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Jaipur News: राजस्थान कांग्रेस में पूर्व कैबिनेट मंत्री विश्वेंद्र सिंह को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है. भरतपुर में दशकों तक कांग्रेस की राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे विश्वेंद्र सिंह के लिए पार्टी में आगे की राह मुश्किल होती नजर आ रही है. इसी बीच उनके धुर विरोधी माने जाने वाले नेमसिंह फौजदार को कांग्रेस में दोबारा शामिल किए जाने से भरतपुर की सियासत में नए समीकरणों की चर्चा शुरू हो गई है.
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वार रूम में पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने नेमसिंह फौजदार को पार्टी की सदस्यता दिलाई. इस दौरान मालपुरा से विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के बागी प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे गोपाल गुर्जर भी कांग्रेस में शामिल हुए.
अनुशासन कमेटी के नोटिस के बीच बड़ा सियासी घटनाक्रम
विश्वेंद्र सिंह को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में कांग्रेस की अनुशासन समिति ने नोटिस जारी कर सात दिन में जवाब मांगा था. गुरुवार को जवाब देने की अंतिम अवधि पूरी होने की बात सामने आई. हालांकि, विश्वेंद्र सिंह की ओर से जवाब दिए जाने की स्थिति आधिकारिक तौर पर स्पष्ट नहीं है.
इसी बीच नेमसिंह फौजदार की कांग्रेस में वापसी को भरतपुर की राजनीति के लिहाज से अहम घटनाक्रम माना जा रहा है. दोनों नेताओं के बीच लंबे समय से राजनीतिक विरोध रहा है. ऐसे में फौजदार को पार्टी में दोबारा शामिल करना संगठन की भावी रणनीति को लेकर सवाल खड़े करता है.
रंधावा के जयपुर दौरे के बाद बदले सियासी संकेत
इस घटनाक्रम से एक दिन पहले कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा जयपुर पहुंचे थे. भरतपुर के राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर उनके साथ चर्चा होने की जानकारी सामने आई. इसके अगले 24 घंटे के भीतर नेमसिंह फौजदार को पार्टी में शामिल कराए जाने से इस कदम के राजनीतिक मायनों पर चर्चा तेज हो गई है.
भरतपुर में नेतृत्व को लेकर नई चर्चा
नेमसिंह फौजदार की कांग्रेस में वापसी को भरतपुर में संगठनात्मक समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है. इसे विश्वेंद्र सिंह के लिए पार्टी में राजनीतिक संभावनाएं सीमित होने के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है. हालांकि, कांग्रेस नेतृत्व की ओर से विश्वेंद्र सिंह की सदस्यता या भविष्य की भूमिका को लेकर कोई औपचारिक फैसला सामने आए बिना उनके लिए पार्टी के दरवाजे पूरी तरह बंद होने का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी.
फिलहाल, एक तरफ विश्वेंद्र सिंह के कांग्रेस नेतृत्व पर लगातार सवाल उठाने और दूसरी तरफ उनके राजनीतिक विरोधी की पार्टी में वापसी ने भरतपुर कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को फिर चर्चा में ला दिया है.