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नौ देशों की तबाही का खौफनाक प्लान! सीक्रेट ऐप से मिल रहे फरमान; 'अरब स्प्रिंग' की आहट से थर्राया यूरोप

यूरोप के कई देशों में सड़कों पर उमड़े सैलाब का बढ़ता आक्रोश अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन चुका है. फ्रांस से इटली और अल्बानिया तक फैले इन विरोध-प्रदर्शनों के पीछे की वजह महंगाई, स्कूल-कॉलेजों की फीस में बढ़ोतरी, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, आवास संकट और सरकारी नीतियों से जुड़ी नाराजगी को बताया जा रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि कहीं ये यूरोप में 'अरब स्प्रिंग' जैसी कोई आहट तो नहीं है.

Written By Shwetank Ratnamber
Published: Oct 20, 2026, 09:13 AM IST | Updated: Oct 22, 2026, 06:02 AM IST
Image Credit: क्या यूरोप में होने जा रहा है 'अरब स्प्रिंग' जैसा बड़ा बदलाव? (AI)
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यूरोप सुलग रहा है. दंगे-गृहयुद्ध जैसे हालात हैं. प्रदर्शनों का दौर 9 देशों तक फैल चुका है. यूरोपीय संघ में अंदरखाने अब 'अरब स्प्रिंग' जैसा कुछ पकने की आशंका जताई जा रही हैं. यूरोप में फैल रही हिंसा, आगजनी, लूट और तोड़फोड़ को लेकर अमेरिका ने जो वजह बताई है उसके इतर ये जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर 2026 में 'अरब स्प्रिंग' का जिक्र क्यों हो रहा है. अरब जगत में उस दौर में क्या हुआ था और उसकी यूरोप से जो तुलना हो रही है, उसमें कुछ दम है या सिर्फ ये कुछ लोगों के दिमाग का फितूर और हवाबाजी है.

यूरोप के हालात और आशंका

अक्टूबर, 2026 में यूरोप की सड़कों पर उथल-पुथल मची है. विरोध प्रदर्शनों की लहर थमने का नाम नहीं ले रही. जिसकी तुलना 'अरब स्प्रिंग' से की जा रही है. अरब स्प्रिंग 2010 के आखिर में हुआ वो आंदोलन था, जिसकी शुरुआत ट्यूनीशिया से हुई थी, जिसने देखते-देखते मिडिल ईस्ट और उत्तरी अफ्रीका के कई देशों को अपनी चपेट में ले लिया था. इस आंदोलन के बाद दशकों से सत्ता पर काबिज शासकों को सत्ता गंवानी पड़ी थी. 

मौजूदा समय में स्पेन, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, इटली से लेकर बेल्जियम और अल्बानिया तक प्रदर्शनों के नाम पर हिंसा हो रही है. कुछ देशों में हड़ताल चल रही हैं. कहीं स्कूलों पर कब्जा करके विरोध जताया जा रहा है तो कहीं ऐतिहासिक इमारतों को फूंका जा रहा है. लूट और तोड़फोड़ हो रही है. 

यहां ध्यान देने लायक बात ये है कि ऑस्ट्रिया का प्रोटेस्ट शिक्षा बजट में कटौती की आशंका को लेकर विरोध शुरू हुआ. यानी सरकार ने ऐसा कोई ऐलान भी नहीं किया था फिर भी हिंसा होने लगी. ऐसे में सवाल उठता है कि लोगों को ऐसे सरकार विरोधी प्रदर्शन करने के लिए कोई बाहरी शख्य या संस्थान तो नहीं उकसा रहा?

पेरिस बनेगा मुस्लिम शहर: ट्रंप

अमेरिकी राष्ट्रपति ने फ्रांस के हालात पर चिंता जताते हुए कहा है कि यूरोप ने अप्रवासियों को अपने यहां भर लिया अब वही अप्रवासी उस देश को जला रहे हैं, जिसने इन लोगों को शरण दी थी. ट्रंप ने तो ये तक कह दिया कि वो दिन दूर नहीं जब पेरिस एक मुस्लिम सिटी में तब्दील हो जाएगा. ट्रंप के डिप्टी का कहना है कि तीसरी दुनिया से आए लोग यूरोप को बर्बाद कर रहे हैं. इसलिए उनसे सख्ती से निपटना चाहिए. 

