झुंझुनूं कैप्टन हंसराज महला ने गांव के नाम की पेंशन: 50 लाख खर्च कर बदल दी तस्वीर!
90 वर्षीय सेवानिवृत्त कैप्टन हंसराज महला ने अपनी पेंशन और जीवनभर की जमा पूंजी गांव के विकास में लगा दी. उन्होंने करीब 35 लाख रुपये खर्च कर राजकीय आयुर्वेदिक औषधालय का भव्य भवन बनवाया.
देश की रक्षा के लिए सेना में सेवाएं देने वाले झुंझुनूं जिले के गुढ़ागौड़जी भाटीवाड़ निवासी 90 वर्षीय सेवानिवृत्त कैप्टन हंसराज महला आज भी सेवा और समर्पण की मिसाल बने हुए हैं. सेना से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अपनी पेंशन और जीवनभर की जमा पूंजी को गांव के विकास और आमजन की सुविधाओं के लिए समर्पित कर दिया. इसी संकल्प के तहत वे अब तक 50 लाख रुपये से अधिक की राशि सामाजिक सरोकारों और विकास कार्यों पर खर्च कर चुके हैं.
35 लाख रुपये खर्च कर बनवाया आयुर्वेदिक औषधालय
कैप्टन महला ने गांव में चिकित्सा सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए करीब 35 लाख रुपये खर्च कर राजकीय आयुर्वेदिक औषधालय का भवन बनवाया. मरीजों, चिकित्सकों और अन्य कर्मचारियों की सुविधाओं को ध्यान में रखकर तैयार करवाया गया. यह भवन जिले के 170 आयुर्वेदिक औषधालयों में सबसे बड़ा बताया जा रहा है. डॉ. चन्द्रशेखर ने बताया कि गांव का राजकीय आयुर्वेदिक औषधालय पहले मुख्य बाजार के पास केवल एक कमरे में संचालित होता था. बारिश के दिनों में छत से पानी टपकता था, जिससे मरीजों के साथ चिकित्सकों और अन्य स्टाफ को भी परेशानी होती थी.
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जमा पूंजी से बनवाया आधुनिक भवन
कैप्टन हंसराज महला से ग्रामीणों की यह समस्या उनसे देखी नहीं गई. उन्होंने नया भवन बनवाने का प्रस्ताव रखा।प्रस्ताव सरकार तक पहुंचा तो नए मापदंडों के अनुसार, भवन निर्माण की स्वीकृति मिल गई. इसके बाद कैप्टन महला ने अपनी जमा पूंजी से भवन का निर्माण करवाकर सरकार को सौंप दिया. करीब 35 लाख रुपये की लागत से बने इस भवन में छह कमरे, एक हॉल, शौचालय, खुला स्थान और विभिन्न प्रकार के औषधीय पौधों की व्यवस्था है. इससे औषधालय में आने वाले मरीजों और चिकित्सा स्टाफ को बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं.
170 औषधालयों में सबसे बड़ा भवन
औषधालय के चिकित्सा अधिकारी प्रभारी डॉ. चंद्रशेखर ने बताया कि झुंझुनूं जिले में कुल 170 राजकीय आयुर्वेदिक औषधालय संचालित हैं. इनमें से अधिकांश भवन जर्जर स्थिति में हैं. ऐसे में भाटीवाड़ में भामाशाह कैप्टन हंसराज महला की ओर से बनवाया गया भवन जिले में अपनी तरह का सबसे बड़ा भवन है.
3,500 रुपये पेंशन से शुरू हुआ सफर
कैप्टन हंसराज महला वर्ष 1988 में सेना से सेवानिवृत्त हुए थे. उस समय उनकी मासिक पेंशन महज साढ़े तीन हजार रुपये थी, जो अब बढ़कर करीब 70 हजार रुपये हो गई है. उन्होंने अपनी पेंशन और बचत को केवल निजी जरूरतों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे गांव के विकास का माध्यम बनाया. वर्ष 2012 में उन्होंने अपनी पत्नी पार्वती देवी के नाम पर पांच लाख रुपये खर्च कर गांव में विश्राम गृह बनवाया.
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स्कूल से मोक्षधाम तक विकास कार्यों में दिया सहयोग
इसके अलावा मोक्षधाम में टीन शैड, सरकारी स्कूल में कमरे और शौचालय सहित अन्य विकास कार्यों में भी आर्थिक सहयोग दिया. कैप्टन महला का सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पण लोगों के लिए प्रेरणादायक है. उन्होंने अपनी पेंशन और जीवनभर की कमाई को जनहित के कार्यों में लगाकर यह साबित किया है कि समाज और गांव की सेवा के लिए उम्र कोई बाधा नहीं होती.
Report- Sandeep Kedia