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सड़कों से गायब हो जाएंगे हजारों ट्रक, राजस्थान में कैसे काम करेगा 'ट्रकों की ट्रेन यात्रा' का मॉडल?

Rajasthan News: वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर रो-रो सर्विस से ट्रांसपोर्टर्स का डीजल, टोल और मेंटेनेंस खर्च घटेगा. राजस्थान के उत्पाद तेजी से बंदरगाहों तक पहुंचेंगे. इससे कारोबार, रोजगार और एक्सपोर्ट बढ़ने के साथ ट्रैफिक व प्रदूषण भी कम हो सकता है.

Written By SAGAR CHAUDHARY
Published: Sep 10, 2026, 10:33 PM IST | Updated: Sep 10, 2026, 10:37 PM IST
Image Credit: Western Dedicated Freight Corridor
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Western Dedicated Freight Corridor: राजस्थान से गुजर रहे वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर शुरू होने वाली रो-रो (Roll-on/Roll-off) सर्विस ट्रांसपोर्ट सेक्टर के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकती है. इस सुविधा में सामान से लदे ट्रकों को सड़क पर चलाने के बजाय सीधे मालगाड़ी के वैगन पर चढ़ाकर एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाएगा. इससे डीजल, टोल और ट्रक की टूट-फूट का खर्च कम होगा. करीब 567 किलोमीटर लंबे फ्रेट कॉरिडोर से राजस्थान को बंदरगाहों तक तेज माल ढुलाई, कम लागत, कम प्रदूषण और रोजगार के नए मौके मिलने की उम्मीद है.

क्या है वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर?
वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर यानी WDFC एक ऐसा रेल नेटवर्क है, जिसे खास तौर पर मालगाड़ियों के लिए तैयार किया गया है. राजस्थान में इसका करीब 567 किलोमीटर हिस्सा गुजरता है. यह राज्य को गुजरात और महाराष्ट्र के बड़े बंदरगाहों से जोड़ता है. इनमें JNPT, मुंद्रा और कांडला जैसे प्रमुख पोर्ट शामिल हैं.

इसका मतलब साफ है कि राजस्थान से तैयार होने वाला सामान सड़क के लंबे सफर के बजाय तेज मालगाड़ियों के जरिए बंदरगाहों तक पहुंच सकेगा. इससे राज्य के कारोबारियों के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भरता कम होगी.

1.5 किलोमीटर लंबी ट्रेन क्यों है खास?
इस कॉरिडोर पर करीब 1.5 किलोमीटर तक लंबी मालगाड़ियां चल सकती हैं. इन ट्रेनों में डबल-स्टैक यानी दो मंजिला कंटेनर भी ले जाए जा सकते हैं. इनकी रफ्तार करीब 100 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो सकती है.

इतनी क्षमता वाली ट्रेन एक साथ बड़ी मात्रा में माल लेकर जा सकती है. इससे सड़क पर अलग-अलग ट्रकों से माल भेजने की जरूरत कम होगी. यही वजह है कि फ्रेट कॉरिडोर को राजस्थान के लॉजिस्टिक्स सिस्टम के लिए बड़ा बदलाव माना जा रहा है.

सड़क से 3-4 दिन लगते हैं, ट्रेन से समय कितना बचेगा?
अभी सड़क के रास्ते राजस्थान से बंदरगाह तक माल पहुंचाने में कई बार 3 से 4 दिन लग जाते हैं. रास्ते में ट्रैफिक, टोल, ड्राइवरों के आराम और दूसरे कारणों से समय और बढ़ सकता है. फ्रेट कॉरिडोर से यही काम काफी कम समय में किया जा सकेगा. उपलब्ध नेटवर्क के जरिए राजस्थान के उत्पाद 24 घंटे से भी कम समय में निर्यात के लिए बंदरगाह तक पहुंचाने की क्षमता हासिल कर सकते हैं. इससे कारोबारियों के लिए सबसे बड़ा फायदा समय की बचत का होगा.

रो-रो सर्विस क्या होती है?
रो-रो का मतलब है Roll-on/Roll-off. आसान भाषा में समझें तो इसमें सामान से लदा ट्रक खुद सड़क पर लंबा सफर नहीं करेगा. ट्रक को सीधे मालगाड़ी के खास वैगन पर चढ़ा दिया जाएगा और ट्रेन उसे आगे लेकर जाएगी. गंतव्य के पास पहुंचने के बाद ट्रक को ट्रेन से उतारकर फिर सड़क के जरिए अंतिम जगह तक भेजा जा सकता है. यानी ट्रक का पूरा सफर सड़क पर करने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

ट्रांसपोर्टर्स का डीजल और टोल बचेगा?
यही रो-रो सर्विस का सबसे बड़ा फायदा है. अगर ट्रक को कई सौ किलोमीटर सड़क पर नहीं चलना पड़ेगा तो डीजल की खपत कम होगी. इसके साथ ही लंबे रूट का टोल खर्च भी घटेगा. ट्रक के टायर, इंजन और दूसरे हिस्सों की टूट-फूट भी कम होगी. ड्राइवरों को लगातार कई दिनों तक लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ेगी. इससे ट्रांसपोर्ट कंपनी का कुल ऑपरेशनल खर्च घट सकता है.

राजस्थान के कारोबारियों को क्या फायदा होगा?
फ्रेट कॉरिडोर राजस्थान के कारोबारियों को सीधे बड़े बंदरगाहों से जोड़ने में अहम भूमिका निभा सकता है. जयपुर का जेम्स-ज्वेलरी कारोबार, पाली का टेक्सटाइल और अजमेर का सिरेमिक जैसे उद्योग अपने उत्पाद तेजी से बंदरगाह तक भेज सकेंगे.

