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ग्वादर पर मचा गदर: मलक्का स्ट्रेट का बाईपास प्लान फेल, बलूचों के बारूद ने बिगाड़ा जिनपिंग का खेल

पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट और CPEC प्रोजेक्ट्स से चीन अब अपने कदम पीछे खींच रहा है. बलूच विद्रोहियों के हमले, स्थानीय लोगों के विरोध और कारोबारी विफलता के कारण अरबों डॉलर का यह प्रोजेक्ट अब चीन के लिए बोझ साबित हो रहा है.

Written By Rachit Kumar
Published: Sep 30, 2026, 09:58 AM IST | Updated: Sep 30, 2026, 10:06 AM IST
Image Credit: चीन के लिए ग्वादर पोर्ट सफेद हाथी साबित हो रहा है.
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ग्वादर पोर्ट में अब चीन के सपने ताश के पत्तों की तरह 'ढहने' लगे हैं. 59,48,61,48,00,000 रुपये के चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) की सबसे अहम कड़ी माने जाने वाले ग्वादर पोर्ट का भविष्य डगमगाने वाले 'मोड़' पर  है. ग्वादर पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी बलूचिस्तान प्रांत में, फारस की खाड़ी के मुहाने के पास और रणनीतिक रूप से अहम होर्मुज स्ट्रेट के बगल में स्थित है.

कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषणों और ऑस्ट्रेलियाई थिंक टैंक 'लोवी इंस्टीट्यूट' की हालिया रिपोर्ट ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बीजिंग चुपचाप ग्वादर बंदरगाह में किए गए अपने भारी-भरकम निवेश से पीछे हटने की तैयारी कर रहा है?

हालांकि, चीन न तो तुरंत वहां से निकलने की योजना बना रहा है और न ही अपनी 43 साल की ऑपरेशनल लीज को छोड़ रहा है. हालांकि, बहुत सारे सबूत यह बताते हैं कि चीन अपनी मौजूदगी के तरीके में बदलाव कर रहा है. दरअसल, यहां विद्रोहियों के लगातार हमलों, भौगोलिक और लॉजिस्टिक मुश्किलों और घरेलू आर्थिक सुस्ती के बीच चीन ग्वादर को मेगा कमर्शियल हब में बदलने के अपने विजन से दूर हो रहा है. 
इसके बजाय, एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि चीन अब इसे एक मजबूत सिक्योरिटी, छोटे नेवी और लॉजिस्टिक्स रीफ्यूलिंग स्टेशन में बदलने की रणनीतिक दिशा में आगे बढ़ रहा है.

ग्वादर पोर्ट: विजन Vs हकीकत

2013 में चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) को औपचारिक रूप से पेश किया गया. 2015 में इसका विस्तार किया गया. ग्वादर को एशियाई कारोबारी रास्तों के लिए एक 'गेम-चेंजर' के तौर पर दिखाया गया था. चीन ने ग्वादर पोर्ट को अपनी सबसे बड़ी 'मलक्का स्ट्रेट वाली प्रॉब्लम' का सॉल्यूशन बताया है.

चीन का ग्वादर को लेकर क्या विजन था?

चीन का करीब 80 परसेंट कच्चा तेल आयात और उसके ग्लोबल बिजनेस का एक बड़ा हिस्सा मलक्का स्ट्रेट से होकर गुजरता है. अगर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नौसैनिक नाकेबंदी या भू-राजनीतिक संघर्ष होता है, तो यह संकरा समुद्री रास्ता चीन के लिए एक घातक 'चोक पॉइंट' बन सकता है.

ग्वादर ने उसे जमीन के रास्ते एक शानदार शॉर्टकट का मौका दिया, जहां अरब सागर से आने वाले कच्चे तेल और सामान को ग्वादर में उतारा जा सकता था. साथ ही 3,000 किलोमीटर लंबे पाकिस्तानी हाईवे और रेलवे के जरिए सीधे चीन के पश्चिमी शिनजियांग प्रांत के काशगर तक पहुंचाया जा सकता था.

इस सपने को सच करने के लिए, पाकिस्तानी सरकार ने सरकारी कंपनी 'चाइना ओवरसीज पोर्ट होल्डिंग कंपनी' (COPHC) को बंदरगाह और उससे जुड़े फ्री जोन को चलाने के लिए 43 साल की लीज दी. पिछले दशक में, गहरे पानी वाले बर्थ, खारे पानी को मीठा बनाने वाले प्लांट, एक आधुनिक इंटरनेशनल एयरपोर्ट, कोयले से चलने वाले पावर प्लांट और बंदरगाह को पाकिस्तान से जोड़ने वाले आधुनिक सड़क नेटवर्क बनाने के लिए अरबों डॉलर का वादा किया गया था.

