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6 लाख की साड़ी और 3 महीने की मेहनत, देखिए कैसे दीपावली पर चमक उठी है कैथून के बुनकरों की दुनिया

दीपावली आते ही कोटा के कैथून में हथकरघों का शोर भी बढ़ गया है. सिर्फ देश ही नहीं विदेश से भी साड़ियों की भारी डिमांड ऑर्डर आ रहे हैं. कारीगर खुश हैं, कि इस दीपावली कमाई अच्छी होगी.

6 लाख की साड़ी और 3 महीने की मेहनत, देखिए कैसे दीपावली पर चमक उठी है कैथून के बुनकरों की दुनिया
Image Credit: kota doria saree

कैथून की गलियों में गूंजता हथकरघा
कोटा से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर बना है कैथून कस्बा, यहां करीब 6 हजार घरों में हजारों बुनकर दिन-रात अपनी उंगलियों के जादू से साड़ियां तैयार करने में जुटे हुए हैं. जैसे-जैसे दीपावली पास आ रही है, वैसे-वैसे साड़ियों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है. भारी डिमांड ने न सिर्फ बुनकरों का काम बढ़ाया है, बल्कि उनकी आमदनी भी बढ़ने वाली है. यहां तैयार होने वाली इन खूबसूरत साड़ियों की कीमत 10 हजार रुपये से लेकर 6 लाख रुपये तक की रेंज में बाजार में मौजूद है.

कोटा डोरिया साड़ी हथकरघा

15 दिन से लेकर 3 महीने तक - सिर्फ एक साड़ी
कोटा डोरिया साड़ी को बनाना आसान काम नहीं है. बुनकर बड़ी ही बारीकी से हथकरघे पर रेशम और कपास के धागों को पिरोते हैं. यहां एक साधारण साड़ी को तैयार करने में 15 से 20 दिन का वक्त लगता है . डिजाइनर साड़ी 20 से 25 दिन में पूरी होती है तो वहीं अगर साड़ी पर शाही जरी वर्क है यानी सोने चांदी के तार का इस्तेमाल हुआ है तो इसे बनाने में 3 महीने तक का वक्त लग सकता है और इससे कम से कम 3 से 4 बुनकर मिलकर तैयार करते हैं. कोटा डोरिया की खासियत है इसकी हल्की बनावट, जालीदार बुनाई और बेमिसाल नजाकत जो पहनने वाले को भी शाही अहसास कराती है.

KOTA DORIYA SAREE RATE
सौ साल पुराना इतिहास और GI टैग 
कोटा डोरिया का इतिहास 100 साल से भी ज्यादा पुराना है. रियासतकाल में कोटा राजपरिवार के संरक्षण ने इस कला को एक नई पहचान दी थी. इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि मैसूर से आए कुछ बुनकर परिवारों ने कैथून में इस बुनाई की नींव रखी थी, इस पारंपरिक कला की शुद्धता को बनाए रखने के लिए कोटा डोरिया को जीआई टैग भी मिला हुआ है, जो इसके नाम और अनूठेपन की सुरक्षा सुनिश्चित करता है.

कोटा डोरिया साड़ी
देश से लेकर विदेशों तक डंका
राजस्थान के कोटा संभाग में करीब 9,000 हथकरघे हैं, जिनमें अकेले कैथून में 6,000 और आसपास के 12 गांवों में लगभग 3,000 हथकरघे चल रहे हैं. यहां हर दिन लगभग 400 से 500 साड़ियां बनकर तैयार होती हैं. कोटा डोरिया का सालाना कारोबार करीब 70 से 80 करोड़ रुपये का है और दीपावली पर आई इस बंपर डिमांड से बुनकरों को पूरी उम्मीद दी है कि इस बार का सीजन फायदे का सौदा होगा. विदेशों में बैठे लोग भी अपने भारतीय रिश्तेदारों के जरिए कैथून की इन साड़ियों को मंगवा रहे हैं.
 

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About the Author

Pragati Pant Awasthi

Pragati Pant Awasthi

मीडिया की दुनिया में 18 साल का सफर... एंकरिंग से लेकर डिजिटल की स्क्रीन तक, हर नया बदलाव दिल से अपनाया, जो सोचती हूं, वही कहती हूं, बातों को घुमाना मेरी आदत नहीं, दिल की बात जुबां पर रखना पहचान है. फिलहाल 'ज़ी राजस्थान डिजिटल' के साथ सफर जारी है और हर दिन कुछ नया सीखने की ललक बरकरार है और रहेगी. Pragati.Pant@india.com ईमेल के जरिए आप संपर्क कर सकते हैं.
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