लॉजिस्टिक्स लागत में करीब 30 फीसदी तक कमी आने का अनुमान है. अगर माल को कम खर्च में और कम समय में विदेशी बाजार तक पहुंचाया जा सके तो राजस्थान के छोटे कारोबारियों और MSMEs को भी बड़ी कंपनियों से मुकाबला करने में मदद मिलेगी.

क्या राजस्थान ‘वर्चुअल पोर्ट स्टेट’ बन सकता है?
फ्रेट कॉरिडोर राजस्थान को सीधे समुद्री बंदरगाहों से जोड़ रहा है. राजस्थान का अपना समुद्री तट नहीं है, लेकिन तेज रेल कनेक्टिविटी के कारण राज्य के कारोबारी गुजरात और महाराष्ट्र के पोर्ट का आसानी से इस्तेमाल कर सकेंगे. यही वजह है कि इसे राजस्थान के लिए ‘वर्चुअल पोर्ट स्टेट’ जैसी स्थिति बनाने वाला कनेक्शन माना जा रहा है. यानी राज्य समुद्र से दूर होने के बावजूद निर्यात के लिहाज से बड़े पोर्ट के करीब आ जाएगा.

कौन-कौन से स्टेशन बड़े हब बनेंगे?
न्यू रेवाड़ी, न्यू फुलेरा और न्यू मारवाड़ जंक्शन जैसे स्टेशन माल ढुलाई के अहम हब के तौर पर काम कर सकते हैं. इन जगहों के आसपास वेयरहाउस, लॉजिस्टिक्स और दूसरी कारोबारी गतिविधियां बढ़ने की संभावना है. जहां माल आसानी से आएगा और जल्दी आगे भेजा जा सकेगा, वहां कंपनियों के लिए नया कारोबार शुरू करना भी ज्यादा आसान होगा.

क्या इससे राजस्थान में रोजगार बढ़ेगा?
फ्रेट कॉरिडोर का फायदा सिर्फ माल ढुलाई तक सीमित नहीं रहेगा. इसके आसपास इंडस्ट्रियल और लॉजिस्टिक्स गतिविधियां बढ़ने पर नए प्लांट, वेयरहाउस और सप्लाई चेन सेंटर विकसित हो सकते हैं. कॉरिडोर के करीब DMIC के तहत खुशखेड़ा-भिवाड़ी-नीमराणा और जोधपुर-पाली-मारवाड़ जैसे औद्योगिक क्षेत्र विकसित किए जा रहे हैं. कच्चा माल कम लागत में आने और तैयार माल तेजी से बाहर जाने से कंपनियों के लिए राजस्थान में उत्पादन केंद्र लगाना ज्यादा आकर्षक हो सकता है.

क्या युवाओं का पलायन कम होगा?
अगर इन औद्योगिक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश आता है तो ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल, मैन्युफैक्चरिंग, वेयरहाउसिंग और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टर में रोजगार बढ़ सकते हैं. इसका सीधा फायदा राजस्थान के युवाओं को मिल सकता है. अभी रोजगार के लिए दूसरे राज्यों का रुख करने वाले युवाओं को अगर अपने राज्य में ही काम मिलने लगे तो स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ने के साथ पलायन भी कम हो सकता है.

सड़कों और ट्रैफिक को कैसे राहत मिलेगी?
रो-रो सर्विस का एक बड़ा फायदा राजस्थान की सड़कों पर दिखाई दे सकता है. अगर लंबी दूरी के कुछ ट्रक मालगाड़ी से जाने लगते हैं तो नेशनल हाईवे पर भारी वाहनों की संख्या कम होगी. इससे ट्रैफिक का दबाव घट सकता है. सड़क पर जाम की समस्या कम होने के साथ ट्रकों की वजह से होने वाली टूट-फूट और दुर्घटनाओं का जोखिम भी कम हो सकता है.

पर्यावरण को क्या फायदा होगा?
डीजल से चलने वाले भारी ट्रकों की सड़क पर आवाजाही घटने का सीधा असर प्रदूषण पर पड़ सकता है. कम डीजल खपत का मतलब कार्बन उत्सर्जन में कमी भी है. यानी रो-रो सर्विस से एक तरफ ट्रांसपोर्टर का खर्च कम हो सकता है, वहीं दूसरी तरफ सड़क पर ट्रकों का दबाव और प्रदूषण भी घट सकता है.

सबसे बड़ा फायदा किसे मिलेगा?
इसका फायदा ट्रांसपोर्टर्स, एक्सपोर्टर्स, इंडस्ट्री, ड्राइवरों और आम लोगों तक पहुंच सकता है. कारोबारियों के लिए समय और लागत कम होना अहम है, ट्रांसपोर्टर्स के लिए डीजल-टोल और मेंटेनेंस खर्च में बचत महत्वपूर्ण है, जबकि आम लोगों को कम भारी ट्रैफिक और बेहतर सड़क व्यवस्था का फायदा मिल सकता है.

वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और रो-रो सर्विस राजस्थान में माल ढुलाई के तरीके को बदल सकती है. तेज ट्रेन, कम लॉजिस्टिक्स लागत, बंदरगाहों तक आसान पहुंच और औद्योगिक क्षेत्रों के विकास से राजस्थान के कारोबार को नई रफ्तार मिल सकती है. साथ ही रोजगार, सड़क यातायात और प्रदूषण के मोर्चे पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है.

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About the Author

सागर चौधरी, अप्रैल 2024 से वे ज़ी न्यूज़ संस्थान का हिस्सा हैं और अपनी मेहनत व काम करने की क्षमता से लगातार टीम में योगदान दे रहे हैं.सागर चौधरी का संबंध हरियाणा के फरीदाबाद से है, जहां उन्होंने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद उन्होंने महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री हासिल की और मीडिया क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की.
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