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भारत में इंजीनियरिंग अभी भी सबसे लोकप्रिय प्रोफेशनल डिग्रियों में शामिल है. देश के उच्च शिक्षा तंत्र में इंजीनियरिंग & टेक्नोलॉजी का बड़ा हिस्सा है. AISHE के आंकड़े बताते हैं कि इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या करोड़ों में नहीं, बल्कि लाखों में है और हर साल बड़ी संख्या में विद्यार्थी BE/BTech पूरा करते हैं. सरकार की AISHE व्यवस्था देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिले, परीक्षा परिणाम और आउटटर्न का डेटा जुटाती है.
हालांकि, यहां एक फर्क समझना जरूरी है. इंजीनियरिंग में दाखिला लेने वाले, सीटों पर एडमिशन लेने वाले और चार साल बाद डिग्री हासिल करने वाले छात्रों की संख्या एक जैसी नहीं होती. बीच में ड्रॉपआउट, ब्रांच बदलना, बैकलॉग और अन्य कारणों से संख्या बदलती रहती है. नीति आयोग के हालिया विश्लेषण में BE/BTech की employability 2026 में करीब 70.2% आंकी गई है. यानी डिग्री हासिल करना और नौकरी के लिए पूरी तरह तैयार होना दो अलग बातें हैं.
कितनी सीटें खाली रह जाती हैं?
इंजीनियरिंग शिक्षा के सामने सबसे बड़ी समस्या सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि सीटों का खाली रह जाना भी है. संसद में सरकार द्वारा दिए गए आंकड़ों के मुताबिक AICTE से मंजूर अंडरग्रेजुएट इंजीनियरिंग सीटों में 2017-18 में 14.66 लाख सीटों में से करीब 7.22 लाख सीटें खाली थीं. 2021-22 में कुल स्वीकृत intake 12.53 लाख था और 4.21 लाख सीटें खाली रह गई थीं.
इसका मतलब यह नहीं कि हर कॉलेज में सीटें खाली हैं. अच्छे संस्थानों और लोकप्रिय ब्रांचों में मुकाबला बहुत ज्यादा है, जबकि कई कम मांग वाले निजी संस्थानों और कोर ब्रांच में सीटें भरना चुनौती बन जाता है. 2024-25 में भी इंजीनियरिंग सीटों में बड़ी बढ़ोतरी हुई, खासकर कंप्यूटर साइंस और एआई से जुड़े प्रोग्रामों में.
IIT-NIT-IIIT और प्राइवेट कॉलेजों में कितना अंतर?
इंजीनियरिंग की डिग्री का परिणाम कॉलेज की गुणवत्ता और ब्रांड से काफी प्रभावित होता है. 2025 में JoSAA के माध्यम से आईआईटी, एनआईटी, आईआईआईटी और जीएफटीआई इकाइयों में कुल 62,853 इंजीनियरिंग सीटें थीं. इनमें आईआईटी की 18,160, एनआईटी की 24,525, आईआईआईटी की 9,940 और अन्य जीएफटीआई की 10,228 सीटें थीं.
इसके मुकाबले देश के हजारों निजी इंजीनियरिंग कॉलेज बहुत बड़ी संख्या में छात्रों को डिग्री देते हैं. इसलिए IIT-NIT-IIIT से निकलने वाले इंजीनियरों की संख्या कुल इंजीनियरिंग कॉलेजों का छोटा हिस्सा है, लेकिन इन इकाइयों की औसत प्लेसमेंट विजिबिलिटी और सैलरी आउटकम अक्सर बेहतर होते हैं. इसका सबसे बड़ा कारण बेहतर कैंपस रिक्रूटमेंट, एलुमनाई नेटवर्क, इंडस्ट्री एक्सपोजर और चयन की प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया है.
क्या हर इंजीनियर को कैंपस प्लेसमेंट मिलती है?
