क्या है वो 'इजरायल-जॉर्डन' मॉडल, जिससे PAK-बांग्लादेश को लाइन पर ला सकता है भारत? दिसंबर में आ रहा 'बड़ा मौका'
आतंकवादी और कट्टरपंथी तत्वों को बढ़ावा देने की वजह से पाकिस्तान और बांग्लादेश लंबे अरसे से भारत के लिए संकट का सबब बने हुए हैं. लेकिन अगर भारत 'इजरायल-जॉर्डन' मॉडल अपनाए तो इन दोनों मुल्कों को हमेशा के लिए लाइन पर ला सकता है. इस तरह का बड़ा मौका दिसंबर में आ रहा है.
भारत की बांग्लादेश के साथ गंगा जल-बंटवारा संधि जल्द ही 12 दिसंबर को समाप्त होने वाली है. जबकि पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि पहले से ही अनिश्चित काल के लिए स्थगित है. दोनों मुल्क इन संधियों को अपने मुताबिक करने के लिए भारत पर जोर डाल रहे हैं. लेकिन भारत की चिंताओं को दूर करने के लिए तैयार नहीं हैं. ऐसे में जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी 'इजरायल-जॉर्डन जल समझौते' का उदाहरण देते हुए भारत को भी इसी राह पर चलने की सलाह दी है. उनका कहना है कि अगर भारत भी यह मॉडल अपना ले तो आतंकवाद और घुसपैठ की समस्या हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी.
'भारत करे ये काम तो लाइन पर आ जाएंगे बांग्लादेश-PAK'
आखिर यह मॉडल क्या है, जिसने दोनों धुर विरोधी देशों को हमेशा के लिए दोस्त बना दिया और इसने किस तरह इलाके में अमन की राह खोल दी? आइए, इस बारे में आपको विस्तार से बताते हैं. लेकिन इससे पहले जानिए कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी ने एक्स पर लिखी अपनी पोस्ट में क्या सलाह दी?
चेलानी ने पोस्ट में लिखा, 'भारत की बांग्लादेश के साथ गंगा जल-बंटवारा संधि जल्द ही 12 दिसंबर को समाप्त होने वाली है. जबकि पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि पहले से ही अनिश्चित काल के लिए स्थगित है. ये दोनों संधियां निचले तटवर्ती देशों यानी पाकिस्तान और बांग्लादेश को पानी से जुड़े अधिकार तो प्रदान करती हैं, लेकिन उनके लिए कोई जिम्मेदारियां तय नहीं करतीं. जबकि, अधिकारों के साथ कर्तव्य भी आने चाहिए, जिनमें शांति और सुरक्षा बनाए रखने की शर्तें शामिल हैं.'
भारत सरकार को सलाह देते हुए चेलानी ने आगे लिखा, 'सरकार को मैं यह सुझाव देता हूं कि भारत इजरायल-जॉर्डन मॉडल का अनुकरण करके पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ नए जल-बंटवारा तंत्र को अलग-अलग पीस फ्रेमवर्क में कैसे शामिल कर सकता है. अगर पाकिस्तान और बांग्लादेश चाहते हैं कि भारत वह करे, जिससे चीन हमेशा इनकार करता है. यानी अगर वे भारत से नदियों के पानी का दीर्घकालिक जल बंटवारा चाहते हैं तो उन्हें कम से कम नए वाटर फॉर पीस सिस्टम के तहत शांति के लिए सत्यापन योग्य शर्तों को स्वीकार करना होगा.'
'इजरायल-जॉर्डन मॉडल' पर जोर क्यों दे रहे चेलानी?
वे आगे लिखते हैं, 'पानी को एक पीस डिविडेंड बनना चाहिए, न कि एक बिना शर्त मिलने वाला अधिकार. इसे स्वयं उपमहाद्वीपीय शांति को बनाए रखने वाला एक प्रमुख प्रोत्साहन बनना चाहिए.'
अपनी इस पोस्ट में ब्रह्मा चेलानी ने 'इजरायल-जॉर्डन मॉडल वाटर डिप्लोमेसी' पर खासा जोर दिया. आखिर यह कैसी डिप्लोमेसी है, जिसने दो दुश्मन मुल्कों को दोस्ती के सूत्र में बंधने को मजबूर कर दिया. आइए, अब आपको विस्तार से इस बारे में समझाते हैं.
असल में यह नदी जल बंटवारे की कूटनीति का ऐसा ढांचा है, जिसमें इजरायल ने सुनियोजित रणनीति के तहत इसे सुरक्षा, शांति और राजनीतिक संबंधों से जोड़ दिया. आसान भाषा में कहा जाए तो इसे 'वाटर फॉर पीस मॉडल' कहा जाता है.
इजरायली रणनीति ने जॉर्डन को कर दिया 'बोल्ड'
इजरायल और जॉर्डन, दोनों ही पानी की अत्यधिक कमी वाले देश हैं. वे मुख्य रूप से जॉर्डन नदी और यारमुक नदी का जल साझा करते हैं. ये नदियां इजरायल से निकलकर जॉर्डन की ओर जाती हैं. दोनों मुल्क 1994 से पहले तक एक-दूसरे से युद्ध की स्थिति में थे और जॉर्डन कोई दबाव मानने को तैयार नहीं था.
