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'नया बैटलग्राउंड, बजा जंग का महासाउंड': लाल सागर में खून की नदियां बहाने की तैयारी, बारूद के ढेर पर बैठा हॉर्न ऑफ अफ्रीका

इथियोपिया रेड सी तक सीधी पहुंच और बंदरगाहों पर कब्जे चाहता है. इसी को लेकर इथियोपिया और इरिट्रिया के बीच तनाव बढ़ गया है और दोनों ने राजनयिक संबंध भी तोड़ दिए हैं. इसी के साथ 2018 की ऐतिहासिक पीस डील खत्म हो गई है. अब यह विवाद अन्य क्षेत्रीय विवादों से जुड़कर हॉर्न ऑफ अफ्रीका और लाल सागर में खतरनाक मोड़ ले रहा है.

Written By Rachit Kumar
Published: Oct 06, 2026, 08:39 AM IST | Updated: Oct 06, 2026, 09:19 AM IST
Image Credit: इरिट्रिया और इथियोपिया के बीच तनाव चरम पर है.
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रेड सी तक पहुंच और बंदरगाह पर कब्जे को लेकर इथियोपिया और इरिट्रिया के बीच तनाव चरम पर है. दोनों देशों ने एक-दूसरे के साथ राजनयिक संबंध खत्म कर दिए हैं. इथियोपिया ने कुछ दिन पहले इरिट्रिया की राजधानी अस्मारा में अपना दूतावास बंद कर दिया और इरिट्रिया के 10 राजनयिकों को 48 घंटे के भीतर देश छोड़ने का आदेश दिया. इथियोपिया ने इरिट्रिया पर दुश्मनी और आक्रामकता वाले कामों का आरोप लगाया, जिनसे इथियोपिया की नेशनल सिक्योरिटी के लिए सीधा खतरा पैदा होता है.

इरिट्रिया और इथियोपिया पूर्वी अफ्रीका के हॉर्न ऑफ अफ्रीका इलाके में स्थित हैं. इरिट्रिया पूर्वी अफ्रीका के लाल सागर के पास है. यहां इसकी सीमाएं दक्षिण में इथियोपिया से, वेस्ट में सूडान से और दक्षिण-पूर्व में सूडान से मिलती हैं. वहीं, हॉर्न ऑफ अफ्रीका का सबसे बड़ा देश है इथियोपिया, जो एक लैंडलॉक्ड कंट्री है.

क्या खत्म हो गई पीस डील?

इस दरार के साथ ही वह 'पीस डील' खत्म हो गई है, जो कुछ समय से कमजोर पड़ रही थी. इथियोपिया इसे इरिट्रिया, सूडान और मिस्र का मिलकर चलाया जा रहा एक दुश्मनी भरा अभियान बता रहा है. हालांकि, ये देश इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कह रहे हैं कि इनका संबंध इथियोपिया के सिविल वॉर और समुद्र तक पहुंचने की उसकी कोशिशों से है.

यह तकरार ब्लू नाइल रिवर के विवाद, सूडान के सिविल वॉर और रेड सी (लाल सागर) में बढ़ते तनाव के बीच बनी हुई है. इन सभी को मिलाकर 'हॉर्न ऑफ अफ्रीका' में संघर्ष का एक नया मोर्चा बनने की संभावना पैदा हो गई है, जिसका असर अरब देशों पर भी पड़ सकता है.

इससे पहले, उत्तर में सेना और हथियारबंद गुटों के नए गठबंधन के बीच एक हफ्ते तक लड़ाई चली थी. इस गठबंधन में 'टिग्राय पीपल्स लिबरेशन फ्रंट' (TPLF) की सेना और टिग्राय ( इथियोपिया का सबसे उत्तरी प्रदेश), अफार और अम्हारा इलाकों के सहयोगी गुट शामिल हैं. इस बारे में आपको आगे बताएंगे. लेकिन पहले इतिहास की कुछ बातें खंगाल लेते हैं.

1993 में इरिट्रिया को मिली थी आजादी

लंबे संघर्ष के बाद 1993 में इरिट्रिया इथियोपिया से आजाद हुआ था. बाद में, 1998 से 2000 के बीच दोनों देशों के बीच सीमा को लेकर जंग चली, जिसमें हजारों लोग मारे गए और दोनों देशों के संबंध कई सालों तक ठंडे बस्ते में रहे.