डिग्री का मतलब कैंपस प्लेसमेंट की होगी नहीं है. परिसर प्रिंटिंग का स्तर संस्थान, ब्रांच, बैच, लोकेशन और उस साल की कंपनियों की हायरिंग पर निर्भर करता है. डेलॉइट की कैंपस वर्कफोर्स ट्रेंड्स रिपोर्ट बताती है कि कंपनियां अब केवल डिग्री नहीं, बल्कि स्किल्स, इंटर्नशिप और रोल-स्पेसिफिक क्षमताओं को ज्यादा महत्व दे रही हैं. इंजीनियरिंग डिग्री में कंपनसेशन ग्रोथ भी पिछले सालों में पॉजिटिव रही है.
इसलिए किसी एक राष्ट्रीय प्रतिशत को सभी इंजीनियरिंग पर लागू करना सही नहीं होगा. IIT या टॉप प्राइवेट कॉलेज का प्लेसमेंट रेट किसी छोटे शहर के कॉलेज से काफी अलग हो सकता है. यही कारण है कि नौकरी के आंकड़े देखते समय कॉलेज-वाइज प्लेसमेंट रिपोर्ट को देखना जरूरी है.
क्या इंजीनियर अपनी पढ़ाई से अलग नौकरी करते हैं?
यह इंजीनियरिंग की सबसे बड़ी पहेलियों में से एक है. बहुत से इंजीनियर IT, सेल्स, बैंकिंग, ऑपरेशंस, कंसल्टिंग, गवर्नमेंट एग्जाम्स, एजुकेशन या दूसरे क्षेत्रों में चले जाते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी इंजीनियरिंग डिग्री बेकार हो गई. इंजीनियरिंग में प्रॉब्लम-सॉल्विंग, मैथमेटिक्स, एनालिटिकल थिंकिंग और टेक्निकल अंडरस्टैंडिंग जैसी कैपेसिटीएं दूसरे क्षेत्रों में भी काम आती हैं.
लेकिन अगर कोई ग्रेजुएट अपनी कोर इंजीनियरिंग नॉलेज का इस्तेमाल नहीं कर पाता, तो यह एजुकेशन और इंडस्ट्री डिमांड के बीच गैप का संकेत भी हो सकता है. NITI आयोग ने BE/BTech एम्प्लॉयबिलिटी में सुधार के बावजूद पेडागॉजी, लैब्स और इंडस्ट्री एक्सपोजर को मजबूत करने की जरूरत बताई है.
शुरुआती सैलरी कितनी है?
इंजीनियर की शुरुआती सैलरी को लेकर एक सामान्य आंकड़ा देना बताता हो सकता है. कॉलेज, ब्रांच, शहर, कंपनी और स्किल्स के हिसाब से पैकेज में बड़ा अंतर है. डेलॉइट के 2026 कैंपस हायरिंग एनालिसिस के अनुसार टॉप-10 इंस्टीट्यूट के बीटेक ग्रेजुएट्स की मीडियन कंपनसेशन करीब ₹18.7 लाख थी, जबकि टियर-3 इंस्टीट्यूट में यह करीब ₹5.75 लाख थी. यानी इंस्टीट्यूट टियर के हिसाब से करीब 3.3 गुना का अंतर दिखता है.
यह आंकड़ा यह भी बताता है कि सिर्फ 'बीटेक' लिखे होने से सैलरी तय नहीं होती. कॉलेज की रेप्युटेशन, टेक्निकल स्किल्स, इंटर्नशिप, कम्युनिकेशन और चुनी गई स्पेशलाइजेशन का असर काफी बड़ा है.
कौन-सी ब्रांच सबसे आगे है?
आज के समय में कंप्यूटर साइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस, साइबर सिक्योरिटी और संबंधित डिजिटल स्किल्स की मांग मजबूत है. इंडिया स्किल्स रिपोर्ट के आंकड़ों में कंप्यूटर साइंस और आईटी ग्रेजुएट्स की एम्प्लॉयबिलिटी मजबूत दिखती है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिकल जैसे क्षेत्रों में भी अच्छी ग्रोथ बनी हुई हैं.
