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क्या आप जानते हैं? चुनाव से पहले प्रत्याशी की मौत हो जाए तो क्या होता है, जानें पूरा नियम

Rajasthan News: राजस्थान के किशनगढ़ नगर परिषद वार्ड-36 से निर्दलीय प्रत्याशी रिखब रील की मौत के बाद सवाल उठ रहा है कि चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार की मौत होने पर क्या चुनाव रुक जाता है? जानें निर्दलीय और पार्टी प्रत्याशी के लिए क्या हैं नियम.

क्या आप जानते हैं? चुनाव से पहले प्रत्याशी की मौत हो जाए तो क्या होता है, जानें पूरा नियम
Image Credit: Rajasthan Nikay Chunav

Rajasthan Nikay Chunav: अजमेर जिले की किशनगढ़ नगर परिषद के वार्ड नंबर 36 से निर्दलीय प्रत्याशी रिखब रील का निधन हो गया. जानकारी के मुताबिक रिखब सोमवार को सरवाड़ में अपनी बहन के घर गए थे. वहीं अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई और उनकी मौत हो गई. शुरुआती जानकारी में मौत की वजह हार्ट अटैक बताई जा रही है. इस घटना के बाद एक सवाल भी उठ रहा है कि अगर चुनाव लड़ रहे किसी प्रत्याशी की नामांकन के बाद मौत हो जाए तो उस सीट पर चुनाव का क्या होता है? क्या चुनाव रुक जाता है, क्या फिर से नामांकन होते हैं या फिर तय तारीख पर ही वोटिंग होती है? आइए आसान भाषा में समझते हैं पूरा नियम.

क्या उम्मीदवार की मौत से चुनाव रुक जाता है?
इसका सीधा जवाब है- हर मामले में चुनाव नहीं रुकता. उम्मीदवार की मौत के बाद चुनाव पर क्या असर पड़ेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह उम्मीदवार किस तरह चुनाव लड़ रहा था और उसकी मौत चुनाव के किस चरण में हुई.

लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इस बारे में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 52 में नियम दिए गए हैं. 1996 में कानून में बदलाव के बाद किसी भी उम्मीदवार की मौत होने पर अपने आप पूरा चुनाव रद्द करने की व्यवस्था खत्म कर दी गई. अब खास परिस्थितियों में ही मतदान स्थगित किया जाता है.

निर्दलीय उम्मीदवार की मौत हो जाए तो क्या होगा?
किशनगढ़ के वार्ड 36 में रिखब रील निर्दलीय उम्मीदवार थे. ऐसे मामलों में सबसे अहम बात यह है कि सिर्फ निर्दलीय उम्मीदवार की मौत होने से लोकसभा या विधानसभा का चुनाव अपने आप स्थगित नहीं होता.

1996 से पहले ऐसा नहीं था. उस समय अगर मतदान से पहले किसी भी उम्मीदवार की मौत हो जाती थी तो चुनाव रद्द किया जा सकता था. बाद में इस नियम का गलत इस्तेमाल होने की आशंका सामने आई. इसी वजह से कानून में बदलाव किया गया.

अब मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के उम्मीदवार और निर्दलीय या गैर-मान्यता प्राप्त दल के उम्मीदवार के मामले में अलग-अलग व्यवस्था है.

1996 में नियम क्यों बदला गया?
1996 से पहले अगर किसी भी उम्मीदवार की मतदान से पहले मौत हो जाती थी तो संबंधित सीट का चुनाव रद्द कर दोबारा चुनाव कराया जा सकता था. समस्या यह थी कि इस नियम का गलत फायदा उठाए जाने का डर था.

कल्पना कीजिए कि किसी उम्मीदवार को हार का डर है और वह चुनाव टालना चाहता है. ऐसे में किसी कमजोर या डमी उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारकर उसके जरिए चुनाव रुकवाने की कोशिश की जा सकती थी. इसी तरह की आशंकाओं को देखते हुए कानून में बदलाव किया गया.

1996 के संशोधन के बाद अब हर उम्मीदवार की मौत को चुनाव रोकने का आधार नहीं माना जाता.

