Bhairon Singh Shekhawat Jayanti 2026: राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत को ‘बाबोसा’ के नाम से भी जाना जाता है. 23 अक्टूबर को उनकी जयंती के मौके पर उनके राजनीतिक सफर, जीवन से जुड़े किस्सों, अंत्योदय योजना और ग्रामीण विकास से जुड़ी पहलों को याद किया जाएगा. जानिए कैसे राजस्थान की राजनीति से निकलकर उन्होंने देश के उपराष्ट्रपति पद तक का सफर तय किया और उनके कार्यकाल की प्रमुख योजनाएं क्या थीं.
पुलिस की नौकरी से राजनीति तक कैसे पहुंचे भैरोंसिंह शेखावत?
भैरोंसिंह शेखावत का जन्म 23 अक्टूबर 1923 को राजस्थान के सीकर जिले के खाचरियावास गांव में हुआ था. शुरुआती जीवन में उन्होंने पुलिस विभाग में काम किया, लेकिन बाद में राजनीति में कदम रखा. साल 1952 में वे पहली बार राजस्थान विधानसभा के सदस्य बने. इसके बाद उन्होंने प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई. उनका राजनीतिक सफर राजस्थान के ग्रामीण इलाकों से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचा.
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री से भारत के उपराष्ट्रपति तक का सफर
भैरोंसिंह शेखावत ने तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली. वे पहली बार 1977 में मुख्यमंत्री बने. इसके बाद 1990 और 1993 में भी उन्होंने इस पद की जिम्मेदारी निभाई.
उनके राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव अगस्त 2002 में आया, जब वे भारत के उपराष्ट्रपति निर्वाचित हुए. उन्होंने 2007 तक इस पद पर सेवाएं दीं. उपराष्ट्रपति के रूप में उन्होंने राज्यसभा के सभापति की जिम्मेदारी भी संभाली. इस तरह राजस्थान की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले शेखावत ने राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर काम किया.
1. अंत्योदय योजना: सबसे गरीब परिवारों तक पहुंचने की पहल
भैरोंसिंह शेखावत के राजनीतिक कार्यकाल में अंत्योदय कार्यक्रम का विशेष उल्लेख किया जाता है. इस कार्यक्रम का उद्देश्य समाज के सबसे गरीब परिवारों तक सरकारी सहायता और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना था. अंत्योदय की सोच समाज के उन लोगों पर केंद्रित थी, जिन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से अधिक मदद की जरूरत थी.
2. फूड फॉर वर्क: काम के बदले अनाज
शेखावत के कार्यकाल से जुड़ी प्रमुख पहलों में ‘फूड फॉर वर्क’ कार्यक्रम का भी उल्लेख मिलता है. इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में काम के अवसर उपलब्ध कराने और श्रम के बदले अनाज देने की व्यवस्था को बढ़ावा देना था. ऐसे कार्यक्रम ग्रामीण परिवारों की जरूरतों और रोजगार से जुड़े सवालों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माने जाते रहे हैं.
3. अपना गांव, अपना काम: ग्रामीण विकास पर जोर
‘अपना गांव, अपना काम’ योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय जरूरतों के अनुरूप विकास कार्यों को प्रोत्साहित करना था. गांवों में जरूरी सुविधाओं और सामुदायिक विकास से जुड़े कामों को बढ़ावा देने की यह सोच विकेंद्रीकृत विकास की अवधारणा से जुड़ी थी.
4. शिक्षा और भाषा से जुड़ी संस्थागत पहल
भैरोंसिंह शेखावत के कार्यकाल से राजस्थान राज्य उर्दू अकादमी की स्थापना और वक्फ से जुड़े संस्थागत प्रयासों का भी उल्लेख किया जाता है. इन पहलों को राज्य में भाषा, साहित्य और संबंधित सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं के विकास के संदर्भ में देखा जाता है.
5. सामाजिक कल्याण और जनहित की योजनाएं
शेखावत की राजनीतिक विरासत में सामाजिक जरूरतों से जुड़ी योजनाओं और जनकल्याण की नीतियों का भी स्थान रहा. उनके कार्यकाल से जुड़ी ‘राजलक्ष्मी योजना’ का उल्लेख भी किया जाता है. हालांकि, इस योजना के उद्देश्य, शुरुआत की तारीख और इसके प्रत्यक्ष परिणामों की पुष्टि आधिकारिक अभिलेखों से करना जरूरी है, ताकि योजना से जुड़े तथ्यों को सही संदर्भ में प्रस्तुत किया जा सके.
भैरोंसिंह शेखावत की राजनीतिक विरासत आज भी क्यों याद की जाती है?
भैरोंसिंह शेखावत का निधन 15 मई 2010 को हुआ था. राजस्थान की राजनीति में उनके लंबे अनुभव, तीन बार मुख्यमंत्री बनने और देश के उपराष्ट्रपति के पद तक पहुंचने के कारण उनका नाम प्रमुख राजनीतिक हस्तियों में लिया जाता है.
23 अक्टूबर को उनकी जयंती के मौके पर उनके जीवन, राजनीतिक सफर और शासनकाल की पहलों को याद किया जाता है. ‘बाबोसा’ के नाम से लोकप्रिय शेखावत का जीवन राजस्थान की राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचने की एक महत्वपूर्ण यात्रा रहा है. उनकी विरासत को समझने के लिए उनके राजनीतिक फैसलों के साथ-साथ उन योजनाओं के वास्तविक प्रभाव और ऐतिहासिक संदर्भ को भी देखना जरूरी है.