डेलॉइट के हालिया कैंपस हायरिंग एनालिसिस के अनुसार AI डेवलपमेंट, साइबर सिक्योरिटी, डेटा साइंस और इंडस्ट्री 4.0 जैसी स्किल्स पर 20-25% तक स्किल प्रीमियम देखने को मिल रहा है. इंजीनियरिंग में डेटा साइंस और AI स्पेशलाइजेशन को भी सैलरी प्रीमियम मिल रहा है.
Civil, Mechanical और Electrical के सामने क्या चुनौती है?
इसका मतलब यह नहीं है कि सिविल, मैकेनिकल या इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग खत्म हो रही हैं. असल में बदलाव यह है कि इन ब्रांच में भी टेक्नोलॉजी तेज़ी से शामिल हो रही है. सिविल इंजीनियर्स के लिए स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, BIM, GIS और AI-बेस्ड प्लानिंग; मैकेनिकल के लिए रोबोटिक्स, ऑटोमेशन, EV और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग; जबकि इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स के लिए रिन्यूएबल एनर्जी, बैटरी, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी जैसे नए एरिया खुल रहे हैं.
यानी कोर इंजीनियरिंग की जगह खत्म होने के बजाय कोर + टेक्नोलॉजी का मॉडल तेज़ी से महत्वपूर्ण हो रहा है.
AI, Data और Cybersecurity की मांग कितनी बढ़ रही है?
AI अब सिर्फ सॉफ्टवेयर कंपनियों तक लिमिटेड नहीं है. मैन्युफैक्चरिंग, बैंकिंग, हेल्थकेयर, ऑटोमोबाइल, लॉजिस्टिक्स, एजुकेशन और एनर्जी जैसे क्षेत्रों में भी AI का इस्तेमाल बढ़ रहा है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2030 तक AI, रोबोटिक्स, ऑटोनॉमस सिस्टम और एनर्जी टेक्नोलॉजीज रोजगार बाजार को प्रभावित करने वाले प्रमुख टेक्नोलॉजी ट्रेंड्स में शामिल हैं. बिग डेटा, AI/ML और सिक्योरिटी से जुड़े रोल्स तेजी से बढ़ने वाले जॉब कैटेगरी में हैं.
मर्सर | मेटल के 2025 ग्रेजुएट स्किल इंडेक्स में 46.1% ग्रेजुएट्स को AI & ML रोल्स के लिए एम्प्लॉयेबल बताया गया. यह आंकड़ा बताता है कि डिमांड तो बढ़ रही है, लेकिन हर ग्रेजुएट अभी उस डिमांड को पूरा करने के लिए तैयार नहीं है.
डिग्री के बाद स्किल टेस्ट में कितने पीछे हैं?
यह इंजीनियरिंग रोजगार की सबसे अहम समस्या है. मर्सर | मेटल ने 2,700 से ज्यादा कैंपस और 10 लाख से ज्यादा स्टूडेंट्स के असेसमेंट के आधार पर बताया कि सिर्फ 42.6% भारतीय ग्रेजुएट्स ओवरऑल एम्प्लॉयेबल पाए गए. एम्प्लॉयर्स अब टेक्निकल नॉलेज के साथ क्रिटिकल थिंकिंग, कम्युनिकेशन, एडैप्टेबिलिटी और लर्निंग एजिलिटी को भी इंपॉर्टेंस दे रहे हैं.
दूसरी ओर NITI आयोग के ग्लोबल एम्प्लॉयबिलिटी टेस्ट बेस्ड आंकड़ों में BE/BTech एम्प्लॉयबिलिटी 2025 में 71.5% और 2026 में 70.2% दर्ज की गई. दोनों आंकड़े अलग-अलग मेथडोलॉजी इस्तेमाल करते हैं, इसलिए उन्हें सीधे तुलना करना सही नहीं होगा. लेकिन दोनों का मैसेज एक है डिग्री के साथ जॉब-रेडी स्किल्स जरूरी हैं.

AI किन नौकरियों को प्रभावित करेगा?
