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अमेरिका गया, तालिबान आया और बदल गया खेल! मॉस्को में जुटीं दुनिया की ताकतें, अफगानिस्तान पर किसका 'कब्जा'?

अफगानिस्तान में तालिबान के कार्यकाल को 5 वर्ष से ज्यादा हो गए हैं. बड़ी बात यह है कि उसके दूसरे कार्यकाल में तालिबान ने खुद के अंदर बहुत बदलाव किए हैं.

Written By Tahir Kamran
Published: Oct 07, 2026, 08:21 PM IST | Updated: Oct 07, 2026, 09:54 PM IST
Image Credit: AI की मदद से बनाई गई तस्वीर
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रूस की राजधानी मॉस्को में रूस, चीन, भारत, ईरान, पाकिस्तान और मध्य एशिया के कई देशों ने एक अहम मीटिंग की. इस मीटिंग का मकसद था अफगानिस्तान का भविष्य, लेकिन सवाल ये है कि आखिर आज अफगानिस्तान के भविष्य पर चर्चा करने के लिए दुनिया के ये तमाम देश तालिबान के साथ एक ही टेबल पर क्यों बैठे हैं? तस्वीर इतनी बदल चुकी है कि जिस रूस ने कभी तालिबान पर प्रतिबंध लगाए थे, उसी रूस की राजधानी मॉस्को में तालिबान के विदेश मंत्री का स्वागत हो रहा है और दुनिया की बड़ी क्षेत्रीय ताकतें बैठकर अफगानिस्तान के भविष्य पर चर्चा कर रही हैं. इन सवालों के जवाब से पहले अफगानिस्तान के पिछले कार्यकाल के बारे में जान लेते हैं.

अफगानिस्तान के बामियान की पहाड़ियों में भगवान बुद्ध की दो विशाल प्रतिमाएं लगभग डेढ़ हजार वर्षों से अपने अंदर इतिहास और अतीत की अनगिनत यादें समेटे हुई थीं. ये प्रतिमाएं अफगानिस्तान के उस इतिहास के बारे में बताती थीं कि यह इलाका कभी बौद्ध संस्कृति और सिल्क रूट का अहम रास्ता हुआ करता था. हालांकि, 2001 में जब तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज था, तो उसने पूरी दुनिया को अपने क्रूर चेहरे से अवगत कराया और उसने इन प्रतिमाओं को डायनामाइट से उड़ा दिया था. तालिबान की इस हरकत की दुनियाभर में निंदा हुई.

1996 में पहली बार तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा किया था. सत्ता में आने के बाद तालिबान ने औरतों पर तरह-तरह की पाबंदियां लगाईं, सख्त शरिया कानून और अमानवीय सजाओं के साथ-साथ अल्पसंख्यकों और विरोधियों पर अत्याचार की वजह से भी दुनियाभर के विरोध का सामना करना पड़ा.

अफगानिस्तान में अमेरिकी की एंट्री

फिर आया 11 सितंबर 2001. ये वो तारीख थी जब अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में मौजूद वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के दो टॉवरों में प्लेन क्रैश कर आतंकियों ने उड़ा दिया था. इस हमले के बदले में अमेरिका ने अलकायदा और उसके चीफ ओसामा बिन लादेन के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी. इसी के तहत अमेरिका ने अफगानिस्तान में एंट्री मारी और कुछ ही हफ्तों में अफगानिस्तान की सत्ता से तालिबान को बेदखल कर दिया. अमेरिका की कार्रवाई के बाद ऐसा लग रहा था कि अब फिर से कभी तालिबान का उदय देखने को नहीं मिलेगा.

20 साल बाद फिर बदला समीकरण

हालांकि, ये ख्याल महज ख्याल बनकर रह गया और बीस साल बाद कहानी फिर वहीं पहुंच गई जहां से शुरू हुई थी. जिस संगठन को हटाने के लिए अमेरिका दो दशक तक अफगानिस्तान में लड़ता रहा, वही संगठन फिर देश की सत्ता में आ गया. अमेरिका ने अगस्त 2021 में अफगानिस्तान से अपनी सैना वापस बुला ली और इस बार तालिबान जब सत्ता में आया तो उसने अपनी पिछली तमाम गलतियों को कुछ हद तक सुधारने की कोशिश की. इस बार तालिबान ने बंदूक के बदले डिप्लोमैटिक तरीके से दुनिया में खुद की पहचान बनाई.

दूसरे कार्यकाल में तालिबान ने खुद को बदल लिया!

2021 में जब तालिबान फिर से सत्ता में आया, तो इस बार उसे पैसे चाहिए थे, कारोबार चाहिए था, पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को बेहतर बनाने की भूख देखने को मिली. इन सबके साथ-साथ उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद की स्वीकार्यता भी चाहिए थी. दिलचस्प बात यह है कि तालिबान को अपनी इन कोशिशों में कामयाबी भी मिल रही है. इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जिस रूस ने कभी तालिबान को प्रतिबंधित संगठन करार रखा था, उसी ने दुनिया में सबसे पहले तालिबान सरकार को मान्यता दी.

