यूरोप सुलग रहा है. दंगे-गृहयुद्ध जैसे हालात हैं. प्रदर्शनों का दौर 9 देशों तक फैल चुका है. यूरोपीय संघ में अंदरखाने अब 'अरब स्प्रिंग' जैसा कुछ पकने की आशंका जताई जा रही हैं. यूरोप में फैल रही हिंसा, आगजनी, लूट और तोड़फोड़ को लेकर अमेरिका ने जो वजह बताई है उसके इतर ये जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर 2026 में 'अरब स्प्रिंग' का जिक्र क्यों हो रहा है. अरब जगत में उस दौर में क्या हुआ था और उसकी यूरोप से जो तुलना हो रही है, उसमें कुछ दम है या सिर्फ ये कुछ लोगों के दिमाग का फितूर और हवाबाजी है.
अक्टूबर, 2026 में यूरोप की सड़कों पर उथल-पुथल मची है. विरोध प्रदर्शनों की लहर थमने का नाम नहीं ले रही. जिसकी तुलना 'अरब स्प्रिंग' से की जा रही है. अरब स्प्रिंग 2010 के आखिर में हुआ वो आंदोलन था, जिसकी शुरुआत ट्यूनीशिया से हुई थी, जिसने देखते-देखते मिडिल ईस्ट और उत्तरी अफ्रीका के कई देशों को अपनी चपेट में ले लिया था. इस आंदोलन के बाद दशकों से सत्ता पर काबिज शासकों को सत्ता गंवानी पड़ी थी.
मौजूदा समय में स्पेन, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, इटली से लेकर बेल्जियम और अल्बानिया तक प्रदर्शनों के नाम पर हिंसा हो रही है. कुछ देशों में हड़ताल चल रही हैं. कहीं स्कूलों पर कब्जा करके विरोध जताया जा रहा है तो कहीं ऐतिहासिक इमारतों को फूंका जा रहा है. लूट और तोड़फोड़ हो रही है.

यहां ध्यान देने लायक बात ये है कि ऑस्ट्रिया का प्रोटेस्ट शिक्षा बजट में कटौती की आशंका को लेकर विरोध शुरू हुआ. यानी सरकार ने ऐसा कोई ऐलान भी नहीं किया था फिर भी हिंसा होने लगी. ऐसे में सवाल उठता है कि लोगों को ऐसे सरकार विरोधी प्रदर्शन करने के लिए कोई बाहरी शख्य या संस्थान तो नहीं उकसा रहा?
अमेरिकी राष्ट्रपति ने फ्रांस के हालात पर चिंता जताते हुए कहा है कि यूरोप ने अप्रवासियों को अपने यहां भर लिया अब वही अप्रवासी उस देश को जला रहे हैं, जिसने इन लोगों को शरण दी थी. ट्रंप ने तो ये तक कह दिया कि वो दिन दूर नहीं जब पेरिस एक मुस्लिम सिटी में तब्दील हो जाएगा. ट्रंप के डिप्टी का कहना है कि तीसरी दुनिया से आए लोग यूरोप को बर्बाद कर रहे हैं. इसलिए उनसे सख्ती से निपटना चाहिए.
.@POTUS on the France riots: "Paris is going to be a Muslim city very soon, and that wasn't the deal... Emmanuel should've closed his borders a long time ago. I told him to do it." https://t.co/Ep8mzgPVq8
— Rapid Response 47 (@RapidResponse47) October 19, 2026
स्पेन, पुर्तगाल और ग्रीस में लोगों का गुस्सा मकानों का किराया बढ़ने और प्रॉपर्टी (घर-मकान-दुकान) की कीमत बढ़ने को लेकर फूटा. फ्रांस में फीस बढ़ने समेत अन्य मुद्दों पर फसाद हुआ. इटली में महंगाई का विरोध करने के नाम पर हिंसा हुई. इसी तरह जर्मनी के छात्र अनिवार्य सैन्य सेवा के संभावित ऐलान के विरोध में सड़कों पर उतरे. अल्बानिया में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ जुटी भीड़ घर जाने का नाम नहीं ले रही. ऑस्ट्रिया में तो शिक्षा बजट में कटौती की आशंका पर ही लोगों ने जमकर तांडव मचाया.

एक्सपर्ट्स का मानना है कि यूरोप के इन नौ देशों में हो रहे प्रदर्शनों का पैटर्न लगभग सेम होने को किसी साजिश या सुनियोजित आंदोलन के रूप में देखना सही नहीं है. उनका कहना है कि हर देश में लोगों की नाराजगी और उनकी मांगें अलग-अलग हैं.
अरब स्प्रिंग के दौरान जहां तानाशाही शासकों के खिलाफ बगावत हुई थी तो अन्य कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष जनाक्रोश के आगे औंधे मुंह गिरे नजर आए थे. वहीं यूरोप में विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से स्थापित लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के भीतर हो रहे हैं. हालांकि प्रदर्शन के नाम पर हिंसा गलत है, लेकिन यूरोप के प्रदर्शनकारी सत्ता के तंत्र को उखाड़ फेंकने के बजाय व्यवस्थाओं में सुधार की मांग कर रहे हैं.

