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झुंझुनूं की इस दरगाह में क्यों जलाए जाते हैं दिवाली पर दीपक? जानिए 250 साल पुरानी परंपरा

झुंझुनूं की कमरूद्दीन शाह दरगाह में करीब 250 साल से छोटी दिवाली पर दीपक जलाने की परंपरा जारी है. मुस्लिम परिवार दीपोत्सव मनाकर हिंदू-मुस्लिम भाईचारे और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश करते हैं.

Written By Sandeep Kedia
Published: Nov 08, 2026, 10:15 AM IST | Updated: Nov 08, 2026, 10:20 AM IST
Image Credit: उर्स में भजन और इफ्तार में शामिल होते हैं दोनों समुदाय.
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राजस्थान के झुंझुनूं में छोटी दिवाली के मौके पर सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी भाईचारे की एक अनूठी तस्वीर देखने को मिली. यहां करीब 250 साल पुरानी परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है. कमरूद्दीन शाह दरगाह में मुस्लिम समुदाय के लोग छोटी दिवाली पर दीपक जलाकर दीपोत्सव मनाते हैं. यह परंपरा धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर प्रेम, सम्मान और सामाजिक एकता का संदेश देती है.

इस बार भी छोटी दिवाली की शाम दरगाह का नजारा देखने लायक रहा. पूरे परिसर को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया गया. मुस्लिम परिवारों के साथ महिलाएं और बच्चे भी बड़ी संख्या में दरगाह पहुंचे. लोगों ने दरगाह की दहलीज और परिसर में अलग-अलग स्थानों पर दीपक जलाए. कई जगह मोमबत्तियां भी रोशन की गईं. बच्चों ने एक-दूसरे को हैप्पी दिवाली कहकर शुभकामनाएं दीं और आतिशबाजी के साथ त्योहार की खुशियां साझा कीं.

रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगाई कमरूद्दीन शाह दरगाह
दीपावली के अवसर पर कमरूद्दीन शाह दरगाह को विशेष रूप से सजाया गया था. परिसर में जगह-जगह एलईडी की रंगीन लाइटें लगाई गईं. शाम ढलते ही पूरा दरगाह परिसर रोशनी से नहा उठा. छोटी दिवाली के दिन मुस्लिम समाज के लोग अपने परिवारों के साथ यहां पहुंचे और दीपोत्सव में हिस्सा लिया.

इस दौरान महिलाओं और बच्चों में खास उत्साह दिखाई दिया. परिवारों ने मिलकर दीपक जलाए और त्योहार की खुशियां मनाईं. दरगाह में होने वाला यह आयोजन झुंझुनूं की उस सांझी संस्कृति को दर्शाता है, जहां अलग-अलग धर्मों के लोग एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होकर खुशियां बांटते हैं.

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250 साल से निभाई जा रही दीपावली मनाने की परंपरा
कमरूद्दीन शाह दरगाह के गद्दीनशीन एजाज नबी ने बताया कि दरगाह में पिछले करीब 250 वर्षों से अधिक समय से दीपावली मनाने की परंपरा चली आ रही है. हर साल दीपावली के अवसर पर दो से तीन दिनों तक दरगाह को विशेष रोशनी से सजाया जाता है. छोटी दिवाली पर दीपक जलाकर पूरे परिसर को रोशन किया जाता है.

उन्होंने बताया कि यह आयोजन केवल एक त्योहार मनाने तक सीमित नहीं है. इसके पीछे वर्षों पुरानी आपसी मोहब्बत, सम्मान और भाईचारे की भावना जुड़ी हुई है. यही वजह है कि समय बदलने के बावजूद यह परंपरा आज भी लगातार जारी है.

कमरूद्दीन शाह और चंचलनाथ की दोस्ती से जुड़ा इतिहास
एजाज नबी के अनुसार, करीब 250 साल पहले कमरूद्दीन शाह और चंचलनाथ नाम के दो संत हुए थे. दोनों के बीच गहरी मित्रता और आपसी प्रेम था. उनकी दोस्ती आज भी झुंझुनूं में मिसाल के तौर पर याद की जाती है. इसी ऐतिहासिक जुड़ाव के कारण कमरूद्दीन शाह दरगाह और चंचलनाथ टीले के बीच धार्मिक सद्भाव और भाईचारे का रिश्ता बना हुआ है.

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उर्स में भजन और इफ्तार में शामिल होते हैं दोनों समुदाय
दरगाह और चंचलनाथ टीले के बीच यह आपसी जुड़ाव केवल दीपावली तक सीमित नहीं है. एजाज नबी ने बताया कि दरगाह में उर्स और अन्य बड़े आयोजनों के दौरान चंचलनाथ टीले के महंत ओमनाथ महाराज सहित दूसरे संत भी पहुंचते हैं. इन कार्यक्रमों में कव्वाली के साथ भजनों का आयोजन भी किया जाता है.

इसी तरह चंचलनाथ टीले पर आयोजित रोजा इफ्तार की दावत में मुस्लिम समाज के लोग शामिल होते हैं. दरगाह के गद्दीनशीन एजाज नबी और अन्य मुस्लिम लोग भी टीले पर होने वाले कार्यक्रमों में पहुंचकर अपनी भागीदारी निभाते हैं.

नई पीढ़ी भी संभाल रही भाईचारे की विरासत
इस परंपरा की सबसे खास बात यह है कि इसमें नई पीढ़ी भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है. बच्चे अपने परिवारों के साथ दरगाह पहुंचते हैं, दीपक जलाते हैं और आतिशबाजी करके दिवाली की खुशियां मनाते हैं. इससे उन्हें बचपन से ही दूसरे धर्मों के प्रति सम्मान रखने और मिल-जुलकर त्योहार मनाने की सीख मिलती है.

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About the Author

संदीप केडिया झुंझुनूं जिले के चिड़ावा कस्बे के निवासी और वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे पिछले करीब 25 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं तथा वर्ष 2015 से Zee Media से जुड़े हुए हैं. उन्होंने VMOU Kota से बीजेएमसी और एमजेएमसी की पढ़ाई की है. संदीप केडिया को झुंझुनूं जिले की पत्रकारिता के मजबूत और भरोसेमंद नामों में गिना जाता है. राजस्थान सरकार के अधिस्वीकृत पत्रकारों की सूची में 2013 से शामिल संदीप केडिया को प्रिंट और सोशल मीडिया का भी अच्छा खासा अनुभव है.
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