फिर भी, एक दशक से ज्यादा वक्त बीतने के बाद, ग्वादर को दक्षिण एशिया का सिंगापुर या दुबई बनाने के बड़े सपने का सामना आर्थिक और सुरक्षा से जुड़ी मुश्किल सच्चाइयों से हो गया.

चीन के पीछे हटने की खबरें क्यों आ रही हैं?

एक्सपर्ट्स ने चीन के रणनीतिक रूप से पीछे हटने के पीछे तीन मुख्य वजहें बताई हैं. पहला चीनी कर्मचारियों के लिए सुरक्षा का बढ़ता खतरा, कारोबार के लिहाज से बहुत खराब प्रदर्शन और चीन की विदेशी निवेश रणनीति में आया बड़ा बदलाव. इसमें कई फैक्टर्स शामिल हैं.

1. बलूचिस्तान में बिगड़ते हालात

लगातार बलूचिस्तानी विद्रोहियों के हमलों की वजह से ग्वादर में चीन का भरोसा टूट रहा है. बलूचिस्तान दशकों से अलगाववादी विद्रोह का सामना कर रहा है, जिसे बलूच राष्ट्रवादी समूह चला रहे हैं. उनका आरोप है कि इस्लामाबाद और बीजिंग स्थानीय लोगों को फायदा पहुंचाए बिना प्रांत के भरपूर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे हैं.

बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA), खासकर उसकी खास यूनिट 'मजीद ब्रिगेड' ने चीनी प्रोजेक्ट्स और नागरिकों को साफ तौर पर निशाना बनाया है. वे चीन को एक ऐसी साम्राज्यवादी ताकत मानते हैं जो पाकिस्तानी सरकार की मदद कर रही है. हाल के सालों में हुए बड़े हमलों ने चीनी इंजीनियरों के बीच डर और निराशा का माहौल बना दिया है.

मार्च 2024 में, भारी हथियारों से लैस BLA उग्रवादियों ने ग्वादर पोर्ट अथॉरिटी कॉम्प्लेक्स पर हिम्मत दिखाते हुए हमला करने की कोशिश की. हालांकि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने हमले को नाकाम कर दिया, लेकिन इस घटना ने साबित कर दिया कि कड़ी सुरक्षा वाली बुनियादी सुविधाएं भी खतरे में हो सकती हैं.

हमलों ने बढ़ाया डर!

अक्टूबर 2024 में कराची के इंटरनेशनल एयरपोर्ट के बाहर चीनी इंजीनियरों पर हमला किया गया. इसके अलावा, टारगेटेड सुसाइड अटैक, माइनिंग व इंफ्रास्ट्रक्चर के कामों पर बार-बार सड़क किनारे अटैक होते रहे हैं. इससे यह संदेश गया कि विद्रोही समूह बलूचिस्तान की सीमाओं से बहुत दूर भी हमला कर सकते हैं. जनवरी-फरवरी 2026 में बलूचिस्तान में हुए हमलों के दौरान सुरक्षा को लेकर हालात काफी खराब हो गए थे. इन हमलों में कई जिलों में विद्रोहियों ने एक साथ हमले किए, जिसके जवाब में हफ्तों तक जबरदस्त सैन्य कार्रवाई चली और पूरे प्रांत में सैकड़ों लोग मारे गए.

CPEC प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान ने हजारों फौजियों वाली मिलिट्री और पैरा मिलिट्री फोर्स बनाई. इसका नाम है स्पेशल सिक्योरिटी डिवीजन यानी (SSD). लेकिन फिर भी हमले नहीं रुके. चीन बार-बार सिक्योरिटी गारंटी को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर करता है.

वहीं, पाकिस्तान के अंदर निजी चीनी सुरक्षा कर्मियों को तैनात करने की चीनी अधिकारियों की मांग का इस्लामाबाद ने राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़ी चिंताओं के कारण विरोध किया है. इससे एक गतिरोध पैदा हो गया है, जिसके चलते और ज्यादा निवेश रुक गया है.

2. लॉजिस्टिक्स और भौगोलिक गलतफहमी

चीन ने माना कि ग्वादर उसके लिए कम लागत वाला माल ढुलाई और ऊर्जा का रास्ता बन सकता है. लेकिन शायद उसने भौगोलिक चुनौतियों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया.

शिनजियांग तक पहुंचने के लिए, सामान को काराकोरम हाईवे से ट्रकों के जरिए ले जाना होगा, जो दुनिया की सबसे ऊंची और खतरनाक पर्वत श्रृंखलाओं यानी हिमालय, काराकोरम और हिंदू कुश से होकर गुजरता है. इस रास्ते पर अक्सर भूस्खलन, बर्फीले तूफान, बाढ़ और भूकंप आते रहते हैं.

