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गोवत्‍स द्वादशी 2026: गाय के पैर की मिट्टी से चमकेगी किस्मत? दिवाली से पहले किस दिन होगी गौमाता की पूजा

Govats Dwadashi Puja: दिवाली महापर्व की शुरुआत से पहले गोवत्‍स द्वादशी मनाई जाती है. जिसे बसुबारस और वाघ बारस भी कहा जाता है. जानिए इस साल यह पर्व कब है और इस दिन क्‍या-क्‍या करें?

गोवत्‍स द्वादशी 2026: गाय के पैर की मिट्टी से चमकेगी किस्मत? दिवाली से पहले किस दिन होगी गौमाता की पूजा
Image Credit: गोवत्‍स द्वादशी के दिन ही भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान कार्तिकेय ने गाय-बछड़ा बनकर ऋषियों की परीक्षा ली थी. (Photo: AI)

दीपावली 5 दिन का पर्व है, लेकिन कई जगह इसे 6 दिन का माना जाता है और इसकी शुरुआत धनतेरस से पहले बसु बारस से मानी जाती है. इसे गोवत्‍स द्वादशी कहते हैं. इस पर्व कार्तिक कृष्‍ण द्वादशी तिथि को रखा जाता है. इस दिन गाय और बछड़े की पूजा की जाती है. माना जाता है इससे गौमाता का आशीर्वाद मिलता है, मोक्ष का रास्‍ता खुलता है. इस दिन व्रत रखें और विधि-विधान से पूजा करें. गौमाता के प्रति आभार जताएं. जानिए इस साल ये व्रत कब रखा जाएगा और पूजा की जाएगी.

गोवत्‍स द्वादशी कब है?

द्रिक पंचांग के अनुसार, 5 नवंबर की सुबह 10:35 बजे से 6 नवंबर की सुबह 10:30 बजे तक कार्तिक कृष्‍ण द्वादशी तिथि है. चूंकि इसकी पूजा शाम को प्रदोष काल में करना विशेष अच्‍छा माना जाता है. लिहाजा 5 नवंबर को गोवत्‍स द्वादशी मनाई जाएगी. 
गोवत्‍स द्वादशी पूजा मुहूर्त : शाम 05:33 बजे से रात 08:10 बजे तक.

गोवत्‍स द्वादशी पूजा विधि

धार्मिक मान्यता है कि गाय में सभी देवी-देवताओं का वास होता है. साथ ही गाय की पूजा करने से लक्ष्‍मी जी भी प्रसन्‍न होती हैं. जीवन में सुख-समृद्धि बढ़ती है. गाय-बछड़े की एकसाथ पूजा करना मातृत्‍व का भी सम्‍मान है. सबसे पहले गाय और बछड़े को स्वच्छ जल से नहलाएं. फिर उसका श्रृंगार करें. उसे हल्दी, कुमकुम लगाएं. फूल माला पहनाएं. धूप-दीप जलाकर आरती करें. गाय को गुड़ और हरा चारा खिलाएं. इस दिन संतान के लिए व्रत भी रखा जाता है. साथ ही गाय के खुरों की मिट्टी माथे पर लगाते हैं. मान्‍यता है कि ऐसा करने से सोई किस्‍मत जाग जाती है.

गोवत्‍स द्वादशी की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने एक बार वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और माता पार्वती ने गाय व भगवान कार्तिकेय ने बछड़े का रूप धारण किया. वे तीनों महर्षि भृगु के आश्रम पहुंचे और उनसे कहा कि वे कुछ समय के लिए जा रहे हैं और तब तक गाय तथा बछड़े की देखभाल की जिम्मेदारी वे संभालें.

आश्रम में रह रहे ऋषियों ने गाय और बछड़े की रक्षा करने का वचन दिया. इसके बाद भगवान शिव ने उनकी परीक्षा लेने के लिए बाघ का रूप धारण किया और गाय-बछड़े को डराने लगे. ऋषि-मुनि भयभीत तो हुए, लेकिन उन्होंने दोनों की रक्षा करने का प्रयास जारी रखा.

बाघ से गाय-बछड़े को बचाने के लिए विशेष घंटे की ध्वनि पैदा की. जिससे बाघ दूर हो गया. इसके बाद भगवान शिव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए. साथ ही माता पार्वती और भगवान कार्तिकेय भी अपने असली रूप में आए. इसके बाद ऋषियों ने तीनों देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की. मान्‍यता है कि यह घटना कार्तिक मास की द्वादशी को हुई थी. इसीलिए इस तिथि पर गोवत्‍स द्वादशी मनाई जाती है.

(Disclaimer: यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार व्रत-त्योहारों की तिथि, पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर संभव है. पाठक इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के रूप में देखें.) 

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About the Author

Shraddha Jain

Shraddha Jain

पत्रकारिता में 15 वर्षों का व्यापक अनुभव रखने वाली श्रद्धा जैन वर्तमान में Zee News की नेशनल डिजिटल टीम में बतौर असिस्‍टेंट न्‍यूज एडिटर सक्रिय हैं. जहाँ वे धर्म, ज्योतिष, ग्रह गोचर, अंक शास्‍त्र और वास्तु शास्त्र जैसे विषयों पर अपनी विशेषज्ञता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन और सिम्बॉयसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी से क्रिएटिव राइटिंग की पढ़ाई की है. बतौर फोटो जर्नलिस्ट करियर शुरू करने वाली श्रद्धा ने दूरदर्शन, दैनिक भास्कर और चौथी दुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं.12 वर्षों की फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ बनाने के बाद, उन्होंने डिजिटल मीडिया की ओर रुख किया और देश 24*7 जैसे पोर्टल्स में नेतृत्व की भूमिका निभाई. वर्तमान में धर्म, ज्योतिष, वास्तु और हस्तरेखा जैसे विषयों पर गहन अध्ययन और लेखन करते हुए जटिल विषयों को सरल और रोचक भाषा में पाठकों के सामने पेश कर रही हैं.
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