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दीपावली 5 दिन का पर्व है, लेकिन कई जगह इसे 6 दिन का माना जाता है और इसकी शुरुआत धनतेरस से पहले बसु बारस से मानी जाती है. इसे गोवत्स द्वादशी कहते हैं. इस पर्व कार्तिक कृष्ण द्वादशी तिथि को रखा जाता है. इस दिन गाय और बछड़े की पूजा की जाती है. माना जाता है इससे गौमाता का आशीर्वाद मिलता है, मोक्ष का रास्ता खुलता है. इस दिन व्रत रखें और विधि-विधान से पूजा करें. गौमाता के प्रति आभार जताएं. जानिए इस साल ये व्रत कब रखा जाएगा और पूजा की जाएगी.
द्रिक पंचांग के अनुसार, 5 नवंबर की सुबह 10:35 बजे से 6 नवंबर की सुबह 10:30 बजे तक कार्तिक कृष्ण द्वादशी तिथि है. चूंकि इसकी पूजा शाम को प्रदोष काल में करना विशेष अच्छा माना जाता है. लिहाजा 5 नवंबर को गोवत्स द्वादशी मनाई जाएगी.
गोवत्स द्वादशी पूजा मुहूर्त : शाम 05:33 बजे से रात 08:10 बजे तक.
धार्मिक मान्यता है कि गाय में सभी देवी-देवताओं का वास होता है. साथ ही गाय की पूजा करने से लक्ष्मी जी भी प्रसन्न होती हैं. जीवन में सुख-समृद्धि बढ़ती है. गाय-बछड़े की एकसाथ पूजा करना मातृत्व का भी सम्मान है. सबसे पहले गाय और बछड़े को स्वच्छ जल से नहलाएं. फिर उसका श्रृंगार करें. उसे हल्दी, कुमकुम लगाएं. फूल माला पहनाएं. धूप-दीप जलाकर आरती करें. गाय को गुड़ और हरा चारा खिलाएं. इस दिन संतान के लिए व्रत भी रखा जाता है. साथ ही गाय के खुरों की मिट्टी माथे पर लगाते हैं. मान्यता है कि ऐसा करने से सोई किस्मत जाग जाती है.
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने एक बार वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और माता पार्वती ने गाय व भगवान कार्तिकेय ने बछड़े का रूप धारण किया. वे तीनों महर्षि भृगु के आश्रम पहुंचे और उनसे कहा कि वे कुछ समय के लिए जा रहे हैं और तब तक गाय तथा बछड़े की देखभाल की जिम्मेदारी वे संभालें.
आश्रम में रह रहे ऋषियों ने गाय और बछड़े की रक्षा करने का वचन दिया. इसके बाद भगवान शिव ने उनकी परीक्षा लेने के लिए बाघ का रूप धारण किया और गाय-बछड़े को डराने लगे. ऋषि-मुनि भयभीत तो हुए, लेकिन उन्होंने दोनों की रक्षा करने का प्रयास जारी रखा.
बाघ से गाय-बछड़े को बचाने के लिए विशेष घंटे की ध्वनि पैदा की. जिससे बाघ दूर हो गया. इसके बाद भगवान शिव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए. साथ ही माता पार्वती और भगवान कार्तिकेय भी अपने असली रूप में आए. इसके बाद ऋषियों ने तीनों देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की. मान्यता है कि यह घटना कार्तिक मास की द्वादशी को हुई थी. इसीलिए इस तिथि पर गोवत्स द्वादशी मनाई जाती है.
(Disclaimer: यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार व्रत-त्योहारों की तिथि, पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर संभव है. पाठक इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के रूप में देखें.)