)
इजरायल के आम चुनाव में विदेशी दखल की जांच बड़ा मुद्दा बनती जा रही है. इजरायली मीडिया के मुताबिक, इस मामले में अब इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद की एंट्री हो गई है. वह शिन बेट (इजरायल सुरक्षा एजेंसी) के अधिकारियों की विदेश संबंधित मामलों में मदद करेगी. इजरायल में इस बात की आशंका जताई जा रही है कि अरब पार्टियों के पक्ष में मतदान बढ़ाने के लिए कतर समेत कई अन्य देशों ने जमकर पैसा पंप किया है. हालांकि, कतर ने इन आरोपों से इनकार किया है.लेकिन दक्षिण पंथी इजरायली पार्टियां लगातार इस मामले की जांच की मांग कर रही हैं.
कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजेद अल-अंसारी ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा, इजरायली राजनेताओं और मीडिया में उनके कॉन्टैक्ट्स ने जो आरोप लगाए हैं, हम उनको खारिज करते हैं. इन लोगों ने एक और दुष्प्रचार अभियान शुरू किया है, जिसका मकसद इस हफ्ते हुए चुनावों के बाद कतर को इजरायल के राजनीतिक विवादों में घसीटना है.'
उन्होंने कहा, 'वे हम पर नेतन्याहू, वामपंथियों और अब अरब वोटों को खरीदने का आरोप लगा रहे हैं. अगर इन सभी आरोपों को सच मान लिया जाए, तो ऐसा लगेगा मानो पूरा इजरायल ही कतर की संपत्ति है.'
तुर्किये ने भी इस बात से इनकार किया कि उसने इजरायली चुनावों में कोई दखल दिया है. अंकारा ने कहा,'कुछ मीडिया आउटलेट्स और सोशल मीडिया पर चल रहे ये आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद हैं. ये आरोप एक सोचे-समझे और खुलेआम चलाए जा रहे दुष्प्रचार अभियान का हिस्सा हैं, जिसका मकसद जनता को गुमराह करना है.'
यह विवाद तब शुरू हुआ, जब केंद्रीय चुनाव समिति के चीफ और सुप्रीम कोर्ट के जज नोम सोहलबर्ग ने शिन बेट के निदेशक डेविड जिनी को एक खत लिखकर, चुनावों में विदेशी दखल के संदेह की जांच करने को कहा. सोहलबर्ग ने लिखा,'चुनावों की निष्पक्षता ही लोकतंत्र की नींव है.'
इजरायल के हालिया चुनावों ने एक राजनीतिक पहेली खड़ी कर दी है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की अगुआई वाले गुट को बहुमत नहीं मिल सका है, लेकिन उनके विरोधियों को भी उन्हें सत्ता से हटाने का कोई रास्ता नहीं मिल पाया है. किसी भी पक्ष के पास अकेले सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या बल नहीं है, जिसके चलते देश को एक बार फिर गठबंधन बनाने की मुश्किल बातचीत के दौर से गुजरना पड़ सकता है.
संसदीय आंकड़ों के हिसाब से विपक्ष की सरकार बनने की एक संभावना दिख रही है. पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले गुट के पास 48 सीटें हैं, जबकि अरब पार्टियों ने 19 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया है. इस तरह, 120 सदस्यों वाली 'नेसेट' (संसद) में उनके पास कुल 67 सीटें हो जाती हैं, जो बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों के आंकड़े से काफी ज्यादा हैं.
लेकिन, इसमें एक बड़ी पेचीदगी है. विपक्ष के कई नेता सरकार बनाने के लिए अरब पार्टियों पर निर्भर रहने का विरोध कर रहे हैं. इसका मतलब यह है कि भले ही कागजों पर नेतन्याहू के विरोधियों के पास जरूरी संख्या मौजूद हो, लेकिन इसे एक काम करने लायक संसदीय बहुमत में बदलना काफी मुश्किल हो सकता है.
तो, अब आगे क्या होगा? क्या आइसेनकोट बंटे हुए विपक्ष को एक साथ ला पाएंगे? क्या नेतन्याहू किसी अप्रत्याशित गठबंधन के जरिए सत्ता में वापसी कर पाएंगे? या फिर इजरायल में फिर से चुनाव होंगे?
इजरायल के चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से होते हैं, जिसमें वोटर सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव करने के बजाय राजनीतिक दलों को चुनते हैं. नेसेट में 120 सीटें नेशनल वोट्स में पार्टियों की हिस्सेदारी के मुताबिक बांटी जाती हैं. सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी या गठबंधन को कम से कम 61 सदस्यों का समर्थन हासिल करना होगा.
यह सिस्टम छोटी पार्टियों को खासतौर से असरदार बनाती है, क्योंकि बड़े राजनीतिक समूहों को बहुमत तक पहुंचने के लिए अक्सर गठबंधन सहयोगियों की जरूरत होती है.
नेतन्याहू के लिकुड ब्लॉक ने 53 सीटें हासिल की हैं, जबकि आइजेनकोट की अगुआई वाले विपक्षी गठबंधन के पास 48 सीटें हैं. बाकी 19 सीटें ज्वॉइंट लिस्ट और राआम समेत अरब की अगुआई वाली पार्टियों की हैं. दोनों बड़े गुटों में से कोई भी बाहरी समर्थन के बिना शासन नहीं कर सकता.
यह रिजल्ट अहम इसलिए भी है, क्योंकि नेतन्याहू पिछले 30 साल से ज्यादा समय से सत्ता में हैं और उन्होंने बार-बार राजनीतिक संकटों का सामना किया है. उनके विरोधियों को उम्मीद थी कि चुनाव से उनका नेतृत्व खत्म हो जाएगा, लेकिन आंकड़ों से सरकार में सीधा बदलाव नहीं हुआ है.