ऐसे में इजरायल ने नदी के पानी को हथियार बनाते हुए बांध बनाकर जॉर्डन जाने वाला पानी रोक दिया. इससे बिलबिलाए जॉर्डन को आखिरकार इजरायल के दरवाजे पर आने को मजबूर होना पड़ा. मौका देखकर इजरायल भी नदी जल बंटवारे के लिए समझौता करने को राजी तो हो गया लेकिन उसने संधि में कई शर्तें शामिल कर दीं, जिनका जॉर्डन को अनिवार्य रूप से पालन करना था. इजरायल ने संधि में स्पष्ट रूप से लिखा कि किसी भी शर्त का उल्लंघन होने पर वह संधि तोड़ने के लिए स्वतंत्र होगा.
कोई और चारा न देख जॉर्डन को इजरायल की ये सारी शर्तें माननी पड़ी और आखिरकार 26 अक्टूबर 1994 को दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक इजरायल-जॉर्डन पीस ट्रीटी पर हस्ताक्षर हो गए. इस ट्रीटी में अनुच्छेद 6 और एनेक्स्चर II में नदी जल-बंटवारे से जुड़े नियम जोड़े गए थे.
इजरायल-जॉर्डन नदी जल समझौता क्या है?
इजरायल-जॉर्डन नदी जल समझौता एक व्यापक शांति समझौते का हिस्सा है. इस समझौते में इजरायल ने जॉर्डन को नदियों से पानी का एक निश्चित हिस्सा देने की प्रतिबद्धता जताई, लेकिन इसके लिए जॉर्डन से इजरायल की सुरक्षा, संप्रभुता और सीमा की अखंडता को स्वीकार किया और आतंकवादी गतिविधियों पर रोक लगाने की लिखित गारंटी भी ले ली.
इस संधि में प्रावधान किया गया कि अगर जल बंटवारे की शर्तों का उल्लंघन होता है तो इजरायल इस संधि के कुछ अंशों या पूरी संधि को मानने से इनकार कर सकता है. इस समझौते में जल बंटवारे के साथ ही पानी की उपलब्धता बढ़ाने पर भी बात की गई. इसके लिए इजरायल ने अपनी तकनीक का इस्तेमाल कर समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाकर जॉर्डन को बेचना शुरू किया. जिससे उसकी पानी की जरूरतें पूरी हुईं. वहीं जॉर्डन ने अपनी एक्सट्रा सोलर एनर्जी इजरायल को बेचनी शुरू कर दी. जिससे दोनों कारोबार के गहरे बंधन में बंधते चले गए.
दोनों के बीच यह परस्पर निर्भरता अब इतनी बढ़ चुकी है कि दोनों ही मुल्क किसी भी तरह के भारी तनाव या युद्ध जैसी स्थिति से हमेशा बचने का प्रयास करते हैं, क्योंकि जंग होने पर दोनों ओर का भारी नुकसान तय है.
पाकिस्तान को घुटनों पर पर ला सकता है भारत!
अब अगर भारत इस मॉडल को पाकिस्तान और बांग्लादेश के संदर्भ में इस्तेमाल करता है तो स्थितियों में काफी कुछ बदलाव देखने को मिल सकता है. पाकिस्तान के साथ नया जल समझौता कर भारत उसमें सीमा पर शांति और आतंकवाद को पूरी तरह बंद कर देने की लिखित शर्तें रख सकता है. साथ ही, यह भी प्रावधान कर सकता है कि भारत जब चाहे इस बात को वेरिफाई कर सकेगा कि पाकिस्तान जल बंटवारे की शर्तों का पालन कर रहा है या नहीं. ऐसी संधि होने पर पाकिस्तान को न चाहते हुए भी अपनी आतंकपरस्त नीतियों को छोड़ना पड़ेगा और उसके बाद वह भी जॉर्डन की तरह अच्छा पड़ोसी मुल्क बन सकेगा.
बांग्लादेश की बदल जाएगी भारत विरोधी टोन!
इसी तरह बांग्लादेश के साथ गंगा जल संधि के नवीनीकरण में भी भारत उसके सामने नई शर्तें लिखवा सकता है. इन शर्तों में अवैध घुसपैठ की रोकथाम, आतंकवाद पर लगाम, बांग्लादेश में रह रहे हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना, बांग्लादेश में भारत विरोधी गतिविधियों को सख्ती से रोकने जैसे प्रावधान रखे जा सकते हैं. ये शर्तें जुड़ने से बांग्लादेश में चाहे कोई भी सरकार रहे, उसे हमेशा भारत के साथ अच्छे संबंधों को प्राथमिकता देनी ही होगी. जिससे भारत की सुरक्षा और समृद्धि, दोनों में ही इजाफा होगा.