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तालिबान की मौजूदगी उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका तक पहुंचने यानी ट्रंप की नाक के नीचे पहुंचने का दावा किया जा रहा है. ये सिर्फ अमेरिका नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की चिंता का विषय है. ऐसा इसलिए क्योंकि अमेरिका को 9/11 का आतंकी हमला करके अमेरिका का दहला चुके अलकायदा से लेकर तालिबान तक की लीडरशिप ये कह चुकी है कि उनका संगठन किसी बड़े नेता या कुछ लड़ाकों को मारने से खत्म नहीं होता, क्योंकि वो महज कुछ लोगों का समूह नहीं बल्कि विचारधारा है, जिसे खत्म करना लगभग नामुमकिन है.
15 अगस्त 2021 को अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की वापसी के बाद तालिबान ने काबुल पर कब्जा करके देश की कमान संभालने का ऐलान किया था. उसी दौरान तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने 'टोलो न्यूज' को दिए इंटरव्यू में कहा था कि 20वीं सदी के तालिबान और 21वीं सदी के तालिबान में जरा सा भी अंतर नहीं है. हमारी विचारधाराएं और मान्यताएं वही हैं, क्योंकि हम मुस्लिम हैं. एक बदलाव जो आया है, वो ये है कि हम अब अधिक अनुभवी और पहले से बहुत ज्यादा ताकतवर हैं.
अलकायदा ने 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका पर आतंकी हमला किया. 20 सितंबर को तत्कालीन राष्ट्रपति बुश ने आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक जंग का ऐलान करते हुए कहा था कि ये जंग अल-कायदा से शुरू होगी, लेकिन वहीं खत्म नहीं होगी. सात अक्टूबर 2001 को अमेरिका ने अफगानिस्तान में सैन्य अभियान लॉन्च किया. जिसका मकसद अल-कायदा के ठिकानों को नष्ट करने के साथ उसे पनाह देने वाले 'तालिबान' की सैन्य ताकत खत्म करना था.
तालिबान को घुटनों पर लाने में मुश्किल से सवा महीने का वक्त लगा. वो सैन्य रूप से तो खत्म हो गया लेकिन उसकी पीढ़ियों पुरानी विचारधारा इतनी मजबूत थी कि तालिबान ने महज 20 सालों में अपनी लकीर और दायदा इतना बड़ा कर लिया कि वो बिना एक चवन्नी खर्च किये और बिना एक बंदूक किसी को दिए कई कट्टरपंथी गिरोहों का वैचारिक सरपरस्त और मेंटर बन गया.

आगे इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि तालिबान ने खुद को इतना मजबूत करके 15 अगस्त, 2021 को ऐसा दमदार कमबैक किया कि सुपरपावर अमेरिका को बकायदा एक समझौता करके अपने हथियारों का जखीरा और मिलिट्री हेलीकॉप्टर छोड़कर वहां से निकलना पड़ा.
तालिबान की विचारधारा ट्रंप की नाक के नीचे यानी उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के देशों तक कैसे पहुंची, इसने पूर्वी अफ्रीका में अपनी जड़े कैसे जमाई, इसकी कहानी आइए हम आपको एकदम एक्सक्लूसिव रूप से बताते हैं.
बीबीसी में प्रकाशिक एक रिपोर्ट के मुताबिक हैती, पेरू से लेकर केन्या में तालिबान के चाहने वाले मौजूद हैं. इन देशों में मौजूद आधा दर्जन से अधिक हथियारबंद संगठनों के आका जो तालिबान को महान योद्धाओं का संगठन मानकर उसे विजेता के रूप में देखते हैं. उनकी भी सोशल मीडिया पर फैन फॉलोइंग लाखों में हैं.
आपके दिमाग में भी एक सवाल आया होगा कि उत्तरी अमेरिका के पास स्थित देश हैती, दक्षिण अमेरिका के पास स्थिति पेरू में आखिर 'तालिबान' क्या कर रहे हैं? यहां कुछ हथियारबंद समूहों ने न सिर्फ अपना नाम तालिबान रखा है, बल्कि उनके ऐसे कपड़े और चप्पल/जूतियों को पहनकर उनकी स्टाइल में बंदूकों को हवा में लहराकर ताबड़तोड़ फायरिंग करने को अपना स्टाइल स्टेटमेंट बना लिया है.
हैती, पेरू और केन्या तक न सिर्फ इनकी वैचारिक मौजूदगी है बल्कि अपने देश की सरकारों और सिस्टम को चुनौती देने वाले इन लोगों ने कई दीवारों को ब्रश उठाकर तालिबान के नाम और उसकी विचारधारा का गुणगान किया है.
इन लोगों ने सिर्फ तालिबान का नाम ही नहीं अपनाया है, बल्कि उनसे अपना नाता जोड़ने के लिए आईकार्ड तक छपवा लिए हैं. इंटरनेशनल फाउंडेशन फॉर इंटरनेशनल एंड ट्रांसनेशनल क्राइम में हैती और कैरिबियन रीजन मॉनिटरिंग के हेड रोमन लो के मुताबिक, हैती में बागियों के गुटों की तादात 150 से 200 के बीच है. हर ग्रुप में बच्चों समेत 8,000 से 20,000 मेंबर होने का अंदाजा है. इसलिए हमने भी एक जिम्मेदार मीडिया हाउस होने के नाते इस आईकार्ड का चेहरा छिपा दिया है. क्योंकि इसे नाबालिग होने का अनुमान लगाया गया था.