हालांकि, ऐसा भी नहीं है कि तालिबान पूरी तरह बदल गया है, लेकिन इस बार उसकी सोच में काफी बदलाव नजर आया है. इस बार के तालिबान की शासन शैली और विदेश नीति के दो चेहरे दिखाई दे रहे हैं. अंदर महिलाओं और नागरिक स्वतंत्रताओं पर सख्त कानून अभी-भी हैं, लेकिन बाहरी तौर पर तालिबान पड़ोसी देशों और क्षेत्रीय शक्तियों के साथ रिश्तों को बेहतर बना रहा है. साथ ही बाहरी दुनिया की भी अफगानिस्तान में काफी दिलचस्पी दिखाई दे रही है.

इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र ने भी 2023 में कहा था कि तालिबान के आने के बाद सशस्त्र संघर्ष के कारण होने वाली नागरिक मौतों में बड़ी कमी आई है. उसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि तालिबान ने ISIS-K के खिलाफ कार्रवाई की और अफीम की खेती पर लगाए गए प्रतिबंध को कई इलाकों में प्रभावी ढंग से लागू किया गया. संयुक्त राष्ट्र ने भ्रष्टाचार में कमी और सरकारी राजस्व संग्रह के बेहतर होने की भी बात कही थी.

रूस और अफगानिस्तान के रिश्ते

अफगानिस्तान में चीन की दिलचस्पी

वहीं अगर चीन की तरफ देखें तो चीन अफगानिस्तान की तरफ अपने आर्थिक हितों को नजर में रखते हुए झुक रहा है. चीन का शिनजियांग राज्य अफगानिस्तान के करीब है, ऐसे में वो नहीं चाहेगा कि अफगानिस्तान की तरफ से उसके क्षेत्र में उग्रवाद पहुंचे.

इसके अलावा खनिज को लेकर भी चीन की नजर अफगानिस्तान पर है. क्योंकि अफगानिस्तान में तांबा, लीथियम, लौह, अयस्क और कई अहम खनिज भारी मात्रा में पाए जाते हैं. अगस्त 2025 में ड्रैगन ने तालिबान के साथ खनिज संसाधनों की तलाश और खनन में दिलचस्पी दिखाई. साथ ही काबुल को अपनी अहम योजना BRI (Belt and Road Initiative) में औपचारिक रूप से शामिल होने की दावत भी दी. BRI चीन की एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय बुनियादी ढांचा और आर्थिक विकास रणनीति है. 150 से ज्यादा देश और अंतरराष्ट्रीय संगठन इस परियोजना से जुड़े हैं.

इसके अलावा चीन के लिए कनेक्टिविटी के लिहाज से भी अफगानिस्तान काफी अहम है. मध्य और दक्षिण एशिया के बीच पहुंचने के लिए चीन अफगानिस्तान की जरूरत है.

ईरान और अफगानिस्तान

ईरान के हितों की तरफ देखें, तो ईरान चाहता है कि उसकी सरहदें शरणार्थी से सुरक्षित रहें. इसके अलावा व्यापार और कनेक्टिविटी भी काफी अहम है. चाबहार ईरान का बंदरगाह है, जिसे भारत डेवलप कर रहा है। चाबहार से भारत को यह लाभ होगा कि ईरान, अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक जाने के लिए उसे पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल नहीं करना होगा. यही वजह है कि भारत, ईरान और अफगानिस्तान के हित इस मुद्दे पर एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं.

भारत और अफगानिस्तान के रिश्ते

वहीं अगर भारत की बात करें, तो नई दिल्ली और काबुल के रिश्ते बहुत पुराने हैं. भारत ने अफगानिस्तान में रोड, मेडिकल, एजुकेशन, संसद भवन और कई अन्य विकास कार्यों में अहम किरदार अदा करता आ रहा है. भारतीय की मदद से ईरान में 400 से ज्यादा परियोजनाएं मुकम्मल हुई हैं. साथ ही करीब 3 अरब डॉलर की मदद और निवेश भी भारत ने अफगानिस्तान में है. हालांकि, जब 2021 में तालिबान सत्ता में आया, तो भारत ने अपने राजनयिक को वापस बुला लिया था, लेकिन अगले ही साल 2022 में अपना तकनीकी मिशन फिर से खोला.

विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने जनवरी 2025 में तालिबान के कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी से मुलाकात की थी. दोनों की यह बातचीत दुबई में हुई थी. इसके बाद अक्टूबर 2025 में यह रिश्ता एक कदम और आगे बढ़ा. तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी भारत आए. इसके बाद भारत ने काबुल में अपने मिशन को फिर से दूतावास स्तर पर अपग्रेड करने का ऐलान किया.

अब अगर बात करें कि भारत ऐसा क्यों कर रहा है, तो यह सिर्फ एक पड़ोसी देश होने तक सीमित नहीं है. इसके पीछे सबसे बड़ा देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है. भारत यह बिल्कुल नहीं चाहता कि अफगानिस्तान फिर किसी ऐसे आतंकी नेटवर्क का सुरक्षित ठिकाना बने जिसका निशाना भारत हो. यह इसलिए भी अहम है, क्योंकि उसका बॉर्डर पाकिस्तान से मिलता है. हालांकि फिलहाल पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच रिश्ते बहुत बुरी स्थिति में हैं.