2018 में एक बड़ी कूटनीतिक सफलता तब मिली, जब इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबिय अहमद और इरिट्रिया के राष्ट्रपति इसायस अफवेर्की ने संबंध बहाल किए और आधिकारिक तौर पर अपने देशों के बीच जंग खत्म की. इसके बाद सीमा फिर से खुल गई और अलग हुए परिवार एक-दूसरे से मिल पाए. इस सुलह की वजह से ही अहमद को 2019 का नोबेल शांति पुरस्कार मिला था. 2018 के इसी शांति समझौते का ही जिक्र करते हुए अमेरिका ने शनिवार को दोनों सरकारों से बातचीत फिर से शुरू करने का अनुरोध किया है.

हालिया विवाद क्यों सबसे गंभीर?

2022 में प्रिटोरिया समझौते से टिग्राय जंग खत्म होने के बाद से ये हालिया लड़ाई सबसे गंभीर मानी जा रही है. उस जंग में अनुमानित 6 लाख लोग मारे गए थे. अभी तक इस हालिया लड़ाई में इरिट्रिया की भूमिका का कोई सबूत नहीं मिला है, हालांकि जानकारों का कहना है कि ऐसा हो सकता है. संबंध टूटने से पहले बीबीसी को दिए एक बयान में, इरिट्रिया के सूचना मंत्री येमाने गेब्रेमेस्केल ने इसमें शामिल होने से इनकार किया और इथियोपिया की सत्ताधारी प्रॉस्पेरिटी पार्टी पर आरोप लगाया कि वह अपनी घरेलू समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए पड़ोसियों पर दोष मढ़ रही है.

2020-22 की जंग में ये दोनों देश सहयोगी थे, जब इरिट्रिया की सेना ने TPLF के खिलाफ फेडरल सेनाओं के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी थी. तब से दोनों देशों के रिश्ते खराब हो गए हैं, जिसकी मुख्य वजह इथियोपिया की रेड सी तक सीधी पहुंच हासिल करने की कोशिश है. 1993 में इरिट्रिया के आजाद होने पर इथियोपिया के हाथ से यह एडवांटेज चला गया था.

कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस की विजिटिंग स्कॉलर और अमेरिकी विदेश विभाग की पूर्व अधिकारी लेस्ली ऐनी वार्नर ने अरब न्यूज को बताया, '2018 में रिश्तों में सुधार किसी साझा एजेंडे के बजाय एक साझा दुश्मन की वजह से हुआ था. अहमद और इसायस ने तब रिश्ते नॉर्मल किए जब दोनों TPLF को खतरा मानते थे और यह सोच 2020 की लड़ाई के दौरान भी बनी रही, जब इरिट्रिया की सेना ने संघीय सेना के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी.'

कहां से बिगड़ा मामला?

उन्होंने आगे कहा, 'यह तब बिगड़ा जब प्रिटोरिया ने इरिट्रिया को उस समझौते से बाहर रखा, जिसके लिए उसने लड़ाई में मदद की थी, और इरिट्रिया को लगा कि टिग्राय में शांति से वह अनसेफ हो गया है. इसके बाद रेड सी तक पहुंच को लेकर तनावपूर्ण साझेदारी एक रणनीतिक विवाद में बदल गई.'

अबी ने बार-बार कहा है कि समुद्र तक पहुंच इथियोपिया के आर्थिक और सुरक्षा हितों के लिए जरूरी है. उन्होंने इसके लिए सेना उतारने की संभावना से भी इनकार नहीं किया है. इसमें इरिट्रिया के असब बंदरगाह पर कब्जा करना भी शामिल है.

वार्नर ने कहा, 'अफार में टिग्राय इलाके के हमले से एक दशक से भी कम समय में दूसरी बार यह बात साफ हो गई है कि अहमद समुद्र तक पहुंच को अस्तित्व के लिए क्यों जरूरी मानते हैं. इथियोपिया का कारोबार जिबूती जाने वाले एक ही कॉरिडोर से होता है और वह कॉरिडोर ऐसे इलाके से गुजरता है, जिस पर हथियारबंद गुट कब्जा करने की कोशिश कर सकते हैं.'

