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बाड़मेर की 9 तहसीलों पर अकाल की मार ! 31 दिसंबर तक टैंकरों के ऐलान के बीच विधायक भाटी की चेतावनी, "राहत नहीं मिली तो सड़क पर उतरेगा थार"

थार की धरती पर इस बार मौसम की बेरुखी ने जिंदगी का पूरा गणित ही बिगाड़ कर रख दिया है. जिन किसानों ने बारिश के भरोसे बाजरा, मूंग, मोठ और ग्वार बोई थी. अब अपनी मेहनत और पूंजी को सूखती आंखों से दम तोड़ते देख रहा है. बाड़मेर की 9 तहसीलें आकाल की मार झेल रही है. मामले पर शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने चिंता जतायी है.

बाड़मेर की 9 तहसीलों पर अकाल की मार ! 31 दिसंबर तक टैंकरों के ऐलान के बीच विधायक भाटी की चेतावनी, "राहत नहीं मिली तो सड़क पर उतरेगा थार"
Image Credit: Barmer drought affected Ravindra Singh Bhati warns protest

सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हुआ गंभीर अकाल : 9 तहसीलों पर संकट
बाड़मेर में अकाल अब सिर्फ एक आशंका नहीं, बल्कि सरकारी तौर पर दर्ज एक गंभीर संकट बन चुका है. खरीफ संवत 2083 में कम बारिश और फसल खराबे के आकलन के बाद जिले की नौ तहसीलों-गडरारोड, चौहटन, बाड़मेर, बायतू, सेड़वा, रामसर, शिव, धनाऊ और बाड़मेर ग्रामीण को गंभीर सूखाग्रस्त घोषित किया गया है. सरकारी आदेशों में ये घोषणा अगले छह महीने के लिए प्रभावी है, लेकिन धरातल पर किसानों के हाल अभी से बेहाल हैं और तालाब पूरी तरह सूख चुके हैं.

पशुपालकों के सामने सबसे भयावह मंजर : कैसे बचेगी पीढ़ियों की पूंजी ?
सूखे की सबसे डराने वाली तस्वीर पशुपालकों के घरों में दिखाई दे रही है. जहां पशुधन सिर्फ एक संपत्ति नहीं, बल्कि पशुपालकों की पीढ़ियों की जमा-पूंजी है. इस बार न खेतों में चारा उगा और न ही तालाबों में पानी बचा. हालात ये हैं कि पशुओं के लिए सूखा चारा जुटाना भी मुश्किल होने लगा है. ऐसे में आने वाले महीने पशुपालकों के लिए सबसे कठिन साबित हो सकते हैं.

31 दिसंबर तक टैंकर, 1 करोड़ का आपात फंड और 10 चारा डिपो
अब सवाल ये की इस गहरे संकट के बीच सबसे बड़ा सवाल ये है कि सरकार का राहत प्लान क्या है ? तो
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने 30 सितंबर को बाड़मेर दौरे के दौरान घोषणा की कि गर्मियों में शुरू की गई आकस्मिक पेयजल व्यवस्था और टैंकरों से जल परिवहन 31 दिसंबर 2026 तक जारी रहेगा. साथ ही, कम बारिश वाले क्षेत्रों में जरूरी आपात कार्यों के लिए जिला कलेक्टर के जरिए एक करोड़ रुपये तक के काम स्वीकृत किए जा सकेंगे.

3 जिलों में चारा डिपो की घोषणा : बाड़मेर, बालोतरा और जैसलमेर में चारा डिपो 
प्रशासन ने पहले चरण में शिव, रामसर और गडरारोड तहसीलों की 10 ग्राम सेवा सहकारी समितियों के माध्यम से चारा डिपो खोलने की मंजूरी दी है. इनमें शिव की पांच, रामसर की तीन और गडरारोड की दो समितियां शामिल हैं, जहां पात्र पशुपालकों को रियायती दरों पर चारा उपलब्ध कराने की व्यवस्था है. वहीं आपदा प्रबंधन विभाग के दिशा-निर्देशों के तहत चारा डिपो में अनुदान का लाभ लघु एवं सीमांत किसानों के लिए निर्धारित है. पशु शिविरों और चारा डिपो के संचालन के लिए प्रशासनिक प्रक्रिया भी तय की गई है.

