में अधिक रुचि. वर्तमान में धर्म और ज्योतिष संबंधी लेख लिखने में कार्यरत. पद्मा से आप padma.shubham@India.com मेल के जरिए सीधे संपर्क कर सकते हैं.
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