उदयपुर रिश्वतकांड : ASP मुकेश सोनी का आईफोन नहीं खोल पा रही ACB, क्या आईफोन का लॉक तोड़ना नामुमकिन है ?
Udaipur Bribery Case : उदयपुर में 2 करोड़ रुपये के रिश्वतकांड में घिरे SOG के एएसपी मुकेश सोनी से जुड़े मामले में रोजाना नए खुलासे हो रहे हैं. एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) के सामने सबसे बड़ी मुश्किल आरोपी का iPhone है. गिरफ्तारी के बाद से बीते कई दिनों से जांच अधिकारी आरोपी का आईफोन अनलॉक करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मुकेश सोनी पासवर्ड बताने से साफ इनकार कर रहे हैं. इस हाई-प्रोफाइल मामले के बीच सबसे बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि अगर कोई आरोपी अपने फोन का पासवर्ड न बताए, तो क्या पुलिस के लिए आईफोन को अनलॉक करना संभव है ? एंड्रॉइड फोन की तुलना में आईफोन को तोड़ना कितना कठिन होता है और इसमें कितना वक्त लग सकता है ?
एंड्रॉइड के मुकाबले आईफोन को अनलॉक करना कितना मुश्किल है ?
विशेषज्ञों के मुताबिक, एंड्रॉइड ऑपरेटिंग सिस्टम की कोडिंग और फाइल स्ट्रक्चर ओपन-सोर्स होने के चलते कई बार थर्ड-पार्टी सॉफ्टवेयर या टूल के जरिए उसका डेटा एक्सेस करना या बाईपास करना तुलनात्मक रूप से आसान होता है. इसके विपरीत, एप्पल के आईफोन में 'सिक्योर एनक्लेव' (Secure Enclave) और मजबूत हार्डवेयर-लेवल एन्क्रिप्शन होता है. आईफोन का सुरक्षा चक्र इतना कड़ा होता है कि बिना सही पासकोड के इसके डेटा तक पहुंचना दुनिया भर की जांच एजेंसियों के लिए भी लोहे के चने चबाने जैसा साबित होता है. क्या आईफोन को अनलॉक किया जा सकता है और कितना वक्त लगता है?बिना पासवर्ड के सीधे तोड़ना बहुत मुश्किल होता है. एप्पल के आईफोन का लॉक सीधे तौर पर तोड़ना लगभग नामुमकिन माना जाता है. अगर कोई व्यक्ति पासवर्ड नहीं बता रहा, तो पुलिस या जांच एजेंसियां सीधे फोन के होम स्क्रीन तक नहीं पहुंच सकतीं.
फोरेंसिक टूल्स और एक्सप्लॉइट्स
आईफोन से डेटा निकालने या उसे अनलॉक करने के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों को Cellebrite (सेलिब्राइट) या GrayKey (ग्रैकी) जैसे बेहद महंगे और विशेष डिजिटल फोरेंसिक टूल्स का सहारा लेना पड़ता है.
लंबा वक्त और अनिश्चितता
इस प्रक्रिया में हफ़्तों, महीनों या कभी-कभी तकनीकी खामियों का इंतजार करना पड़ता है. कई मामलों में तो महीनों की कोशिश के बाद भी सफलता की कोई गारंटी नहीं होती, यही वजह है कि एसीबी जैसी एजेंसियों को आरोपी के सहयोग पर निर्भर रहना पड़ता है.
पूरे मामले में अब तक क्या-क्या खुलासे हुए ?
एसीबी सूत्रों के मुताबिक, आरोपी एएसपी मुकेश सोनी को विभाग की कार्यप्रणाली और एसीबी के तौर-तरीकों की पूरी जानकारी थी. वो चौकी के लगभग हर कर्मचारी को पहचानता था और परिवादी पर लगातार नजर रखे हुए था. इसी वजह से एसीबी ने अपनी रणनीति बदली और एक प्रशासनिक अधिकारी को इस प्लान में शामिल कर शिकायत का वेरिफिकेशन करवाया.
रिकॉर्डिंग के आगे चुप हुआ आरोपी
पूछताछ के दौरान जब एएसपी ने घूस मांगने से इनकार किया, तो एसीबी ने उसे पुख्ता ऑडियो रिकॉर्डिंग सुनाई, जिसके बाद वो चुप हो गया. वहीं, दलाल सज्जन सिंह ने कबूल किया कि उसने एएसपी के कहने पर ही परिवादी से संपर्क किया था.
इन सवालों के भी नहीं मिले जवाब
एसीबी ये पता लगाने की कोशिश कर रही है कि परिवादी के घर से डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर (DVR) क्यों जब्त किया गया था और 3 खाली कागजों पर हस्ताक्षर क्यों कराए गए थे, लेकिन एएसपी ने इन सवालों के भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिए. मामले की गंभीरता को देखते हुए एसीबी कोर्ट ने आरोपी एएसपी मुकेश सोनी और दलाल सज्जन सिंह की पुलिस रिमांड 3 अक्टूबर तक बढ़ा दी है, ताकि अन्य राजफाश किए जा सकें.
क्या है पूरा प्लॉट घोटाला ?
साल 2012 में यूआईटी (UIT) द्वारा निगम को ट्रांसफर की गई कॉलोनियों के खाली प्लॉटों के फर्जी दस्तावेज और लीज डीड तैयार कर उन्हें महंगे दामों पर बेचने का मामला सामने आया था. इसी 272 प्लॉट घोटाले की FIR सूरजपोल थाने में दर्ज की गई थी. एसओजी ने 4 अगस्त को पूर्व जिला अल्पसंख्यक अधिकारी हेमलता कांकरिया और उनके पति निरंजन मोगरा को गिरफ्तार किया था, जिनके घर से 2 किलो सोने के जेवर और 11 लाख रुपये जब्त किए गए थे. इसी केस में एफआर (FR) लगाने और जब्त सामान छोड़ने के एवज में रिश्वत की यह पूरी डील हो रही थी.