9 देशों में आक्रोश की वजह

स्पेन, पुर्तगाल और ग्रीस में लोगों का गुस्सा मकानों का किराया बढ़ने और प्रॉपर्टी (घर-मकान-दुकान) की कीमत बढ़ने को लेकर फूटा. फ्रांस में फीस बढ़ने समेत अन्य मुद्दों पर फसाद हुआ. इटली में महंगाई का विरोध करने के नाम पर हिंसा हुई. इसी तरह जर्मनी के छात्र अनिवार्य सैन्य सेवा के संभावित ऐलान के विरोध में सड़कों पर उतरे. अल्बानिया में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ जुटी भीड़ घर जाने का नाम नहीं ले रही. ऑस्ट्रिया में तो शिक्षा बजट में कटौती की आशंका पर ही लोगों ने जमकर तांडव मचाया. 

अरब स्प्रिंग से तुलना क्यों?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि यूरोप के इन नौ देशों में हो रहे प्रदर्शनों का पैटर्न लगभग सेम होने को किसी साजिश या सुनियोजित आंदोलन के रूप में देखना सही नहीं है. उनका कहना है कि हर देश में लोगों की नाराजगी और उनकी मांगें अलग-अलग हैं. 

अरब स्प्रिंग के दौरान जहां तानाशाही शासकों के खिलाफ बगावत हुई थी तो अन्य कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष जनाक्रोश के आगे औंधे मुंह गिरे नजर आए थे. वहीं यूरोप में विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से स्थापित लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के भीतर हो रहे हैं. हालांकि प्रदर्शन के नाम पर हिंसा गलत है, लेकिन यूरोप के प्रदर्शनकारी सत्ता के तंत्र को उखाड़ फेंकने के बजाय व्यवस्थाओं में सुधार की मांग कर रहे हैं.

एक्सपर्ट्स, जिन्होंने यूरोप के प्रोटेस्ट्स की अरब स्प्रिंग से की तुलना

अमेरिका में कुवैती मूल के पत्रकार अहमद एल्दीन को यूरोप में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों और अरब स्प्रिंग के बीच ज्यादा समानता दिखती है. उनका कहना है कि युवा आर्थिक मुश्किलों, असमानता और खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं इसलिए सड़क पर उतरकर सत्ता और सिस्टम में काबिज मठाधीशों को चुनौती दे रहे हैं. प्रदर्शनों की कमान युवाओं के पास होना, इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिये लोगों की भीड़ जुटाने के पैटर्न को वो सामान्य घटनाक्रम नहीं मानते हैं.

'द पीटर मैककॉर्मैक शो' के होस्ट और ब्रिटिश पॉडकास्टर पीटर ने भी मौजूदा प्रदर्शनों की तुलना 2011 के अरब विद्रोह से करते हुए कहा, 'यूरोप अपने अरब स्प्रिंग के मुहाने पर इसलिए खड़ा है, क्योंकि इन देशों में महंगाई के बीच देशभर की संपत्ति के कुछ हाथों में सिमटने के साथ नौकरशाही बेकाबू और बेलगाम हो चुकी है. इसलिए जनता सड़कों से हटने का नाम नहीं ले रही है.'

'अरब स्प्रिंग' की आहट से क्यों थर्राया यूरोप?

कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि फ्रांस के दंगे विद्रोह की एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय कहानी का हिस्सा बन गए हैं. ये एक टूलकिट हो सकती है, जो अरब स्प्रिंग जैसा कुछ बड़ा घटनाक्रम यूरोप में देखना चाहती है. फॉक्स न्यूज़ की पड़ताल में पता चला है कि फ्रांस की अशांति के पीछे कई गुटों की पहचान हुई है. जो एक ऐप के जरिए भीड़ जुटाने और उसे निर्देश देने का काम कर रहे थे. दावा ये भी किया जा रहा है कि इनमें से कुछ संगठन अगले महीने नवंबर में युवाओं के और बड़े प्रदर्शन और हड़ताल की प्लानिंग कर रहे हैं.

इसी तरह 'इंडिपेंडेंट विमेंस फोरम' की फेलो डॉ. के अहमद ने यूरोप में बढ़ती हिंसा को लेकर चेतावनी दी है. उनका कहना है कि फ्रांस में फिलिस्तीन-समर्थक और कम्युनिस्ट भीड़ पुलिस से सीधे लोहा ले रही है. फ्रांस में लूटपाट और इमारतों में आग लगाने के आरोप में 800 से ज्यादा दंगाइयों की गिरफ्तारी के बाद, डॉ. अहमद ने उन सांस्कृतिक और राजनीतिक बदलावों का विश्लेषण किया है, जो यूरोप के प्रमुख शहरों में हो रहे विनाशकारी विरोध-प्रदर्शनों को हवा दे रहे हैं.

