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अहोई अष्टमी के व्रत को रखकर माताएं मां अहोई से संतान की सुरक्षा और उसकी लंबी आयु के लिए प्रार्थना करती है. धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को रखने से अनहोनी टाल जाती है और संतान के ऊपर आने वाले संकट पहले ही दूर हो जाती है. अहोई अष्टमी पर पूरे दिन का निर्जला व्रत रखने के बाद रात के समय तारों को सच्चे मन से अर्घ्य दिया जाता है और फिर पूजा कर व्रत का पारण किया जाता है. इस साल अहोई अष्टमी व्रत 1 नवंबर को यानी आज रखा जा रहा है. इस दिन व्रत रखकर पूजा के समय अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनने सुनाने से शुभ फल प्राप्त होते हैं. आइए अहोई अष्टमी की व्रत कथा जानें और इस दिन पूजा का मुहूर्त जानें.
अष्टमी तिथि का प्रारंभ: 1 नवंबर 2026, दोपहर 02:51 बजे
अष्टमी तिथि का समापन: 2 नवंबर 2026, दोपहर 01:10 बजे
अहोई अष्टमी पूजा मुहूर्त: शाम 05:36 बजे से लेकर 06:54 बजे तक.
पूजा के लिए 1 घंटा 18 मिनट का समय.
तारों के दर्शन का समय शाम के करीब 05:58 बजे.
चंद्रोदय का समय: रात के लगभग 11:40 बजे.
अहोई अष्टमी की कथा इस तरह है, पुराने समय में एक साहूकार हुआ करता था जिसके सात बेटे और एक बेटी थी. साहूकार की सभी संतानों का विवाह हो चुका था. एक बार की बात है दिवाली से कुछ दिनों पहले साहूकार की बेटी अपने पिता के घर आ गई. जहां वो अपनी भाभियों के साथ घर लीपने के लिए जंगल से मिट्टी लाने चली गई.बेटी जब मिट्टी निकाल रही थी तो उसकी खुरपी वहीं रह रहे स्याहु (साही) के सात बच्चों में से एक को लग गई जिससे उसकी मृत्यु हो गई. बच्चे की मृत्यु पर तिलमिलाई स्याहू ने कहा तुमने मेरे बच्चे को मार डाला है अब मैं तुम्हारी कोख बांध दूंगी. फिर क्या था साहूकार की बेटी डर गई और रोने लगी. वो अपनी भाभियों से एक-एक कर कहने लगी कि वो उसके बदले में अपनी कोख बंधवा लें.
ननंद के बहुत कहने पर उसकी छोटी भाभी इसके लिए तैयार हो गई. इस घटना के बाद छोटी भाभी की जब भी संतान होती तो साही के श्राप के प्रभाव से 7 दिन में ही उसकी मृत्यु हो जाती थी. इस तरह उसके सात संतानों की मृत्यु हो गई. अंत में वह पंडित जी से सलाह लेने गई कि वो आखिर इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए क्या उपाय करें. जिस पर पंडित जी ने उसे बताया कि तुम सुरभी गाय की सेवा करो तो उससे तुन्हें पुण्य फल की प्राप्ति होगी. भाभी ने ऐसा ही किया और दिन-रात सुरभी गाय की सेवा की. उसकी सेवा से गाय प्रसन्न हुई और उसे साही के पास ले गई जहां पर भाभी ने साही की भी खूब सेवा की. जिससे प्रसन्न होकर साही ने आशीर्वाद दिया कि उसे सात पुत्र और सात बहुओं का आशीर्वाद मिलेगा. समय बीता और छोटी भाभी को संतान सुख प्राप्त हुआ. ऐसी धार्मिक मान्यता है कि जो मां कार्तिक कृष्ण अष्टमी तिथि पर स्याहु (साही) का चित्र बनाकर उसकी पूजा करती है उसकी संतान के ऊपर से भारी से भारी संकट दूर हो जाता है. इस व्रत को अहोई आठे भी कहा जाता है. मान्यताओं के अनुसार देवी पार्वती का ही अहोई माता स्वरूप हैं जिनकी पूजा करने से संतान को सुरक्षा प्राप्त होती है.
(Disclaimer: यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और पंचांग पर आधारित है. किसी भी व्रत-पूजा से पहले स्थानीय पंडित या पंचांग से शुभ मुहूर्त की पुष्टि अवश्य करें.)