AI सबसे पहले उन कामों को प्रभावित कर सकता है जिनमें रिपिटिटिव कोडिंग, बेसिक टेस्टिंग, रूटीन डॉक्यूमेंटेशन, डेटा प्रोसेसिंग और स्टैंडर्ड एनालिसिस ज्यादा है. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. AI इंजीनियर, ML इंजीनियर, डेटा साइंटिस्ट, AI प्रोडक्ट मैनेजर, साइबर सिक्योरिटी स्पेशलिस्ट, MLOps इंजीनियर और AI-इनेबल्ड डोमेन एक्सपर्ट्स जैसे नए रोल भी बन रहे हैं.
इसलिए सवाल यह नहीं है कि AI इंजीनियर की नौकरी खत्म होगी या नहीं. बड़ा सवाल यह है कि AI इस्तेमाल करने वाला इंजीनियर, AI न इस्तेमाल करने वाले इंजीनियर की जगह कितनी तेज़ी से लेगा.
क्या कॉलेज और कंपनियों के बीच गैप है?
हाँ, यह गैप अभी भी बड़ी चुनौती है. कई इंजीनियरों में सिलेबस तेज़ी से बदल रहा है इंडस्ट्री टूल्स के मुकाबले पीछे रह जाता है. NITI आयोग ने भी BE/BTech और STEM एम्प्लॉयबिलिटी में सुधार की धीमी गति का ज़िक्र करते हुए बेहतर पेडागॉजी, अपडेटेड लेबोरेटरी इक्विपमेंट और इंडस्ट्री-लिंक्ड अप्रेंटिसशिप/इंटर्नशिप की ज़रूरत बताई है.
आज कंपनी को सिर्फ़ यह नहीं चाहिए कि स्टूडेंट ने चार साल में कौन-कौन से सब्जेक्ट्स पढ़े. कंपनी यह देखना चाहती है कि वह रियल-वर्ल्ड प्रॉब्लम सॉल्व कर सकती है या नहीं.
अगले 5-10 साल में कहां होंगे मौके?
आने वाले सालों में इंजीनियर के लिए मौके सिर्फ़ IT तक लिमिटेड नहीं रहने वाले हैं. AI, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, बैटरी टेक्नोलॉजी, रिन्यूएबल एनर्जी, रोबोटिक्स, इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन, साइबर सिक्योरिटी, डिफेंस टेक्नोलॉजी और ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में इंजीनियर की भूमिका बढ़ सकती है.
WEF के अनुसार भारत में कंपनियां AI, रोबोटिक्स और ऑटोनॉमस सिस्टम के साथ एनर्जी टेक्नोलॉजीज में निवेश बढ़ाने की योजना बना रही हैं. 35% कंपनियां सेमीकंडक्टर और कंप्यूटिंग टेक्नोलॉजीज को बिजनेस बदलने वाला क्षेत्र मानती हैं.
तो इंजीनियरिंग का भविष्य क्या है?
भारत में इंजीनियरिंग की कहानी सिर्फ 'बहुत सारे इंजीनियर बन रहे हैं' तक सीमित नहीं है. असली कहानी है मात्रा से क्वालिटी की ओर बदलाव. देश में बड़ी संख्या में सीटें हैं, लेकिन सभी सीटें समान क्वालिटी, एक्सपोजर और प्लेसमेंट नहीं देतीं. टॉप इंस्टीट्यूट्स में कॉम्पिटिशन और सैलरी दोनों ज्यादा हैं, जबकि कई अन्य इंजीनियरिंग में स्टूडेंट्स को डिग्री के बाद खुद के स्किल्स और मौके तलाशनी पड़ती हैं.
AI के दौर में इंजीनियरिंग की वैल्यू खत्म नहीं हो रही, बल्कि उसकी परिभाषा बदल रही है. आने वाला इंजीनियर सिर्फ एक ब्रांच का ग्रेजुएट नहीं होगा. उसे अपने कोर सब्जेक्ट के साथ AI टूल्स, डेटा, कम्युनिकेशन, प्रॉब्लम-सॉल्विंग और कंटीन्यूअस लर्निंग को भी अपनाना होगा. यही कॉम्बिनेशन अगले दशक में तय करेगा कि इंजीनियरिंग की डिग्री सिर्फ एक क्वालिफिकेशन बनके रह जाती है या बेहतर करियर का मजबूत रास्ता बनता है.