राआम और ज्वॉइंट लिस्ट बाहर से सरकार को समर्थन दे सकते हैं. यानी संभावना आइसेनकोट की अगुआई वाली अल्पसंख्यक सरकार की हो सकती है, जिसमें औपचारिक रूप से अरब पार्टियां शामिल नहीं होंगी, लेकिन यह गठबंधन के बाहर से उनके संसदीय समर्थन पर निर्भर रहेगी. यह व्यवस्था उन विपक्षी नेताओं के लिए एक राजनीतिक समझौता हो सकती है, जो सरकार में अरब पार्टियों को शामिल करने के मुद्दे पर अपने चुनावी रुख को बदलने के लिए तैयार नहीं हैं.
ज्वॉइंट लिस्ट ने नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए राजनीतिक सहयोग देने की ख्वाहिश जताई है, हालांकि उन्होंने सार्वजनिक रूप से उन शर्तों का जिक्र नहीं किया है, जिनके आधार पर वे सरकार का समर्थन करेंगे. वहीं, राआम पार्टी के अब्बास इस तरह के सिस्टम की संभावनाओं को लेकर कुछ खास उम्मीद में नजर नहीं आते.
दोनों राजनीतिक दलों को 61 सीटें हासिल करने के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.ऐसे में एक बड़ी यूनिटी सरकार की संभावना पर चर्चा हो रही है.इसमें लिकुड, आइजेनकोट की याशर, बेनेट की बी'याचाद और लिबरमैन की यिसराएल बेतेनु शामिल हो सकती हैं. अरब दलों के बिना भी, यह गठबंधन 67 सीटों पर कब्जा कर लेगा.
राजनीतिक और नागरिक हस्तियों ने नेतन्याहू और आइजेनकोट से मुल्क को एक और चुनाव की ओर धकेलने के बजाय मिलकर काम करने पर सोचने को कहा है.
यरुशलम पोस्ट ने बताया कि मोदिइन के मेयर हैम बिबास ने दोनों नेताओं से गठबंधन सरकार बनाने पर विचार करने को कहा है. हालांकि, इसमें सियासी रुकावटें काफी बड़ी हैं. आइजेनकोट, बेनेट, लिबरमैन और गोलान सभी ने नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के वादे पर चुनाव प्रचार किया था. आइज़ेनकोट ने नेतन्याहू के अधीन बैठने से इनकार कर दिया है, यहां तक कि बारी-बारी से प्रधानमंत्री पद की व्यवस्था में भी.
नेतन्याहू के लिए भी, ऐसी सरकार का मतलब उन राजनेताओं को रियायतें देना होगा जिन्होंने बार-बार उनके नेतृत्व और देश की राजनीतिक और सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के तरीके की आलोचना की है. इसलिए, यूनिटी गवर्नमेंट गणितीय रूप से संभव हो सकती है, लेकिन राजनीतिक रूप से मुश्किल है.
गठबंधन के समीकरणों में 'शास' (Shas) और 'यूनाइटेड तोराह जुडाइज्म' जैसी बेहद-रूढ़िवादी पार्टियां भी अहम खिलाड़ी बनकर उभरी हैं. इन दोनों के पास कुल 13 सीटें हैं. सैद्धांतिक रूप से, इन पार्टियों को शामिल करने से विपक्ष को अरब गुटों पर निर्भर रहे बिना बहुमत के करीब पहुंचने में मदद मिल सकती है. लेकिन इसके लिए आइजेनकोट और उनके सहयोगियों को अपने चुनाव प्रचार के सबसे प्रमुख वादों में से एक पर फिर से सोचना होगा, जिसमें ज्यादा-रूढ़िवादी पुरुषों को अनिवार्य मिलिट्री सेवा से मिलने वाली छूट को खत्म करना शामिल है.
यह मुद्दा इजरायली राजनीति में विवाद का एक बड़ा कारण रहा है. विपक्ष की मांग है कि सेना और नेशनल सर्विस में 'हारेदी'समुदाय की भागीदारी बढ़ाई जाए. दूसरी ओर, ज्यादा-रूढ़िवादी पार्टियां लगातार इन छूटों का बचाव करती रही हैं. इसलिए, उनके साथ गठबंधन करने से एक ऐसा विवाद फिर से खड़ा हो सकता है, जो पहले भी कई राजनीतिक साझेदारियों के टूटने का कारण बन चुका है.
इस बीच, नेतान्याहू के पास कुछ विकल्प तो हैं, लेकिन बहुमत हासिल करने का उनका रास्ता काफी मुश्किल है. उनके गुट के पास 61 सीटों के जादुई आंकड़े तक पहुंचने के लिए अभी भी 8 सीटें कम हैं. अगर वे राआम को अपने गठबंधन में शामिल कर लें, तो उनके पास सीटों की संख्या बढ़ सकती है, लेकिन नेतान्याहू ने अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों के साथ मिलकर काम करने से बार-बार इनकार किया है.
उनके धुर-दक्षिणपंथी सहयोगियों खासकर इतामार बेन-गवीर की 'ओत्ज्मा येहुदित' और बेजालेल स्मोट्रिच की 'रिलिजियस जायोनिज्म' ने भी इस तरह के सिस्टम को लेकर विरोध जता दिया है.
अगर कोई भी पक्ष एक मजबूत गठबंधन बनाने में कामयाब नहीं हो पाता है, तो इजरायल में फिर चुनाव हो सकते है. हालांकि, इसका मतलब यह होगा कि दशकों में सबसे ज्यादा वोटिंग परसेंटेज वाले चुनावी अभियान के बाद भी सियासी अनिश्चितता और लंबी खिंच जाएगी.