हक के लिए आंदोलन की चेतावनी : रविंद्र सिंह भाटी
सरकारी घोषणाओं के बीच शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने बाड़मेर जिले में अकाल प्रबंधन की जमीनी व्यवस्थाओं पर कड़े सवाल उठाए हैं. भाटी ने कहा कि धरातल पर अकाल प्रबंधन कहीं नजर नहीं आ रहा है; न पशुओं के लिए चारा-पानी उपलब्ध है और न ही टैंकरों के माध्यम से होने वाली जलापूर्ति सुचारु रूप से चल रही है. उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि सबसे अधिक पशुधन शिव विधानसभा क्षेत्र और सीमावर्ती इलाकों में है, लेकिन इन्हीं क्षेत्रों में हालात सबसे ज्यादा चिंताजनक हैं और पशुपालकों को राहत पहुंचाने वाली सरकारी व्यवस्थाएं प्रभावी रूप से दिखाई नहीं दे रहीं. भाटी ने चेतावनी देते हुए साफ कहा कि अगर समय रहते चारा-पानी और पेयजल की व्यवस्था नहीं सुधारी गई, तो लोगों को अपने हक के लिए आंदोलन की राह पर उतरना पड़ेगा.

चारा महंगा हो रहा है : किसान नेता राजेंद्र सिंह भीयांड 
किसान नेता राजेंद्र सिंह भीयांड के मुताबिक बाड़मेर में सालों बाद ऐसे हालात बने हैं. खेत सूखे पड़े हैं, पशुओं के लिए चारे की कीमतें बेतहाशा बढ़ गई हैं और पानी का संकट लगातार गहराता जा रहा है. ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालकों के सामने अपने पशुधन को बचाने की सीधी चुनौती खड़ी हो गई है. उन्होंने कहा कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों को सरकार के सामने धरातल की वास्तविक स्थिति स्पष्ट रूप से रखनी चाहिए, ताकि उसी के अनुरूप अकाल प्रबंधन की प्रभावी व्यवस्था हो सके. भीयांड ने अपील कि है कि आने वाले दिनों में हालात और अधिक खराब होने की आशंका है. किसानों को अकाल के साथ-साथ फसल खराबे का दर्द भी झेलना पड़ेगा. एक तरफ खेती में लगाई गई पूंजी डूबने का खतरा है, तो दूसरी तरफ पशुधन का पालन-पोषण मुश्किल हो रहा है. ऐसे में सरकार को तत्काल चारा-पानी की व्यवस्था, टैंकरों से नियमित जलापूर्ति, पशु शिविरों की स्थापना और फसल खराबे का निष्पक्ष आकलन करवाना चाहिए. अकाल प्रबंधन में देरी का खामियाजा सीधे तौर पर किसान और पशुपालक भुगतेंगे.

अगली बारिश तक कैसे जिंदा बचेगी उम्मीद?
सरकारी घोषणाएं अपनी जगह हैं, लेकिन थार की जमीनी जरूरतें कहीं ज्यादा बड़ी हैं. तीन बड़े सवाल जिनके जवाब जल्द से जल्द तलाशने होंगे.

  1. क्या महज 10 चारा डिपो पूरे जिले के विशाल पशुधन के लिए काफी होंगे ?
  2. क्या जरूरत के मुताबिक नए डिपो खोले जाएंगे और पशु शिविर समय पर शुरू होंगे ?
  3. क्या पानी के टैंकर उन दूर-दराज की ढाणियों तक भी पहुंचेंगे, जहां पानी के सभी स्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं ?

फसल खराबे के मुआवजे, पशुधन संरक्षण और ग्रामीण परिवारों के लिए अतिरिक्त रोजगार को लेकर भी एक स्पष्ट और समयबद्ध राहत की जरूरत है, क्योंकि उपलब्ध सरकारी घोषणाओं में इन सभी मोर्चों पर विस्तृत सहायता पैकेज की जानकारी अभी सामने नहीं आई है. किसान को सिर्फ सरकारी आंकड़ों में 'सूखाग्रस्त' घोषित करना काफी नहीं है. क्योंकि थार में अकाल सिर्फ फसलें नहीं सुखाता, ये परिवारों की उम्मीदें, पशुओं की जिंदगी और गांवों की पूरी अर्थव्यवस्था को झकझोर देता है. अगले छह महीने बाड़मेर के लिए बेहद अहम हैं. ऐसे में प्रशासन की संवेदनशीलता, सरकार की इच्छाशक्ति और राहत व्यवस्था की असली परीक्षा होगी.
 

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About the Author

Durg Singh Rajpurohit

Durg Singh Rajpurohit

दुर्ग सिंह राजपुरोहित दो दशकों से अधिक के अनुभव वाले पत्रकार हैं. साल 2004 में दैनिक भास्कर से पत्रकारिता की शुरुआत करने के बाद उन्होंने पंजाब केसरी, इंडिया न्यूज़ सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं. वर्तमान में वे ज़ी राजस्थान न्यूज़ में बाड़मेर जिले की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. राजनीति, शासन-प्रशासन, सीमावर्ती राजस्थान और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर उनकी विशेष पकड़ है. जमीनी पत्रकारिता, तथ्यपरक रिपोर्टिंग और समसामयिक विषयों की गहरी समझ उनकी पेशेवर पहचान का प्रमुख आधार है.
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