समुद्री तट चाहता है इथियोपिया

अहमद ने इथियोपिया के समुद्र तट को खोने को एक ऐतिहासिक 'गलती' बताते हुए कहा कि इसे सुधारा जाएगा. वार्नर ने कहा कि इरिट्रिया और दूसरी जगहों पर इस बात को अच्छी तरह समझा जाता है कि यह बात असब बंदरगाह को ध्यान में रखकर कही गई है.

उन्होंने कहा, 'हर बार जब खतरा पैदा होता है, तो पहुंच के अलग-अलग रास्ते बनाने की बात और मजबूत हो जाती है.' उन्होंने समझाया कि यह सोच देश के साझा इतिहास से जुड़ी पुरानी शिकायतों पर आधारित है.'

जिबूती बंदरगाहों पर टिकी इथियोपिया की इकोनॉमी

इथियोपिया का 90 प्रतिशत से ज्यादा इंपोर्ट और एक्सपोर्ट जिबूती के बंदरगाहों से होता है, जिस पर हर साल अरबों डॉलर का खर्च आता है. इसलिए, मब्रुक ने कहा, 'इरिट्रिया के लोगों को चिंता है कि फिर से इथियोपिया उनके इलाके पर कब्जा करने की कोशिश करेगा.'

लाल सागर से दुनिया का लगभग 15 प्रतिशत समुद्री कारोबार और लगभग 30 प्रतिशत कंटेनर ट्रैफिक गुजरता है. यमन में सिविल वॉर के फिर से शुरू होने और अरब प्रायद्वीप और हॉर्न ऑफ अफ्रीका के बीच मौजूद अहम रास्ते, बाब अल-मंदाब के आसपास हूथी विद्रोहियों के आगे बढ़ने के कारण यह इलाका पहले से ही तनाव में है. इससे यह डर फिर से पैदा हो गया है कि दोनों किनारों पर चल रहे संघर्ष आपस में जुड़ सकते हैं.

इथियोपिया का मिस्र से भी बढ़ा तनाव

इथियोपिया ने मिस्र के साथ भी तनाव बढ़ा दिया है. पिछले गुरुवार को उसने मिस्र के कम से कम एक राजनयिक को 'पर्सोना नॉन ग्राटा' (अनवॉन्टेड पीपल) घोषित कर दिया और उसे 48 घंटे में देश छोड़ने का आदेश दिया था. इथियोपिया का आरोप है कि मिस्र उसके विरोधियों का समर्थन कर रहा है या लाल सागर में उसकी कोशिशों में रुकावट डाल रहा है. वह मिस्र को एक 'रणनीतिक रुकावट डालने वाला' मुल्क बताता है, जो इथियोपिया को जमीन से घिरे देश (बिना समुद्री तट वाले देश) के तौर पर ही बनाए रखना चाहता है. साथ ही, वह 'ग्रैंड इथियोपियन रेनेसां डैम' (GERD) के विवाद को सीधे लाल सागर की राजनीति से जोड़ता है.

डैम की लड़ाई में उलझे तीन देश

मिस्र, सूडान और इथियोपिया एक दशक से भी ज्यादा वक्त से 'ग्रैंड इथियोपियन रेनेसां डैम' को लेकर जल-कूटनीति की लड़ाई में उलझे हुए हैं. ब्लू नाइल (नील नदी) पर बना यह 5 अरब डॉलर का प्रोजेक्ट है, जिसके जलाशय का आकार लगभग ग्रेटर लंदन जितना बड़ा है. इथियोपिया इसे अपनी आर्थिक तरक्की और ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता के लिए बहुत जरूरी मानता है, जबकि मिस्र और सूडान इसे नदी के बहाव और मिस्र को मिलने वाले नील नदी के सालाना 55.5 अरब क्यूबिक मीटर पानी के हिस्से के लिए अस्तित्व का खतरा मानते हैं.