मान्यता प्राप्त पार्टी के उम्मीदवार की मौत हो तो?
यह मामला थोड़ा अलग है. लोकसभा और विधानसभा चुनाव में अगर किसी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या संबंधित राज्य में मान्यता प्राप्त राज्य पार्टी के उम्मीदवार की मौत हो जाती है, तो कुछ तय परिस्थितियों में मतदान स्थगित किया जा सकता है.

मसलन, अगर उम्मीदवार का नामांकन वैध पाया जा चुका है और मतदान से पहले उसकी मौत की सूचना चुनाव अधिकारियों को मिलती है, तो रिटर्निंग ऑफिसर स्थिति की पुष्टि करने के बाद मतदान स्थगित करने का आदेश दे सकता है. चुनाव आयोग बाद में नई तारीख तय करता है.

यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि चुनाव पूरी तरह रद्द नहीं माना जाता. मुख्य रूप से मतदान को आगे बढ़ाया जाता है और आगे की प्रक्रिया नए कार्यक्रम के हिसाब से चलती है.

क्या पार्टी को नया उम्मीदवार उतारने का मौका मिलता है?
हां. मान्यता प्राप्त पार्टी के उम्मीदवार की मौत के बाद चुनाव आयोग संबंधित पार्टी को नया उम्मीदवार उतारने का मौका देता है.

निर्वाचन आयोग की गाइडलाइन के मुताबिक आयोग पार्टी को नया उम्मीदवार नामित करने के लिए नोटिस देता है और पार्टी को नोटिस जारी होने के सात दिन के भीतर नया नाम देना होता है. नए उम्मीदवार को भी नामांकन, जांच और बाकी जरूरी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है.

यानी सिर्फ पार्टी के कह देने से नया उम्मीदवार सीधे मैदान में नहीं आ जाता. उसके लिए भी चुनावी प्रक्रिया पूरी करनी होती है.

क्या बाकी उम्मीदवारों को दोबारा नामांकन भरना पड़ता है?
नहीं, सामान्य तौर पर बाकी वैध उम्मीदवारों का पुराना नामांकन बना रहता है. दोबारा नामांकन की प्रक्रिया उस पार्टी के नए उम्मीदवार के लिए होती है, जिसके उम्मीदवार का निधन हुआ है.

अगर जरूरत पड़ती है तो रिटर्निंग ऑफिसर नए उम्मीदवार का नाम जोड़कर नई सूची जारी करता है और इसके बाद चुनाव की बाकी प्रक्रिया संशोधित कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ती है.

नामांकन के बाद लेकिन जांच से पहले मौत हो जाए तो?
यह भी बेहद अहम स्थिति है. सिर्फ नामांकन भर देने से कोई व्यक्ति अंतिम रूप से चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार नहीं बन जाता. पहले नामांकन पत्रों की जांच होती है.

अगर नामांकन दाखिल करने के बाद लेकिन जांच के समय से पहले उम्मीदवार की मौत हो जाती है, तो मामला अलग तरीके से देखा जाता है. खासकर धारा 52 के तहत मतदान स्थगित करने के लिए उम्मीदवार का नामांकन वैध पाया जाना और कानून में बताई गई दूसरी शर्तों का पूरा होना जरूरी है.

इसलिए सिर्फ यह कहना कि 'नामांकन भर दिया था, इसलिए चुनाव रुक जाएगा' सही नहीं है.

मतदान से ठीक पहले मौत हो जाए तो?
अगर मान्यता प्राप्त पार्टी का वैध उम्मीदवार चुनाव मैदान में है और मतदान शुरू होने से पहले उसकी मौत हो जाती है तथा इसकी जानकारी निर्वाचन अधिकारी को मिलती है, तो निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत मतदान स्थगित किया जा सकता है.

रिटर्निंग ऑफिसर मौत की पुष्टि के बाद रिपोर्ट आगे भेजता है और चुनाव आयोग नई मतदान तारीख तय करता है. इसके बाद संबंधित पार्टी को नया उम्मीदवार देने का मौका मिलता है.

