)
Rajasthan News: राजस्थान के बाड़मेर जिले के कुरजा गांव में कथित अवैध खनन को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. जिला मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित इस इलाके में कभी पहाड़ियां नजर आती थीं, लेकिन अब वहां गहरे गड्ढे और खुदाई के निशान दिखाई दे रहे हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि महज दो साल में खनन के कारण पहाड़ियों का स्वरूप बदल गया. सवाल यह है कि अगर खनन अवैध था और जमीन गौचर श्रेणी की थी, तो इतने समय तक गतिविधियां कैसे चलती रहीं?
दो साल में बदल गया पहाड़ियों का स्वरूप
कुरजा गांव की पहाड़ियों में बड़े पैमाने पर खुदाई के निशान दिखाई देने का दावा किया जा रहा है. ग्रामीणों के मुताबिक, खनन के कारण जमीन पर गहरे गड्ढे बन गए हैं. इससे इलाके की प्राकृतिक संरचना को नुकसान पहुंचने की आशंका है. ग्रामीणों का कहना है कि खनन के दौरान होने वाले विस्फोटों से भी आसपास के लोगों में डर का माहौल बना.
गौचर भूमि पर खनन को लेकर सवाल
इस मामले में सबसे अहम सवाल जमीन की प्रकृति को लेकर है. ग्रामीणों का दावा है कि जिस जगह खनन हुआ, वह अनारक्षित गौचर भूमि है. गौचर भूमि गांव के पशुधन के लिए महत्वपूर्ण होती है. ऐसे में यदि इस जमीन पर नियमों के विरुद्ध खनन हुआ है, तो इसकी जिम्मेदारी तय करना जरूरी होगा.
ग्रामीणों का कहना है कि वे पिछले दो साल से इस मामले को लेकर आवाज उठा रहे हैं. उनका दावा है कि पटवारी से लेकर खनन विभाग तक शिकायतें पहुंचाई गईं. हालांकि, जमीन के राजस्व रिकॉर्ड और खनन संबंधी दस्तावेजों की जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी.
प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल
ग्रामीणों की शिकायतों के बावजूद खनन गतिविधियां जारी रहने के आरोपों ने प्रशासनिक निगरानी पर सवाल खड़े किए हैं. यदि खनन बिना वैध अनुमति के हुआ, तो संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई? वहीं, यदि खनन की अनुमति दी गई थी, तो उसकी शर्तें क्या थीं और जमीन की श्रेणी की जांच कैसे की गई?
राजस्व नुकसान और पर्यावरण की चिंता
इस मामले में सरकारी राजस्व के संभावित नुकसान की भी जांच जरूरी है. कितना खनिज निकाला गया, कितनी रॉयल्टी जमा हुई और कितने वाहनों से उसकी ढुलाई हुई. इन सवालों के जवाब रिकॉर्ड से ही मिल सकते हैं. अब प्रशासन से खनन लीज, अनुमति, जमाबंदी और गौचर भूमि की स्थिति स्पष्ट करने की मांग उठ रही है. यदि अवैध खनन की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार लोगों के साथ लापरवाही बरतने वालों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए.
कुरजा की पहाड़ियां अब प्रशासन की कार्रवाई का इंतजार कर रही हैं. सवाल सिर्फ प्राकृतिक संपदा के नुकसान का नहीं, बल्कि सरकारी जमीन की सुरक्षा और ग्रामीणों की शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई का भी है.