अमेरिका में कुवैती मूल के पत्रकार अहमद एल्दीन को यूरोप में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों और अरब स्प्रिंग के बीच ज्यादा समानता दिखती है. उनका कहना है कि युवा आर्थिक मुश्किलों, असमानता और खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं इसलिए सड़क पर उतरकर सत्ता और सिस्टम में काबिज मठाधीशों को चुनौती दे रहे हैं. प्रदर्शनों की कमान युवाओं के पास होना, इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिये लोगों की भीड़ जुटाने के पैटर्न को वो सामान्य घटनाक्रम नहीं मानते हैं.

'द पीटर मैककॉर्मैक शो' के होस्ट और ब्रिटिश पॉडकास्टर पीटर ने भी मौजूदा प्रदर्शनों की तुलना 2011 के अरब विद्रोह से करते हुए कहा, 'यूरोप अपने अरब स्प्रिंग के मुहाने पर इसलिए खड़ा है, क्योंकि इन देशों में महंगाई के बीच देशभर की संपत्ति के कुछ हाथों में सिमटने के साथ नौकरशाही बेकाबू और बेलगाम हो चुकी है. इसलिए जनता सड़कों से हटने का नाम नहीं ले रही है.'
कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि फ्रांस के दंगे विद्रोह की एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय कहानी का हिस्सा बन गए हैं. ये एक टूलकिट हो सकती है, जो अरब स्प्रिंग जैसा कुछ बड़ा घटनाक्रम यूरोप में देखना चाहती है. फॉक्स न्यूज़ की पड़ताल में पता चला है कि फ्रांस की अशांति के पीछे कई गुटों की पहचान हुई है. जो एक ऐप के जरिए भीड़ जुटाने और उसे निर्देश देने का काम कर रहे थे. दावा ये भी किया जा रहा है कि इनमें से कुछ संगठन अगले महीने नवंबर में युवाओं के और बड़े प्रदर्शन और हड़ताल की प्लानिंग कर रहे हैं.

इसी तरह 'इंडिपेंडेंट विमेंस फोरम' की फेलो डॉ. के अहमद ने यूरोप में बढ़ती हिंसा को लेकर चेतावनी दी है. उनका कहना है कि फ्रांस में फिलिस्तीन-समर्थक और कम्युनिस्ट भीड़ पुलिस से सीधे लोहा ले रही है. फ्रांस में लूटपाट और इमारतों में आग लगाने के आरोप में 800 से ज्यादा दंगाइयों की गिरफ्तारी के बाद, डॉ. अहमद ने उन सांस्कृतिक और राजनीतिक बदलावों का विश्लेषण किया है, जो यूरोप के प्रमुख शहरों में हो रहे विनाशकारी विरोध-प्रदर्शनों को हवा दे रहे हैं.
फॉक्स न्यूज़ की खोजी पड़ताल में फ्रांस में अक्टूबर के दौरान हुए छात्र विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े 54 संगठनों और आंदोलनों की पहचान की गई है. उनमें कम्युनिस्ट पार्टियां, क्रांतिकारी समाजवादी समूह, मजदूर यूनियन, पर्यावरण कार्यकर्ता, मुस्लिम छात्र समर्थक, फिलिस्तीन के समर्थन वाले संगठन और अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान शामिल हैं.
अक्टूबर के इन विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े 54 संगठनों में से केवल 16 (यानी लगभग हर तीन में से एक) छात्र या युवा संगठन हैं, जिनमें कम्युनिस्ट युवा समूह और एक मुस्लिम छात्र संघ शामिल हैं. ट्रंप इसी एंगल से फ्रांस के राष्ट्रपति को आंदोलन को फौरन दबाने की सलाह दे रहे हैं.
बाकी 38 संगठनों में मजदूर यूनियन, राजनीतिक दल, क्रांतिकारी वामपंथी संगठन, वकालत करने वाले समूह और अंतरराष्ट्रीय प्रचार माध्यम शामिल हैं. जिनमें 'जिलेट्स जॉन्स' येलो वेस्ट्स नाम का कट्टर वामपंथी समूह है. येलो वेस्ट ने अन्य संगठनों के साथ मिलकर बीते शनिवार हुए प्रदर्शन को लीड किया. वहीं कट्टर वामपंथी समाजवादी राजनीतिक दल 'ला फ्रांस इंसौमीस' ने भी इन प्रदर्शनों की आग में घी डालने का काम किया.
प्रदर्शनों की चिंगारी ज्वाला बनकर धधक रही है, ऐसे में इस सवाल का जवाब देना मुश्किल है. चूंकि सभी देशों में सोशल मीडिया पर प्रोटेस्ट की कॉल आना. एक आवाज पर लोगों का हुजूम उमड़ना और पुलिस के समझाने के बावजूद कानून को हाथ में लेने के पीछे गहरी साजिश हो सकती है. फ्रांस की दंगा रोधी पुलिस और खुफिया एजेंसियां ऐसे कई एंगल से जांच कर रही हैं. इस वजह से भी यूरोप के हालातों को अरब स्प्रिंग की आहट से जोड़कर देखा जा रहा है.