फ्रांस में दंगों की आग में कौन घी डाल रहा? 

फॉक्स न्यूज़ की खोजी पड़ताल में फ्रांस में अक्टूबर के दौरान हुए छात्र विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े 54 संगठनों और आंदोलनों की पहचान की गई है. उनमें कम्युनिस्ट पार्टियां, क्रांतिकारी समाजवादी समूह, मजदूर यूनियन, पर्यावरण कार्यकर्ता, मुस्लिम छात्र समर्थक, फिलिस्तीन के समर्थन वाले संगठन और अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान शामिल हैं.

अक्टूबर के इन विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े 54 संगठनों में से केवल 16 (यानी लगभग हर तीन में से एक) छात्र या युवा संगठन हैं, जिनमें कम्युनिस्ट युवा समूह और एक मुस्लिम छात्र संघ शामिल हैं. ट्रंप इसी एंगल से फ्रांस के राष्ट्रपति को आंदोलन को फौरन दबाने की सलाह दे रहे हैं.

बाकी 38 संगठनों में मजदूर यूनियन, राजनीतिक दल, क्रांतिकारी वामपंथी संगठन, वकालत करने वाले समूह और अंतरराष्ट्रीय प्रचार माध्यम शामिल हैं. जिनमें 'जिलेट्स जॉन्स' येलो वेस्ट्स नाम का कट्टर वामपंथी समूह है. येलो वेस्ट ने अन्य संगठनों के साथ मिलकर बीते शनिवार हुए प्रदर्शन को लीड किया. वहीं कट्टर वामपंथी समाजवादी राजनीतिक दल 'ला फ्रांस इंसौमीस' ने भी इन प्रदर्शनों की आग में घी डालने का काम किया. 

यूरोप के प्रदर्शनकारी आश्वासन से मान जाएंगे?

प्रदर्शनों की चिंगारी ज्वाला बनकर धधक रही है, ऐसे में इस सवाल का जवाब देना मुश्किल है. चूंकि सभी देशों में सोशल मीडिया पर प्रोटेस्ट की कॉल आना. एक आवाज पर लोगों का हुजूम उमड़ना और पुलिस के समझाने के बावजूद कानून को हाथ में लेने के पीछे गहरी साजिश हो सकती है. फ्रांस की दंगा रोधी पुलिस और खुफिया एजेंसियां ऐसे कई एंगल से जांच कर रही हैं. इस वजह से भी यूरोप के हालातों को अरब स्प्रिंग की आहट से जोड़कर देखा जा रहा है.

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About the Author

श्वेतांक रत्नाम्बर वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी और डिजिटल न्यूज़ मीडिया में 22 वर्षों से ज्यादा का व्यापक अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News (Hindi) की डिजिटल टीम में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय (देश-दुनिया) खबरों की डेस्क पर कार्यरत हैं. समसामयिक मुद्दों, वैश्विक राजनीति और कूटनीति पर गहरी समझ रखने वाले श्वेतांक जटिल अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों और राजनीतिक समीकरणों का सटीक विश्लेषण करने के विशेषज्ञ हैं.Zee News डिजिटल से पहले उन्होंने ज़ी मीडिया नेटवर्क के ग्लोबल न्यूज़ चैनल 'WION' के साथ काम किया है. इस दौरान उन्होंने 'Gravitas', 'The West Asia Post' और 'One Africa' जैसे कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्राइम-टाइम शोज़ के हिंदी प्रोडक्शन और इंटरप्रिटेशन में अहम भूमिका निभाई. 2004 से शुरू हुए अपने पत्रकारिता करियर में श्वेतांक ने रिपोर्टिंग और एंकरिंग के साथ-साथ चार लोकसभा और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की व्यापक ग्राउंड कवरेज की है.जामिया मिल्लिया इस्लामिया (JMI), नई दिल्ली से जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा के बाद मास कम्युनिकेशन और पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स डिग्री हासिल करने वाले श्वेतांक लंबे समय से 'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया' (PCI) के सम्मानित सदस्य हैं.आप श्वेतांक रत्नाम्बर से सीधे shwetank.ratnamber@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा आप उनसे एक्स (ट्विटर), मेटा (फेसबुक) और लिंक्डइन पर भी कनेक्ट कर सकते हैं.' 
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