इस बांध का उद्घाटन सितंबर 2025 में हुआ था, फिर भी तीनों देशों के बीच इसे भरने और सूखे के समय पानी छोड़ने के नियमों को लेकर कोई पक्का समझौता नहीं हो पाया है. तनाव तब और बढ़ गया जब इथियोपिया ने ब्लू नाइल रिवर पर तीन और बांधों, कराडोबी, मंडाया और बेको अबो, को बनाने की योजना आगे बढ़ाई. मिस्र का कहना है कि अगर बिना तालमेल के ये बांध बनाए गए, तो इससे उसके अस्तित्व पर खतरा पैदा हो जाएगा.

फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन खतरा यह है कि इथियोपिया-इरिट्रिया जंग जल्द ही इस क्षेत्र के अन्य संकटों से जुड़ सकती है.

'इथियोपिया का नेवी बनाने का फैसला अजीब'

मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट की सीनियर फेलो मिरेट माब्रुक के मुताबिर, समुद्र तक पहुंच अबी की एक बड़ी मांग है. उन्होंने अरब न्यूज को बताया, 'उन्होंने बार-बार कहा है कि वे एक नेवी बनाना चाहते हैं और अपनी नेवी क्षमता बढ़ाना चाहते हैं, जो जमीन से घिरे देश के लिए थोड़ी अजीब बात है.'

हॉर्न ऑफ अफ्रीका बनेगा तनाव का सेंटरप्वॉइंट!

माब्रुक को डर है कि अलग-अलग हितों वाले क्षेत्रीय देश भी इसमें शामिल हो सकते हैं. उन्होंने कहा, 'यह महज हॉर्न ऑफ अफ्रीका की बात नहीं है. यहां प्रॉक्सी मुकाबला  काफी उलझा हुआ जाल बन गया है. अगर यह संघर्ष में बदलता है, तो स्थिति बहुत गंभीर होगी.' उन्होंने इथियोपिया के इस कदम के समय पर भी सवाल उठाए.

उन्होंने कहा, 'अगर आप अपनी सीमा से सटे देश सूडान के खिलाफ खड़े होने जा रहे हैं, जबकि आपकी सीमा पर एक और देश इरिट्रिया के साथ पहले से ही विवाद चल रहा है, और आप मिडिल ईस्ट की सबसे बड़ी सेना वाले देश मिस्र को भी भड़काने की कोशिश कर रहे हैं, तो आपको जरूर लगता होगा कि आपको सही समर्थन हासिल है.'

दोनों इस बात पर सहमत थे कि जोखिम यह है कि संघर्ष फैल सकता है और लाल सागर में अस्थिरता बढ़ सकती है. इससे बाब अल-मंदेब और स्वेज नहर के आसपास सुरक्षा को लेकर मुश्किलें पैदा हो सकती हैं, शिपिंग में रुकावट आ सकती है और बड़े पैमाने पर लोगों को विस्थापित होना पड़ सकता है.

वहीं, वार्नर ने कहा, 'जब तक इस सिचुएशन को रोका नहीं जाता, तब तक 'हॉर्न' लाल सागर में चल रही उस मुकाबले का दक्षिणी मोर्चा बन जाएगा जो चाड-सूडान सीमा से लेकर होर्मुज स्ट्रेट तक फैली हुई है.'


 

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About the Author

रचित कुमार जी न्यूज डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर हैं. देश, दुनिया और डिफेंस की खबरों को आसान भाषा में बताने में महारत हासिल है. जी न्यूज से मई 2022 में जुड़े और शिफ्ट देखने का 12 साल से ज्यादा का अनुभव है. जी न्यूज में Best Performer अवॉर्ड भी मिल चुका है. जी न्यूज, आजतक और एबीपी न्यूज में शिफ्ट देखते हुए महामहिम, बिहार के बाहुबली सीरीज शुरू की और कई एक्सप्लेनर खबरों पर काम किया.  इंडिया न्यूज और जनसत्ता में शिफ्ट देखने के साथ-साथ ट्रैफिक लाने वाली खबरों को तवज्जो दी. नवभारत टाइम्स से करियर की शुरुआत हुई और वहां तकरीबन ढाई साल तक फ्रंट पेज 2 और देश-विदेश के पन्नों की जिम्मेदारी संभाली. जर्नलिज्म में पोस्टग्रेजुएट और IIMC से डिप्लोमा करने  वाले रचित कुमार 13 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. आप Rachit.kumar@India.com पर सीधे ईमेल कर इनसे जुड़ सकते हैं. 
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