हालांकि हमने जानबूझकर इस मेंबर का चेहरा ढक लिया है. लेकिन ऐसे एक दो नहीं सैकड़ों लोग हैं जो अफगानिस्तान के तालिबान से खुद को जोड़ने के लिए बीते 20 सालों से कई तरह के जतन कर रहे हैं. जी हां सिर्फ 20 साल में तालिबान ने न सिर्फ अफगानिस्तान से अमेरिका को रुखसत किया बल्कि अपनी विचारधारा की जड़े अमेरिका महाद्वीप तक पहुंचा दीं.
इन लोगों के काम-काज का तरीका भी तालिबान से डिट्टो यानी हूबहू मेल खाता है. तालिबान ने अफगानिस्तान में लड़कियों और महिलाओं की पढ़ाई-लिखाई और काम-काज बंद कराया. हैती, पेरू और केन्या में पैदा हुए और पनपे ये कथित 'नव'तालिबान भी महिलाओं को सदियों पुरानी व्यवस्था की तरह चारदीवारी यानी बंद कमरों के पीछे कैद करके रखना चाहते हैं.
संयुक्त राष्ट्र संघ की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक बीते कुछ महीनों में हैती के हथियारबंद बागियों और लड़ाकों की हिंसा में 5,700 से ज्यादा लोग मारे गए या घायल हुए हैं. इसी दौरान 2,30,000 से ज्यादा लोगों को किडनैप किया गया है. इसी अंदाजे से दावा किया जा रहा है कि हैती में इस तालिबान लवर्स से कम से कम 1,000 औरतों और लड़कियों के साथ बलात्कार और गैंगरेप जैसी घटनाओं को अंजाम दिया है.
ये लोग सिविलियंस की तरह सामान्य कपड़े पहनने के साथ हाथों में हथियार रखते हैं, इनका अपना एफएम चैनल है जिसके गानों में तालिबान शब्द का खूब इस्तेमाल होता है. इनके अपने रैपर्स और सिंगर्स हैं जिन्होंने कई पॉप गानों में तालिबान का इस्तेमाल किया है. दरअसल 3 साल पहले, तालिबान ग्रुप ने मिराबेल में एक रेडियो स्टेशन पर कब्जा कर लिया और उसका नाम बदलकर ‘तालिबान FM’ कर दिया. इस रेडियो के जरिए, उन्होंने अपना प्रोपेगैंडा और अपने लीडर जेफ गोव के भाषणों का प्रसारण किया.
हैती की एक ऑनलाइन मीडिया आउटलेट के संपादक के मुताबिक हैती में मौजूद तालिबान को भले ही असली तालिबान से फंडिंग या आदेश न मिलते हों फिर भी इन्होंने अफगानिस्तान तालिबान को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के हर पहलू में ढ़ालने की कोशिश की है. उनका मानना है कि अफगान तालिबान बागी और बहादुर लोगों का संगठन है जो दुनिया में किसी से भी नहीं डरता. इसीलिए उन्होंने अपने लिए तालिबान नाम चुना. हैती के तालिबान ग्रुप के लीडर जेफ ग्वेरा के टिकटॉक अकाउंट पर लाखों फॉलोवर्स हैं.
करीब सवा करोड़ आबादी वाला देश हैती आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है. बीते एक दशक से वहां चुनाव नहीं हुए हैं. पांच साल पहले यहां के प्रेसिडेंट की हत्या कर दी गई थी. तब से ये हथियारबंद लोग अपनी अलग सरकार चला रहे हैं.
इन बागी संगठनों में जिनमें से अधिकांश तालिबान लवर्स हैं, उन्होंने हैती सरकार का सिर दर्द बढ़ा दिया है. इन विद्रोहियों का हैती की राजधानी पोर्ट-ऑ-प्रिंस के 80 फीसदी हिस्से पर कब्जा है. इनमें से एक ग्रुप के लीडर ने तो हैती की सीनेट के लिए भी चुनाव लड़ा और जीत कर संसद में परचम लहरा दिया.
पुलिस उनके इलाकों में जा नहीं सकती, इसलिए अपना अलग कानून चला रहे हैं. ‘इंटरनेशनल एयरपोर्ट्स बंद पड़ा है. कोई देश वहां हवाई जहाज उतार कर इन पर फिलहाल काबू नहीं कर सकता. शायद इसलिए इन संगठनों के लड़ाके खुल्लमखुल्ला तालिबान को अपनी पहचान और आन-बान-शान बताते हैं.
दक्षिण अमेरिकी देश पेरू में ‘लॉस तालिबान’ एक हिंसक गैंग है, जो ट्रूजिलो शहर में एक्टिव है. ये संगठन बड़ी ट्रांसपोर्ट कंपनियों और कारोबारियों से रंगदारी वसूलता है. छोटे दुकानदारों और ड्राइवरों से हफ्तावसूली करता है. ये ग्रुप हथियारों की तस्करी में भी शामिल रहा है. पेरू पुलिस ने पिछले साल ग्रुप के सदस्यों की गिरफ्तारी करके इनके एक सब-नेटवर्क को खत्म करने की खबर दी थी.
केन्या में भी इस तरह के संगठन मौजूद हैं, जिनके लड़ाके तालिबान को अपना आदर्शन मानते हैं. केन्या और पेरू दोनों देशों में ऐसे हथियारबंद लड़ाकों की गतिविधियां हैती के ‘तालिबान’ जैसे विद्रोही ग्रुप के कामों से मिलती-जुलती हैं.
ऐसे में भारत समेत पूरी दुनिया के देशों में रह रहे शांतिप्रिय लोगों के लिए ये एक गंभीर चिंता की बात है कि तालिबान की विचारधारा और पहचान अब उन लोगों ने अपना ली है जो बंदूकों के जोर पर किसी भी लोकतंत्र या कानून को नहीं मानते.
इनकी करतूतों से दुनिया अनजान नहीं है. समय-समय पर इनके पर भी कतरे जाते हैं मगर ये लोग मुख्यधारा में लौटने को राजी नहीं है.