विजयादशमी पर अनोखी परंपरा: केरल के इस गांव में रावण का दहन नहीं, होती है दुर्योधन की पूजा
केरल के कोल्लम जिले में स्थित मालानाड मंदिर में विजयादशमी और नवरात्रि पर दुर्योधन की पूजा की जाती है. यहां भक्त ताड़ी का चढ़ावा चढ़ाते हैं.
देशभर में दशहरा का त्योहार मनाया जा रहा है. जिसमें रावण दहन किया जाता है. लेकिन आज हम ऐसी ही एक जगह के बारे में बताएंगे जहां बाकी जगहों से हटकर काम किया जाता है.
दरअसल इस दिन रावण को जलाने के बजाए, लोग धूमधाम से दुर्योधन की पूजा करते हैं. जबकि हम जानते हैं कि हिंदू धर्म में दुर्योधन को अहंकार और अधर्म का प्रतीक माना जाता है.
दरअसल ये परंपरा केरल के कोल्लम जिले के मालानाड गांव की है. जहां दुर्योधन के मंदिर में पूजा करने हजारों भक्त पहुंचते हैं.
नवरात्रि में कोई खास पूजा नहीं, फिर भी लगती है भक्तों की भीड़
इस मंदिर कि एक खास बात है, यहां कोई खास बड़ी पूजा नहीं होती है. यहां तक की अगर नवरात्र को भी धूमधाम से नहीं मनाया जाता है.
इसके बाद भी वहां लोग हजारों की संख्या में आते हैं. नवरात्र में भी भक्तों की भारी भीड़ लगी रहती है. लोग अपनी-अपनी समस्या लेकर मंदिर सुनाने आथे हैं.
ताड़ी का चढ़ावा है सबसे फेमस, सोना-चांदी भी चढ़ाते हैं भक्त
यहां सबसे अलग चीज चढ़ाया जाता है. यहां अपने हिसाब से लोग सोना, चांदी, बैल, और मुर्गी चढ़ाते हैं. लेकिन यहां का सबसे फेमस प्रसाद ताड़ी है.
वहां लोग घंटों दुकान के लाइनों में खड़े होकर ताड़ी खरीदते हैं, और ताड़ी खरीदते हैं. फिर दुर्योधन को ताड़ी अर्पीत किया जाता है.
जानिए क्या है पांडवों की तलाश और ताड़ी से जुड़ी पौराणिक कथा?
इस मंदिर के पीछे एक कहानी भी है. वहां के लोगों की मानें तो, अज्ञातवास के समय में जब पांडव छिप के रहते थे. तब दुर्योधन उनको खोजते हुए इस इलाके में पहुंच गया था.
जब वो मालानाड गांव पहुंचा, तब वहां एक कुरवा समुदाय का एक आदमी मिला. जिसने दुर्योधन को अपने घर बुलाकर खूब आदर-सत्कार किया.
फिर उसके बाद उसने दुर्योधन को ताड़ी दी. उस परिवार से दुर्योधन बहुत खुश हुए और इस जगह को अपना आशीर्वाद दिया.
उसी समय से वहां के लोग दुर्योधन की पूजा करने लगे. इसी वजह से वहां के लोग उन्हें ताड़ी भी चढ़ाते हैं.
दलित पूजारी कराते हैं पूजा-पाठ
इस मंदिर में एक और बात खास है. ये समाजिक एकता के लिए भी जाना जाता है.
जैसा कि हम जानते हैं कि हर मंदिर में पंडित पूजा-पाठ करवाते हैं, लेकिन इस मंदिर के पूजारी अनुसूचित जाति से आते हैं.
यहां के परिसर समिति में समाज के अलग-अलग जातियों से लोग शामिल हैं. ऐसा नहीं है कि अब ऐसा होता है.
जब देश में छुआ-छूत बहुत ज्यादा था. तब भी सभी जातियों के लोग इस मंदिर में दर्शन करने जाते थे.
राजा के रूप में पूजे जाते हैं दुर्योधन
यहां के लोग दुर्योधन को बस एक महाभारत का एक पात्र नहीं बल्कि उनको अपना रक्षक और राजा मानते हैं.
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(Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी स्थानीय पौराणिक मान्यताओं, मंदिर परंपराओं और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है.