मतदान हो चुका हो तो क्या होगा?
अगर मतदान पूरा हो चुका है और उसके बाद मतगणना से पहले किसी उम्मीदवार की मौत हो जाती है, तो स्थिति अलग होती है. ऐसे मामले में सिर्फ मौत की वजह से पहले हो चुका मतदान सामान्य तौर पर फिर से नहीं कराया जाता.

अगर मृत उम्मीदवार चुनाव नहीं जीतता है तो बाकी प्रक्रिया के आधार पर विजेता घोषित किया जा सकता है. लेकिन अगर मृत उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिल जाते हैं, तो सीट खाली मानी जा सकती है और वहां बाद में उपचुनाव की जरूरत पड़ सकती है.

क्या EVM में मृत उम्मीदवार का नाम रह सकता है?
हां, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उम्मीदवार की मौत किस समय हुई और उस समय चुनाव प्रक्रिया किस चरण में पहुंच चुकी थी.

अगर EVM या मतपत्र की तैयारी हो चुकी है और कोई उम्मीदवार बाद में चुनाव से बाहर होता है, तो हर स्थिति में मशीन या मतपत्र को नए सिरे से तैयार करना जरूरी नहीं होता. हालांकि मान्यता प्राप्त पार्टी के उम्मीदवार की मौत जैसी स्थिति में चुनाव आयोग के निर्देश के मुताबिक आगे की प्रक्रिया और नई सूची तय की जाती है.

किशनगढ़ के रिखब रील के मामले में क्या होगा?
किशनगढ़ नगर परिषद के वार्ड 36 में रिखब रील निर्दलीय प्रत्याशी थे. इसलिए उनके निधन के बाद इस सीट पर क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी, इसका अंतिम फैसला संबंधित स्थानीय निकाय चुनाव के नियमों और राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देशों के आधार पर होगा.

यह मामला लोकसभा या विधानसभा चुनावों से सीधे जोड़कर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि नगर परिषद चुनाव अलग चुनावी व्यवस्था के तहत होते हैं. इसलिए किशनगढ़ में रिखब रील की मौत के बाद वार्ड 36 का चुनाव जारी रहेगा या उसमें कोई बदलाव होगा, यह संबंधित निर्वाचन अधिकारी और राज्य निर्वाचन आयोग के आधिकारिक निर्णय से ही साफ होगा.

आखिर इतना अलग क्यों है चुनाव का नियम?
पूरी व्यवस्था का मकसद यही है कि किसी उम्मीदवार की मौत जैसी असाधारण घटना के बाद भी चुनाव प्रक्रिया बिना वजह प्रभावित न हो. 1996 के बदलाव के बाद खास तौर पर यह तय किया गया कि हर उम्मीदवार की मौत पर पूरा चुनाव नहीं रोका जाएगा.

मान्यता प्राप्त दल के उम्मीदवार के मामले में कुछ परिस्थितियों में मतदान स्थगित करने की व्यवस्था इसलिए रखी गई है ताकि उस पार्टी के उम्मीदवार को बदलने का मौका मिल सके. वहीं निर्दलीय या गैर-मान्यता प्राप्त दल के उम्मीदवार की मौत पर चुनाव रोकने की व्यवस्था नहीं है.

यानी चुनाव में किसी प्रत्याशी की मौत एक गंभीर घटना जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर बार चुनाव रद्द या स्थगित हो जाएगा. असली फैसला उम्मीदवार की स्थिति, मौत के समय और चुनाव किस चरण में पहुंचा था, इन बातों पर निर्भर करता है.

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About the Author

SAGAR CHAUDHARY

SAGAR CHAUDHARY

सागर चौधरी, अप्रैल 2024 से वे ज़ी न्यूज़ संस्थान का हिस्सा हैं और अपनी मेहनत व काम करने की क्षमता से लगातार टीम में योगदान दे रहे हैं.सागर चौधरी का संबंध हरियाणा के फरीदाबाद से है, जहां उन्होंने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद उन्होंने महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री हासिल की और मीडिया क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की.
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