राष्ट्रीय सुरक्षा के अलावा दूसरा सवाल है पाकिस्तान को बायपास करने का भी है. अगर भारत को अफगानिस्तान और आगे मध्य एशिया तक पहुंचना है, तो पाकिस्तान के रास्ते पर निर्भरता एक बड़ी बाधा है. चाबहार इस समस्या का विकल्प मुहैया कराता है.

तीसरी बड़ी वजह मध्य एशिया में भारत के प्रभाव से जुड़ी हुई है. क्योंकि मध्य एशिया के कई देश जैसे- कजाखस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान और तुर्कमेनिस्तान भारत के लिए ऊर्जा, व्यापार, सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग के लिहाज से अहम हैं. अब क्योंकि अफगानिस्तान इस पूरे इलाके के दक्षिणी हिस्से में मौजूद है. ऐसे में उसे नजरअंदाज नहीं किया ज सकता. अगर ऐसा किया तो भारत की सेंट्रल एशिया स्ट्रैटेजी अधूरी रह जाएगी.

इसीलिए जून 2025 में हुए 'India-Central Asia Dialogue' में भी भारत और मध्य एशियाई देशों ने एक स्थिर, टेरेरिज्म और ड्रग्स फ्री अफगानिस्तान की जरूरत पर जोर दिया था.

पाकिस्तान के साथ चरम पर है तनाव

अब अगर पाकिस्तान की बात करें, यह पहलू तालिबान के पिछले कार्यकाल के मुकाबले इस बार बिल्कुल उलट है. पिछली बार जब तालिबान सत्ता में था, तो तब पाकिस्तान उसके सबसे बड़े समर्थकों में शुमार किया जाता था. हालांकि, आज दोनों देशों के बीच जबरदस्त तनाव है. दोनों देश TTP और आतंकवाद को लेकर एक दूसरे पर हमले करते रहते हैं. पाकिस्तान का आरोप है कि TTP अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल पाकिस्तान में हमलों के लिए करते हैं. हालांकि, तालिबान इन आरोपों को खारिज कर देता है.

5 अक्तूबर को मॉस्को में हुई मीटिंग में भी यह विवाद खुलकर सामने आया, क्योंकि दोनों देश एक बयान पर सहमत नहीं हुए. जिसके नतीजे में बगैर ज्वाइंट स्टेटमेंट के ही बैठक को खत्म करना पड़ा.

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About the Author

Zee News में नेशनल डेस्क पर देश–विदेश और राजनीति से जुड़ी खबरें लिखते हैं. करियर का आगाज 2015 से 'पंजाब केसरी' ग्रुप के उर्दू अखबार ‘हिंद समाचार’ से किया, जहां वे कंटेट राइटर से पेज डिजाइनर तक पहुंचे. इसके बाद उर्दू, हिंदी और पंजाबी - तीनों भाषाओं में काम करने का मौका मिला. 2018 में डिजिटल की तरफ कूच करते हुए पंजाब केसरी ग्रुप की उर्दू वेबसाइट की लॉन्चिंग टीम का नेतृत्व किया. इसके बाद 2020 में 'Zee Salaam' ज्वाइन किया, यहां भी वेबसाइट को लॉन्च करने के साथ-साथ तीन साल टीम का नेतृत्व भी किया. इसी दौरान ZEE Delhi NCR वेबसाइट भी लॉन्च हुई, जिसमें उनका अहम योगदान रहा. 2023 में India Daily Live की लॉन्चिंग टीम के साथ काम किया और शुरुआती दिनों में हिंदी के अलावा पंजाबी, तमिल, तेलुगु और गुजराती वेबसाइट टीमों को मैनेज किया. अक्टूबर 2024 में फिर से Zee Media में में वापसी करते हुए नेशनल टीम का हिस्सा बने. तकनीक में दिलचस्पी की वजह से उन्होंने React.js और वेब डिजाइनिंग सीखी. यही कारण है कि उनकी खबरों में HTML-CSS के छोटे-छोटे ग्राफिक्स दिख जाते हैं, जो मुश्किल बातों को भी आसान बना देते हैं. करियर की शुरुआत में कुछ दिनों तक फोटो स्टूडियो में भी काम किया, जहां कैमरा, Adobe Photoshop और ग्राफिक डिजाइनिंग सीखी, जो आज भी उनके डिजिटल काम में मदद करता है. उर्दू शायरी से प्यार अलग ही है. ग़ज़लें, नज़्में, गीत भी लिखते हैं और कई अखबारों में उनकी शायरी छप भी चुकी हैं. राहत इंदौरी, मुनव्वर राणा, अनवर जलालपुरी खुशबीर सिंह शाद और नवाज देवबंदी, माजिद देवबंदी  जैसे शायरों के इंटरव्यू व बातचीत का अनुभव भी उनके पास है. आप tahir.kamran@india.com पर सीधे ईमेल या फिर नीचे X और Facbook से जुड़ सकते हैं. 
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