ग्वादर में टैंकरों से तेल उतारना, उसे प्रस्तावित पाइपलाइनों से 15,000 फीट ऊंचे पहाड़ी दर्रों से पंप करना या कंटेनर में भरे सामान को 3,000 किलोमीटर तक ट्रकों से ले जाना. इन सबमें चीन के पूर्वी तटीय बंदरगाहों तक सीधे समुद्र के रास्ते माल भेजने की तुलना में कहीं ज्यादा ऊर्जा और पैसा खर्च होता है.

कोई बंदरगाह सिर्फ ट्रांजिट ट्रेड (आवाजाही वाले कारोबार) के दम पर नहीं चल सकता. निर्यात के लिए उसे एक मजबूत स्थानीय कारोबारी क्षेत्र की जरूरत होती है. दशकों से पिछड़ेपन, पानी की भारी कमी, भरोसेमंद बिजली ग्रिड की कमी और कमजोर इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण ग्वादर की मैन्युफैक्चरिंग में टिकाऊ निवेश की क्षमताओं पर संदेह पैदा होने लगा है.

3. चीन का 'छोटा है बेहतर' वाला इन्वेस्टमेंट स्विच

चीन घरेलू आर्थिक चुनौतियों, रियल एस्टेट सेक्टर में बदलाव और बढ़ते सरकारी कर्ज का सामना कर रहा है. इसी कारण उसने BRI 1.0 के दौर से किनारा कर लिया है. यह अरबों डॉलर के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए जाना जाता था.

मौजूदा BRI 2.0 फ्रेमवर्क के तहत, जिसे चीन अब 'छोटा है बेहतर' यानी Small is Beautiful वाले फॉर्मूले पर चलता है. चीन अब बहुत ज्यादा पूंजी और जोखिम वाले सिविल कामों के बजाय कम रिस्क, ज्यादा फायदे, हाई-टेक और टिकाऊ प्रोजेक्ट्स को तवज्जो देता है. लिहाजा, ग्वादर जैसे बैड परफॉर्मर वाले पोर्ट के लिए लगातार होने वाले भारी मेंटेनेंस और सुरक्षा खर्च को सही ठहराना सरकारी योजनाकारों के लिए मुश्किल हो गया है.

प्रोपेगेंडा और हकीकत के बीच का फर्क

पाकिस्तानी अधिकारियों की तरफ से जारी ऑफिशियल प्रेस रिलीज में समय-समय पर कार्गो प्रोसेसिंग में बढ़ोतरी की बात कही जाती है. उदाहरण के लिए, व्यापार अधिकारियों के जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2026 में कामकाज के खास पीक महीनों के दौरान ग्वादर ने लगभग 11,000 स्टैंडर्ड शिपिंग कंटेनरों को संभाला. इसमें खास तौर से सरकार की सब्सिडी वाले भारी मात्रा में फर्टिलाइजर और एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स का आयात शामिल था.

हालांकि, जानकारों का कहना है कि ये आंकड़े कमर्शियल शिपिंग के नॉर्मल लेवल के मुकाबले बहुत कम हैं. इसकी तुलना में, कराची में पाकिस्तान के मेन कमर्शियल पोर्ट- पोर्ट कासिम और कराची पोर्ट ट्रस्ट हर साल लाखों कंटेनरों का कामकाज संभालते हैं.

कमर्शियल फीडर नेटवर्क, कार्गो की मात्रा और इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण, दुनिया की बड़ी कंटेनर कंपनियां ग्वादर को अपने रेगुलर शेड्यूल में शामिल ही नहीं करती हैं. ग्वादर पर आने वाले ज्यादातर जहाज सीधे सरकारी कॉन्ट्रैक्ट या सरकारी आदेशों के तहत आते हैं, न कि स्वाभाविक कमर्शियल मांग के कारण.

स्थानीय लोगों का कड़ा विरोध

स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को शुरू करने की कोशिशों का समुदाय ने कड़ा विरोध किया है. यहां स्थानीय बलूच मछुआरे तटीय अर्थव्यवस्था की पारंपरिक रीढ़ हैं.  वह पोर्ट के आसपास सिक्योरिटी के लिए बनाए गए प्रतिबंधित इलाकों और इंडस्ट्रियल डीप-सी ट्रॉलर के कारण अपनी आजीविका छिनने से परेशान हैं.

'हक दो तहरीक' (अधिकार दो आंदोलन) के बैनर तले अधिकार समूहों के विरोध प्रदर्शन के कारण बार-बार सड़कें और पोर्ट के गेट बंद किए गए हैं. इन प्रदर्शनों में साफ पानी, बिजली और मछली पकड़ने के अधिकारों जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग की गई है. हालांकि, चीन और पाकिस्तान दोनों देशों के अधिकारी किसी भी तरह की पीछे हटने या काम धीमी पड़ने की बात को सख्ती से नकारते हैं और एकजुटता दिखाते हैं.

सरकारी प्रतिनिधि लगातार इस बात पर जोर देते हैं कि चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) की दूसरे फेज में एंट्री हो चुकी है. अब यह शुरुआती सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर से आगे बढ़कर औद्योगिकीकरण, कृषि, तकनीकी सहयोग और स्पेशल इकोनॉमिक जोन (SEZ) पर फोकस कर रहा है.

ग्वादर पोर्ट  के लिए अब आगे क्या?

ग्वादर से तेजी से कमर्शियल फायदा न मिल पाना पाकिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है. पाकिस्तान ने CPEC से जुड़े सपोर्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, हाईवे और एनर्जी प्रोजेक्ट्स बनाने के लिए भारी कर्ज लिया था. पोर्ट से होने वाली कमाई कम रहने के कारण, इन विदेशी कर्जों को चुकाने का बोझ पाकिस्तान के सरकारी खजाने और विदेशी मुद्रा भंडार पर और बढ़ गया है.

भारत के लिए, ग्वादर को लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से देखा जाता रहा है. भारत की पारंपरिक रूप से ग्वादर पर चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति के एक अहम हिस्से के तौर पर नजर रहती है. यह कमर्शियल और मिलिट्री सुविधाओं का एक नेटवर्क है, जिसे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत को घेरने के लिए बनाया गया है.

ग्वादर को एक कमर्शियल पोर्ट से बदलकर भारी सुरक्षा वाले नेवल रीफ्यूलिंग स्टेशन में तब्दील करना भारतीय रक्षा विशेषज्ञों की लंबे समय से चली आ रही आशंकाओं को सच साबित कर रहा है.

इसके जवाब में, भारत रीजनल कनेक्टिविटी के दूसरे विकल्पों में इन्वेस्टमेंट कर रहा है, जिसमें पड़ोसी ईरान का चाबहार पोर्ट भी शामिल है.इस पोर्ट के जरिए भारत को पाकिस्तान से पूरी तरह बचे हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापार का सीधा रास्ता मिलता है.

ग्वादर में चीन की स्थायी नेवल मौजूदगी के बाद अब अमेरिका और उसके सहयोगी इलाके में निगरानी और बढ़ा सकते हैं. आगे चलकर, ग्वादर की असलियत शायद एक व्यावहारिक और कम चर्चा वाले बीच के रास्ते पर आकर टिक जाएगी. यह पोर्ट अपने कामकाज को जारी रखने के लिए सरकारी फर्टिलाइजर शिपमेंट, कोयले का आयात और स्थानीय मछली पकड़ने के कारोबार को संभालता रहेगा. लेकिन, पर्दे के पीछे यह सुविधा चीन के लिए अहम साबित होगी. यानी अरब सागर में चीनी नौसेना के लिए एक शांत और भरोसेमंद नेवल रीफ्यूलिंग, लॉजिस्टिकल और इंटेलिजेंस स्टेशन के तौर पर काम करना.

 

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रचित कुमार जी न्यूज डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर हैं. देश, दुनिया और डिफेंस की खबरों को आसान भाषा में बताने में महारत हासिल है. जी न्यूज से मई 2022 में जुड़े और शिफ्ट देखने का 12 साल से ज्यादा का अनुभव है. जी न्यूज में Best Performer अवॉर्ड भी मिल चुका है. जी न्यूज, आजतक और एबीपी न्यूज में शिफ्ट देखते हुए महामहिम, बिहार के बाहुबली सीरीज शुरू की और कई एक्सप्लेनर खबरों पर काम किया.  इंडिया न्यूज और जनसत्ता में शिफ्ट देखने के साथ-साथ ट्रैफिक लाने वाली खबरों को तवज्जो दी. नवभारत टाइम्स से करियर की शुरुआत हुई और वहां तकरीबन ढाई साल तक फ्रंट पेज 2 और देश-विदेश के पन्नों की जिम्मेदारी संभाली. जर्नलिज्म में पोस्टग्रेजुएट और IIMC से डिप्लोमा करने  वाले रचित कुमार 13 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. आप Rachit.kumar@India.com पर सीधे ईमेल कर इनसे जुड़ सकते हैं. 
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